विधानसभा चुनावों के सबक

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

इसमें कोई शक नहीं कि वीरभद्र सिंह के अलावा पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो भविष्य की संभावनाओं को बनाते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए तैयार किया जा सके। कांग्रेस कौल सिंह और विप्लव ठाकुर को लाकर मतदाताओं के बीच नए सिरे से प्रयास करने के अवसर का उपयोग करने में विफल रही, जिनके पास इस अंतर को भरने और भविष्य के नेताओं के रूप में पार्टी के लिए लड़ने की क्षमता थी। उधर महाराष्ट्र में शिवसेना अनुचित तरीके से सीएम पद को आधी अवधि के लिए पाने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के रूप में अपना पैर जमाने को कड़ी मेहनत कर रही है…

हाल ही में दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव संपन्न हुए। इन दोनों चुनावों को मोदी और भाजपा के लिए एसिड टेस्ट माना गया। इस तरह हर चुनाव मोदी की परीक्षा बन जाता है। पार्टी और मोदी से ज्यादा ये चुनाव इसमें भाग लेने वाले दलों और उनके नेतृत्व के लिए निर्णायक प्रश्न बन गए। हरियाणा और महाराष्ट्र न केवल मोदी के नेतृत्व के साथ सफलता के लिए आशा के प्रकाश-स्तंभ थे, बल्कि राज्य स्तरीय दलों के नेतृत्व की भी ये परीक्षा थे। एक अन्य छोटे राज्य हिमाचल प्रदेश में भी दो उपचुनाव हुए जिसमें भाजपा ने सभी दो सीटें जीतीं। इस मिनी चुनाव ने कांग्रेस के दिवालियापन को उजागर किया जबकि कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व पार्टी को इस तरह की अपमानजनक हार दिलाने के लिए एक कारक रहा। एक सीट पर उम्मीदवार हार गया, जबकि दूसरी सीट पर राष्ट्रीय पार्टी की जमानत ही जब्त हो गई। नेता हार से इतने असंतुष्ट थे कि पार्टी के एक वरिष्ठ पर्यवेक्षक ने राज्य में कांग्रेस के ऐसे निराशाजनक प्रदर्शन के कारणों पर एक ईमानदार सोच के साथ मंथन शुरू करने से ही इनकार कर दिया। इसमें कोई शक नहीं कि वीरभद्र सिंह के अलावा पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो भविष्य की संभावनाओं को बनाते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए तैयार किया जा सके। कांग्रेस कौल सिंह और विप्लव ठाकुर को लाकर मतदाताओं के बीच नए सिरे से प्रयास करने के अवसर का उपयोग करने में विफल रही, जिनके पास इस अंतर को भरने और भविष्य के नेताओं के रूप में पार्टी के लिए लड़ने की क्षमता थी।

उधर महाराष्ट्र में शिवसेना अनुचित तरीके से सीएम पद को आधी अवधि के लिए पाने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के रूप में अपना पैर जमाने को कड़ी मेहनत कर रही है। फडणवीस टिकट वितरण में शिवसेना के माध्यम से किसी तरह से बच सकते थे, लेकिन वह बाद में फंस गए। रणनीति देखें- इस चुनाव में दो पार्टियां कांग्रेस और एनसीपी ने चुनाव पूर्व समझौता किया था। उन्होंने पिछले चुनाव में स्वतंत्र रूप से जो मिला, उससे दोगुना पाने के लिए अच्छी तरह से लड़ाई लड़ी, लेकिन उनके पास गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए विश्वसनीयता नहीं थी क्योंकि पवार खुद इस दौड़ में नहीं थे। दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा ने पिछले पांच वर्षों के दौरान खुद को साबित कर दिया, बावजूद इसके कि देवेंद्र फड़नवीस अपने साथी शिव सेना के अव्यावहारिक रवैये के कारण अपंग हो गए थे। लेकिन उन्होंने पांच साल के शासन और टिकट वितरण के दौरान प्रदर्शित किया कि वह गठबंधन के तनाव को झेलने में सक्षम हैं तथा सफल हो सकते हैं। हालांकि पिछली बार की तुलना में भाजपा को चुनाव पूर्व गठबंधन की शर्तों के अनुसार टिकटों के वितरण के चलते कम सीटें मिलीं, इसके बावजूद फड़नवीस का स्ट्राइक रेट 67 फीसदी रहा, जिसे कोई भी आसानी से हासिल नहीं कर सकता था। यहां तक कि अगर वे शुरू में असफल रहे, तो यह स्पष्ट था कि फडणवीस के पास अपेक्षित नेतृत्व ओज था। उधर हरियाणा में कांग्रेस के लिए पुनरुत्थान का अच्छा अवसर था, लेकिन प्रबंधन में विफलता के कारण भाजपा के लिए बुरा सबक रहा। खट्टर टिकट वितरण और चुनाव के बाद के पैचअप में बुरी तरह विफल रहे थे। उनके 60 प्रतिशत उम्मीदवार असफल हुए और हार गए। इसके अलावा उनके 10 में से 7 मंत्री हार गए। पार्टी और उसका नेतृत्व क्या कर रहा था? दूसरी ओर, हालांकि हुड्डा पिछले चुनावों, जब वह असफल हो गए थे, की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर पाए, लेकिन इस बार चुनावी रणनीति चुनाव के बाद सरकार निर्माण के लिए प्रबंध कर पाने में विफलता के कारण फ्लाप हो गई। अमित शाह को आने वाले घटनाक्रमों के बारे में पता लग गया था और उन्होंने गठबंधन के बारे में चुनाव के नतीजे घोषित होने से पहले ही दुष्यंत चौटाला से बात कर ली थी। वे अन्य मामलों में भी तेजी से आगे बढ़ गए और कांग्रेस के कार्यकर्ता किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर रातों-रात हो गए गठबंधन से स्तब्ध रह गए। वे जानते थे कि सभी फैसलों में कांग्रेस देरी से निर्णय लेती है और उनके खराब विकल्प उन्हें असम से लेकर गोवा तक और पंजाब में भी ज्यादातर मामलों में फेल कर देते हैं। अगर उन्होंने पंजाब का मामला अमरिंदर सिंह पर नहीं छोड़ा होता तो वहां भी कांग्रेस को विफलता का सामना करना पड़ता। हुड्डा को कमान सौंपने का फैसला दो सप्ताह की लड़ाई के बाद लिया गया। सुरजेवाला जैसे जमीनी आधार से दूर नेताओं को तरजीह दी जा रही थी। स्पष्ट संदेश यह है कि नेतृत्व न केवल केंद्र बल्कि राज्य स्तर पर भी मायने रखता है। मुंबई और चंडीगढ़ दोनों उदाहरण प्रभावी नेतृत्व की सफलता और अन्य की विफलता को दर्शाते हैं। भाजपा का रणनीतिक प्रबंधन सरकार बनाने में कांग्रेस से बहुत आगे था, लेकिन हरियाणा में टिकट चयन और मुंबई में साझेदार से निपटने में वह विफल रहा।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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