कानून की पतली गलियां

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

देवेंद्र फड़नवीस से पहले ऐसे कई नेता हुए हैं जो कि बहुत ही कम समय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रह सके। इनमें जगदंबिका पाल की बात करें तो 1998 में उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को बर्खास्त कर 21 फरवरी, 1998 को जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया, मगर अदालत के हस्तक्षेप के बाद उन्हें 23 फरवरी को इस्तीफा देना पड़ा। इसी प्रकार पिछले साल कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने बिना बहुमत के ही 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, मगर 19 मई को सदन में शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया…

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने विधानसभा में शक्ति परीक्षण से एक दिन पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अपने दूसरे कार्यकाल में फड़नवीस सिर्फ  81 घंटे के लिए मुख्यमंत्री बने और उन्हें इतने कम अंतराल में ही अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। फड़नवीस ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। उनकी इस घोषणा से पहले उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। फड़नवीस ने रविवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उनके साथ अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। देवेंद्र फड़नवीस से पहले ऐसे कई नेता हुए हैं जो कि बहुत ही कम समय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रह सके। इनमें जगदंबिका पाल की बात करें तो 1998 में उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को बर्खास्त कर 21 फरवरी, 1998 को जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया, मगर अदालत के हस्तक्षेप के बाद उन्हें 23 फरवरी को इस्तीफा देना पड़ा। इसी प्रकार पिछले साल कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने बिना बहुमत के ही 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, मगर 19 मई को सदन में शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इसी प्रकार सतीश कुमार बिहार के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। मगर उन्हें सात दिनों में इस्तीफा देना पड़ा। उनका कार्यकाल 27 जनवरी से 2 फरवरी, 1968 तक रहा। बिहार में भी 19 साल पहले ऐसी स्थिति बनी थी। वर्ष 2000 में नीतीश कुमार ने भी शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। बहुमत से 8 विधायक कम होने के बावजूद उन्होंने 3 मार्च को शपथ ले ली, लेकिन 10 मार्च को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। फिलहाल मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर इस्तीफा देने वालों में फड़नवीस का भी नाम शामिल हो गया है। देवेंद्र फड़नवीस का मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का कार्यक्रम भी अचंभित करने वाला था। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि वह अचानक शपथ ले लेंगे। फड़नवीस के शपथ लेने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया था। हालांकि सबका पहला अनुमान यही था कि भतीजे अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार को पटकनी दे दी है और भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में बड़ी टूट को अंजाम दे दिया है, लेकिन बाद की घटनाओं ने इस कयास को गलत साबित कर दिया। फड़नवीस के मुख्यमंत्री बनने पर कई सवाल उठे हैं। क्या राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी ली गई? फड़नवीस ने राज्यपाल के समक्ष दावा कब पेश किया, विधायकों की सूची कब दी, वे विधायक राज्यपाल के समक्ष कब पेश हुए? शपथ दिलाने में इतनी जल्दी क्यों की गई?

व्यवस्था को लेकर जो सवाल हैं, वे तो हैं ही, उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अजित पवार के उपमुख्यमंत्री बनते ही उन पर से भ्रष्टाचार के आरोप कैसे हटा लिए गए। महाराष्ट्र में 1999 से 2009 के बीच कथित तौर पर 70 हजार करोड़ रुपए का सिंचाई घोटाला हुआ था। इसी घोटाले में अजित पवार का नाम भी आया था। तब भाजपा नेताओं ने कई बार अजित पवार पर इस घोटाले में शामिल होने का मुद्दा उठाया था। 28 नवंबर 2018 को महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एनसीपी नेता अजित पवार को 70 हजार करोड़ के कथित सिंचाई घोटाले में आरोपी ठहराया था।

अजित पवार एनसीपी के उन मंत्रियों में शामिल रहे, जिनके पास महाराष्ट्र में 1999 से 2014 के दौरान कांग्रेस-राकांपा गठबंधन सरकार में सिंचाई विभाग का प्रभार था। महाराष्ट्र के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने सोमवार को राज्य की नौ सिंचाई परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं की जांच बंद कर दी और सरकार बनाने में भाजपा की मदद करने की वजह से अजित पवार को ‘दोषमुक्त’ कर दिया। इससे पहले हरियाणा में भी ऐसा ही नाटक हुआ था जब नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के पिता अजय चौटाला को फटाफट पैरोल दे दी गई थी। मुद्दा यह नहीं है कि सरकार कब बनेगी, किसकी बनेगी, कितनी टिकाऊ होगी, भविष्य क्या होगा, बल्कि मुद्दा तो यह है कि ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए हम क्या कर सकते हैं। मुद्दा यह है कि मोदी-शाह की प्रशंसा करते हुए बार-बार चाणक्य नीति का हवाला देने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि चाणक्य ने कभी अनैतिकता का समर्थन नहीं किया जबकि भाजपा अपने लक्ष्य के लिए नैतिकता, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की हत्या में कोई संकोच नहीं कर रही है। कानून की पतली गलियों का सहारा लेकर वह, वह सब कर रही है जिसके लिए वह कांग्रेस को गलत ठहराती रही थी। भ्रष्टाचार का बदला भ्रष्टाचार नहीं हो सकता।

यही सवाल अब कांग्रेस, एनसीपी और शिव सेना पर भी लागू होता है। महाराष्ट्र विधानसभा के लिए मतदान के समय जनता के समक्ष दो स्पष्ट विकल्प थे। भाजपा-शिवसेना गठबंधन, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन। अब खबर यह है कि कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना गठबंधन की सरकार होगी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री होंगे। पहली बात तो यह कि जनता ने इस गठबंधन के लिए मतदान नहीं किया था, दूसरा यह कि यदि यह सरकार बन भी जाए तो वह न प्रभावी होगी, न टिकाऊ और न ही वह जनहित के काम कर पाएगी, क्योंकि आशंका यही है कि हम सिर्फ  विभिन्न घटकों की आपसी खींचतान का तमाशा देखेंगे, तीसरा यह कि यदि विपक्षी दलों के गठजोड़ से सरकार बनी तो भाजपा उसे चलने नहीं देगी।

यही नहीं, उसे सही मायनों में चुनी हुई सरकार कहना भी गलत होगा क्योंकि वह भानुमति का कुनबा होगी जिसकी कोई नैतिक पहचान नहीं हो सकती। कानून की पतली गलियों से निकलकर बनने वाली ऐसी हर सरकार, चाहे वह भाजपा के नेतृत्व वाली हो या किसी विपक्षी दल की हो, कानून का मजाक ही उड़ाती है। विभिन्न अध्ययनों से सिद्ध होता है कि देश का सिस्टम कैसा भी हो, लगभग 10 प्रतिशत लोग ईमानदार होते ही हैं और कुछ भी कर लें तो भी 10 प्रतिशत के लगभग लोग बेइमानी से बाज नहीं आते। समाज के शेष बचे 80 प्रतिशत लोग समाज की स्थितियों के अनुसार ढल जाते हैं। बेईमानी करने वाला फल-फूल रहा है, उसे कोई सजा नहीं मिल रही, बल्कि वह बेईमानी के बावजूद जीवन का ज्यादा आनंद ले रहा है अथवा सत्ता का सुख भोग रहा है, तो ये 80 प्रतिशत लोग भी बेईमानी पर उतर आते हैं। इसलिए कहा जाता है कि भ्रष्टाचार पर रोकथाम के लिए आवश्यक है कि हम सिस्टम की मजबूती की ओर ध्यान दें। हमारे समाज की अवनति का कारण ही यह है कि हमारे देश में सत्तारूढ़ लोगों ने अपने निहित स्वार्थों की खातिर सिस्टम को मजबूत बनाने के बजाय या तो सिस्टम बनाया ही नहीं, या फिर जानबूझकर उनमें खामियां छोड़ दीं। ऐसे में अब यह आवश्यक है कि कानून की पतली गलियों की पहचान करके उनकी नाकाबंदी की जाए।

ईमेलः indiatotal.features@gmail

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