चर्चा इनकी भी हो

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

नायडू ने बाकायदा एक पूरा विभाग खड़ा किया था जिसका काम जनता की शिकायतें नोट करना और उन्हें दूर करना था, लेकिन हर विभाग की तरह यह विभाग भी असल में कागजी कार्रवाई में लिप्त रहा और मुख्यमंत्री को झूठी रिपोर्ट देकर खुश करता रहा।  चंद्रबाबू नायडू ने अगर एक सबक नहीं सीखा तो वह था नौकरशाही और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता…

मुझे कुछ समय के लिए आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के कामकाज का तरीका देखने का मौका मिला था। वह नियमित रूप से उच्चाधिकारियों की बैठक लेते थे और प्रदेश भर में चल रहे कामकाज की समीक्षा होती थी। कहां सड़क बन रही है, कहां संडास बनाए जा रहे हैं, कहां विकास के अन्य काम हो रहे हैं आदि पर चर्चा चलती रहती थी। सुबह-सवेरे जाग कर योग करना और फिर काम पर लग जाना उनकी आदत थी। अड़सठ वर्ष की उम्र में भी सारा दिन लगातार काम करते हुए वह उबासी भी नहीं लेते थे। उनकी ऊर्जा वस्तुतः प्रशंसनीय थी। कमी शायद यह रही कि वे नौकरशाही पर बुरी तरह से आश्रित थे, हमारे देश की नौकरशाही काम करने के बजाय रिपोर्ट बनाकर पेश करने में माहिर है ही। नायडू ने बाकायदा एक पूरा विभाग खड़ा किया था जिसका काम जनता की शिकायतें नोट करना और उन्हें दूर करना था, लेकिन हर विभाग की तरह यह विभाग भी असल में कागजी कार्रवाई में लिप्त रहा और मुख्यमंत्री को झूठी रिपोर्ट देकर खुश करता रहा। दस वर्ष के वनवास के बाद सत्ता में आकर भी चंद्रबाबू नायडू ने अगर एक सबक नहीं सीखा तो वह था नौकरशाही और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता। वह वीडियो मीटिंग करते थे, रिपोर्ट लेते थे और खुश हो जाते थे। व्यक्तिगत रूप से खुद जाकर स्थिति का जायजा लेने से जो सूचना मिलती है वे उससे महरूम रहे। आमने-सामने की बातचीत में जो अपनापन आता है वह वीडियो मीटिंग में नहीं आ पाता। एक समूह के लोगों के साथ वीडियो मीटिंग में लोग मुख्यमंत्री को दिल की बात बताने के बजाय उनकी चाटुकारिता में समय लगाते थे। मोदी को न समझ पाने तथा नौकरशाही और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता की इन गलतियों ने उनकी सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया। यही कारण है कि वे कतिपय युवा तथा राज्य में घूम-घूम कर प्रचार करने वाले जगन रेड्डी से मात खा गए। चंद्रबाबू नायडू कल्पनाशील व्यक्ति हैं और ज्ञानवान भी हैं। हर विषय पर उनकी पकड़ बहुत गहरी है। उनसे बातचीत में मैं हमेशा उनसे प्रभावित ही हुआ। वह स्पष्टवादी हैं और अपनी गलतियां स्वीकार करने में उन्हें संकोच नहीं होता। अपने पिछले कार्यकाल में भी वे खुद को आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री कहने के बजाय खुद को आंध्र प्रदेश का सीईओ कहते थे और उसी ढंग से काम करते थे। हैदराबाद को साइबराबाद बनाने का श्रेय भी नायडू को ही है। उनके पिछले कार्यकाल में इसकी खूब चर्चा भी हुई, लेकिन तब भी कमी यही रही कि गांवों में बसा आम आदमी उनसे दूर होता चला गया और उन्हें सत्ता गंवाकर इसका मूल्य चुकाना पड़ा। इस बार भी उन्होंने अपनी वही गलती दोहराई और सत्ता से बाहर हो गए। तेलुगू देशम पार्टी दस वर्ष के वनवास के बाद सत्ता में आई थी। दल के बड़े पदाधिकारी इस अवसर का लाभ उठाने में संकोच नहीं कर रहे थे और वे बहुत कुछ निरंकुश व्यवहार कर रहे थे, और नौकरशाही हमेशा की तरह अपना खेल खेल रही थी। नायडू इसकी काट नहीं खोज पाए वरना उनके जेहन में बनने वाली योजनाओं में जनहित का अंश सदैव प्रमुख रहता था। लंबे समय से सत्ता में चले आ रहे नवीन पटनायक भी अपनी कल्पनाशीलता के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि ओडिशा से बाहर उनकी चर्चा इसलिए नहीं होती क्योंकि हमारे देश का दिल्ली-केंद्रित मीडिया प्रधानमंत्री के कहे-किए पर ज्यादा फोकस रखता है। किसी मुख्यमंत्री के बारे में तब चर्चा ज्यादा होती है जब राज्य में कोई उपद्रव हो रहा हो या वहां कोई प्राकृतिक संकट आन पड़ा हो। ओडिशा की गिनती पिछड़े राज्यों में होती है और देश के हर राज्य की तरह वहां भी झुग्गी-झोंपडि़यों का बोलबाला है। गरीब-गुरबा रोजगार की तलाश में शहर आ जाते हैं और शहर में या उसके आसपास किसी भी खाली पड़ी जमीन पर झुग्गी बना लेते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है और धीरे-धीरे वहां झुग्गी-झोंपडि़यों का एक पूरा तंत्र विकसित हो जाता है। सुविधाओं से वंचित इन कालोनियों में गंदगी, बदबू और छोटी-छोटी आड़ी तिरछी गलियों का साम्राज्य रहता है।

अकसर इन छोटी-छोटी झुग्गियों में गुजर-बसर कर रहा भरा-पूरा परिवार रहता है जो अपने नित्यकर्म की आवश्यकताओं के लिए शहर को और भी परेशान करता है। एक तरफ तो ये झुग्गियां शहरवासियों के लिए परेशानी का बायस हैं, और मखमल पर टाट के पैबंद की कहावत को चरितार्थ करती हैं, दूसरी तरफ  इनके कारण शहर भर को सस्ती मजदूरी में काम करने वाले लोग मिल जाते हैं। शहर के अंदर होने के कारण इन्हें आसपास ही रोजगार मिल जाता है जो इन्हें अपने गांव में उपलब्ध नहीं था, यही कारण है कि ये अपना गांव छोड़ एक नई जगह पर ठीया जमाने के लिए आ बसते हैं। शहर के अंदर झुग्गी-बस्तियों का विस्तार एक दुधारी तलवार जैसा है जो शहरवासियों के लिए गंदगी, बदबू और अस्वास्थ्यकर वातावरण देता है, लेकिन साथ ही शहर भर के लिए सस्ता श्रम भी उपलब्ध करवाता है। परिणाम यह है कि इन्हें शहर से दूर हटाया भी नहीं जा सकता क्योंकि शहर से दूर कर देने की स्थिति में न केवल ये बेरोजगार हो जाएंगे बल्कि शहरवासी भी इनकी सेवाओं से वंचित हो जाएंगे। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस समस्या के समाधान के लिए ड्रोन की तकनीक का लाभ उठाते हुए ड्रोन से खाली जमीन की मैपिंग करवाई और अब झुग्गीवासियों को सीधे जमीन दे दी जाएगी, वह भी मुफ्त। यह एक तथ्य है कि जहां-जहां झुग्गी-झोपडि़यां खड़ी होती हैं, कुछ समय बाद हर उस जगह पर बाहुबलियों का दखल शुरू हो जाता है और वे सरकारी जमीन पर बैठे हुए इन गरीबों से किराया वसूल करने लग जाते हैं। ऐसे में नवीन पटनायक का यह काम सचमुच प्रशंसनीय है कि उन्होंने ड्रोन तकनीक के प्रयोग से लैंड-मैपिंग का काम करवा लिया, यही काम अगर पारंपरिक ढंग से करना होता तो उसमें बरसों खप जाते। इन नई बस्तियों में सड़क और गलियां साफ होंगी, झुग्गीवासी स्वास्थ्यकर वातावरण में रह सकेंगे और शहर भर को गंदगी और बदसूरती से मुक्ति मिल जाएगी। इस एक अकेले निर्णय से न केवल काम तुरंत हुआ बल्कि कुशलतापूर्वक हुआ और उसके अगले हिस्से के काम पर अमल शुरू हो सका। पत्रकारिता के लिहाज से यह शायद महत्त्वपूर्ण खबर नहीं है इसलिए इसकी मीडिया में गूंज नहीं है, लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे छोटे-छोटे निर्णय भी बड़े परिवर्तन का कारण बनते हैं और इनकी चर्चा होनी ही चाहिए।  

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