नागरिकता कानून के विरोधी

Jan 18th, 2020 12:06 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ब्रिटिश सरकार का हित इसमें था कि एक नया इस्लामी देश बना कर उसे इस्लामी देशों की कमान सौंपी जा सके और उसका उपयोग भारत में रूसी साम्यवाद को रोकने के लिए किया जाए। इसके साथ ही भारत का एक स्थायी दुश्मन उसके पड़ोस में खड़ा कर दिया जाए ताकि भारत कभी भी विश्व के राजनीतिक-सांस्कृतिक मानचित्र पर प्रमुख भूमिका न निभा सके…

जो लोग और राजनीतिक दल विभाजन के समय सक्रिय थे और किसी सीमा तक उसके लिए उत्तरदायी भी थे, लगता है कि वे आज भी किसी न किसी रूप में सक्रिय हैं। इन दोनों के समान धरातल और मनोविज्ञान को समझने के लिए जरूरी है कि भारत विभाजन के लिए कार्यरत शक्तियों व राजनीतिक दलों को समझा जाए। ब्रिटिश सरकार, मुस्लिम लीग और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने निहित स्वार्थों के लिए भारत को विभाजित करना चाहते थे या फिर भारत विभाजन का समर्थन कर रहे थे। इन तीन समूहों के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी हालत में भारत विभाजन के विरोधी थे। ब्रिटिश सरकार भारत को अपने भावी राजनीतिक हितों के लिए विभाजित करना चाहती थी।ब्रिटिश सरकार का हित इसमें था कि एक नया इस्लामी देश बना कर उसे इस्लामी देशों की कमान सौंपी जा सके और उसका उपयोग भारत में रूसी साम्यवाद को रोकने के लिए किया जाए। इसके साथ ही भारत का एक स्थायी दुश्मन उसके पड़ोस में खड़ा कर दिया जाए ताकि भारत कभी भी विश्व के राजनीतिक-सांस्कृतिक मानचित्र पर प्रमुख भूमिका न निभा सके। जहां तक भारतीय साम्यवादी पार्टी यानि सीपीआई का प्रश्न था, जब से उसने जर्मनी के कार्लमार्क्स को पढ़ लिया था तब से वह भारत में भी शोषक और शोषित नामक दो वर्गों की तलाश में जुट गई थी। उनकी इस खोज के बाद सारी व्याख्या बहुत सरल हो गई। पाकिस्तान बनने का अर्थ, शोषित वर्ग का शोषक वर्ग से मुक्त हो जाना था क्योंकि उसकी दृष्टि में भारत के मतान्तरित मुसलमान सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि थे। इसलिए सीपीआई (उन दिनों सभी कम्युनिस्ट सीपीआई में ही थे), चीन और रूस के समर्थन को लेकर सीपीआई और सीपीएम में उनका विभाजन 1962 में हुआ था, पाकिस्तान बनाए जाने का समर्थन करने में जुट गई क्योंकि पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ तथाकथित वर्ग संघर्ष में सर्वहारा की पूंजीपति हिंदू समाज पर पहली जीत होगी। उसको लगता था कि यदि पाकिस्तान बन जाता है तो वहां सर्वहारा वर्ग की सत्ता आसानी से स्थापित की जा सकती है। यही कारण था कि पाकिस्तान के बनते ही उसने अपने अनेक बुद्धिजीवियों को पाकिस्तान की ओर रवाना कर दिया ताकि सर्वहारा की सत्ता स्थापना में देरी न हो जाए। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस विभाजन का विरोध कर रही थी, लेकिन दुर्भाग्य से इस लड़ाई का जब अंतिम पहर आया तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने हथियार डाल दिए और विभाजन की ब्रिटिश योजना को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने विभाजन की योजना को क्यों स्वीकार कर लिया, इसको लेकर अब भी बहस चलती रहती है। अंतिम समय में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के आगे हथियार डाल देने के कारण आम भारतीय की नजर में विभाजन की सबसे बड़ी गुनाहगार कांग्रेस बन गई थी क्योंकि कांग्रेस ने 1946 के चुनाव इसी वायदे पर लड़े थे कि वह भारत को विभाजित करने की ब्रिटिश योजना का हर हालत में विरोध करेगी । भारतीयों ने कांग्रेस के उस वायदे पर विश्वास किया था। भारतीय कांग्रेस के इस वायदे पर उतना विश्वास शायद न करते यदि यह वायदा नेहरू या कोई अन्य कांग्रेसी नेता कर रहा होता, लेकिन कांग्रेस की ओर से यह वायदा महात्मा गांधी कर रहे थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू से ही भारत विभाजन का विरोधी था, लेकिन जब पाकिस्तान बन गया तो संघ के आगे स्पष्ट था कि मजहबी आधार पर गठित पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को बहुत देर तक अपने पंथ या रिलीजन पर बने रहना संभव नहीं होगा। इसलिए उसने यथाशक्ति पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों को भारत में ले आने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इस पूरे प्रकरण में  सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति महात्मा गांधी की थी। गांधी ने ही कांग्रेस की ओर से भारतीयों को गारंटी दी थी कि विभाजन मेरी लाश पर होगा, लेकिन अब कांग्रेस ने गांधी को अंगूठा दिखाते हुए, सत्ता के लालच में करोड़ों भारतीय नागरिकों की नागरिकता की बलि देते हुए  भारत विभाजन को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने गांधी को व्यावहारिक रूप से अपने मुहल्ले से निष्कासित कर दिया था क्योंकि कांग्रेस अब सत्ता सुख भोगना चाहती थी। इसलिए वह चाहती थी कि उसके सामने अब पाकिस्तान का प्रश्न कोई न उठाए। क्योंकि वह उस दर्पण में अपना चेहरा नहीं देख सकती थी जिस पर विश्वासघात का कीचड़ चिपक गया था। यही कारण था कि वह पाकिस्तान से आने वाले हिंदू-सिखों को किसी भी तरह रोकना चाहती थी। शायद कांग्रेस भी जानती थी कि अब पाकिस्तान से आने वाले हिंदू-सिखों का यह प्रवाह कभी समाप्त नहीं होगा। जब तक ये शरणार्थी हिंदू-सिख पाकिस्तान से भारत की ओर अपनी नागरिकता मांगने के लिए आते रहेंगे तब तक कांग्रेस का पाप सिर चढ़ कर बोलता रहेगा। देश के विभाजन के बाद शेष बचे हिंदोस्तान में मुस्लिम लीग को शुरू के दौर में काम करना कठिन हो गया, लेकिन जल्दी ही उसने अपना चोला बदला और अलग-अलग मुस्लिम संगठनों के नाम से फिर से काम शुरू कर दिया। अधिकांश तो कांग्रेस में ही घुस गए। कांग्रेस ने उनका खुले दिल से स्वागत किया क्योंकि उसे अपने आपको हिंदू-मुसलमानों की सांझी पार्टी कहलवाने का शौक जुनून की हद तक था। जिन्ना कांग्रेस पर आरोप लगाते थे कि कांग्रेस हिंदुओं की पार्टी है, उसके इस आरोप को झूठा सिद्ध करने के लिए कांग्रेस उतने ही जोर से मुस्लिम तुष्टीकपण में जुट जाती थी। तभी अंबेडकर ने गुस्से में आकर कहा था कि कांग्रेस तो मुसलमानों को कोरे चैक पर हस्ताक्षर करके देने के लिए भी तैयार है। स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस का संरक्षण पाकर मुस्लिम लीग मनोवृत्ति के दल फिर से सक्रिय हो गए। नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध करने में इटली लॉबी और मुस्लिम लीग का यही समान अधिकार है । यही कारण है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विरोध करते हुए तथाकथित छात्र नारे लगाते हैं कि हिंदुत्व तेरी कब्र बनेगी एएमयू के मैदानों में और कांग्रेस के कपिल सिब्बल कहते हैं कि हिंदुत्व भारत के लिए अभिशाप है। यहां आकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग वैचारिक स्तर पर एकाकार हो जाते हैं। इस प्रकार कांग्रेस की इटली लॉबी, कम्युनिस्ट समूहों व मुस्लिम लीग मानसिकता के समूहों के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध, भारत की अवधारणा का ही विरोध है जिसके लिए वे अनेक दशकों से लगे हुए हैं । इस विरोध के कारण केवल राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि इसकी जड़ें कहीं न कहीं भारत की अस्मिता, अवधारणा और विरासत के विरोध में धंसी हुई हैं।

ईमेल : kuldeepagnihotri@gmail.com

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