वित्तीय घाटे का कठिन प्रश्न

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

वित्तीय घाटा उस रकम को बोलते हैं जो सरकार अपनी आय से अधिक खर्च करती है। जैसे सरकार की आय यदि 80 रुपए हो और सरकार खर्च 100 रुपए करे तो वित्तीय घाटा 20 रुपए होता है। वित्तीय घाटे का अर्थ हुआ कि सरकार अधिक किए गए खर्च की रकम को ऋण के रूप में बाजार से उठाती है। इस ऋण को भविष्य में सरकार को अदा करना होता है…

एनडीए-2 सरकार ने पिछले छह वर्षों में वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने की नीति को अपनाया है, लेकिन परिणाम अच्छे नहीं रहे हैं। हमारी विकास दर लगातार घटती ही जा रही है। वित्तीय घाटा उस रकम को बोलते हैं जो सरकार अपनी आय से अधिक खर्च करती है। जैसे सरकार की आय यदि 80 रुपए हो और सरकार खर्च 100 रुपए करे तो वित्तीय घाटा 20 रुपए होता है। वित्तीय घाटे का अर्थ हुआ कि सरकार अधिक किए गए खर्च की रकम को ऋण के रूप में बाजार से उठाती है। इस ऋण को भविष्य में सरकार को अदा करना होता है। यदि वर्तमान में सरकार वित्तीय घाटे को बढ़ाकर ऋण लेती है तो उसका बोझ देश पर आने वाले समय में पड़ता है। तब सरकार को अधिक टैक्स वसूलकर इस ऋण की अदायगी करनी होती है। वर्तमान खर्च को भविष्य की आय से पोसने का मंत्र वित्तीय घाटा होता है। वित्तीय घाटे पर नियंत्रण की नीति को पूर्व में इसलिए अपनाया गया था कि विकासशील देशों की सरकारों द्वारा ऋण लेकर खपत की जा रही थी। जैसे सरकार ने ऋण लेकर मंत्रियों के लिए लग्जरी कार खरीदी तो उससे सरकारी खर्च बढ़ा, लेकिन आय नहीं बढ़ी। इस प्रकार के खर्च से बचने के लिए यह मंत्र बनाया गया कि सरकार अपने खर्चों को नियंत्रित करे जिससे कि इस प्रकार की फिजूलखर्ची न हो। सोच थी कि यदि सरकार द्वारा वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखा जाएगा तो निवेशकों का सरकार और अर्थव्यवस्था पर भरोसा बनेगा। जिस प्रकार खरीददार भरोसेमंद सुनार के यहां जाकर ज्वेलरी खरीदता है, उसी प्रकार निवेशक भरोसेमंद सरकार वाले देश में निवेश करेंगे। बताते चलें कि जब सरकार अपने वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखती है यानी अपने खर्च कम करती है तो सरकारी निवेश में कटौती करनी पड़ती है। जैसे सरकार यदि नया हाई-वे बनाना चाहती है, लेकिन सरकार के पास बनाने के लिए रकम नहीं है तो सरकार ऋण लेकर, यानी वित्तीय घाटा बढ़ाकर, उस हाई-वे को बना सकती है, लेकिन वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखने के पक्ष में सोच है कि यदि सरकार ने हाई-वे नहीं बनाया तो निजी निवेशक उस हाई-वे को बना दें तो ‘सोने पे सुहागा’ जैसा होगा।

सरकार का वित्तीय घाटा भी नियंत्रण में आ जाएगा और हाई-वे भी बन जाएगा, लेकिन पिछले छह वर्षों का हमारा कटु अनुभव यह रहा है कि सरकार द्वारा वित्तीय घाटे पर लगातार नियंत्रण करने के बावजूद निजी निवेश नहीं बढ़ रहा है, हाई-वे इत्यादि में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है और अर्थव्यवस्था की गति लगातार गिर रही है। इसलिए वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के मंत्र पर पुनः विचार करने की जरूरत है। जब निजी निवेश नहीं आ रहा हो तब वित्तीय घाटे को और अधिक नियंत्रित करने से लाभ होने की संभावना कम ही होती है। जैसे यदि मरीज को पर्याप्त एंटीबायोटिक दवाई दी जा रही हो और उसकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा हो, तो उसे और तगड़ी एंटीबायोटिक दावा देने से उसके स्वास्थ्य के सुधरने की संभावना कम ही होती है। इसलिए डाक्टर को चाहिए इस बात को समझे कि उसे एंटीबायोटिक दवा की ताकत बढ़ाने की जरूरत है अथवा दवा बदलने की जरूरत है। मेरा मानना है कि पिछले छह वर्षों में हमारी सरकार वित्तीय घाटे को लगातार नियंत्रण में रख रही है और हमारी अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य भी बिगड़ता जा रहा है, इसलिए अब नीति को बदलने की जरूरत है। वित्तीय घाटे को और अधिक नियंत्रण करने से नुकसान ही होने की अधिक संभावना है। अतः जब निजी निवेश नहीं आ रहा है तब सरकार को ऋण लेकर स्वयं निवेश करना चाहिए जिससे कि अर्थव्यवस्था में मांग बने और अर्थव्यवस्था चल निकले। यहां सावधानी यह बरतनी है कि ऋण में ली गई रकम का वास्तव में उत्पादक निवेश किया जाए। जैसे सरकार ने यदि ऋण लेकर हाई-वे बनाया तो माल की ढुलाई सस्ती हुई, अर्थव्यवस्था में गति आई और उस गतिमान अर्थव्यवस्था में जीएसटी की वसूली अधिक हुई, जिससे उस ऋण को अदा किया जा सकता है। यह उसी प्रकार है जैसे एक सफल उद्यमी ऋण लेकर फैक्टरी लगाता है। वह फैक्टरी से अर्जित आय से ऋण की अदायगी कर देता है। इसी प्रकार सरकार यदि वित्तीय घाटा बढ़ाकर ऋण ले और उसका निवेश करे तो उस निवेश से हुई अर्जित आय से वह उस ऋण को अदा कर सकती है। इस मंत्र में गड़बड़ी तब होती है जब ऋण ली गई रकम का उपयोग लग्जरी कार खरीदने में किया जाता है क्योंकि उससे अतिरिक्त आय उत्पन्न नहीं होती है और ऐसे हालात में वह ऋण अर्थव्यवस्था पर एक बोझ बन जाता है।

एनडीए सरकार मूल रूप से ईमानदार दिखती है, इसलिए उसे अपनी झिझक छोड़कर, ऋण लेकर निवेश करने चाहिएं और अर्थव्यवस्था को गति देनी चाहिए। विचारणीय विषय यह है कि इन परिस्थितियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और भारतीय मूल के अमरीकी प्रोफेसर क्यों वित्तीय घाटे को नियंत्रण करने की नीति को और गहराई से लागू करने पर जोर दे रहे हैं। मेरा मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में जब घरेलू निवेशक कुंडली मार के बैठे हुए हैं उस परिस्थिति में वित्तीय घाटे को नियंत्रण करने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुला मैदान मिलता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं पर मूल रूप से अमरीकी सरकार का वर्चस्व है और अमरीकी सरकार पर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अमरीकन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ाया जाता है। वे चाहते हैं कि विकासशील देशों की सरकारें अपने वित्तीय घाटे को नियंत्रण करें जिससे कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़े। कमजोर पड़ने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुला मैदान मिल जाए। जैसे यदि भारत सरकार ने हाई-वे नहीं बनाया तो कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी इसे बना सकती है और यात्रियों से भारी टोल टैक्स वसूल कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दुराग्रह को बढ़ने में विशेष योगदान भारत सरकार के अधिकारियों का रहता है। उनके बच्चे अकसर इन्हीं संस्थाओं में अथवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेवा करते हैं अथवा वे स्वयं सेवानिवृत्ति के बाद इन कंपनियों में सेवा करने को उत्सुक होते हैं, इसलिए इन अधिकारियों की मानसिकता ही हो जाती है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ाएं। अपने इन हितों को बढ़ाने के लिए वे भारत सरकार पर लगातार दबाव डालते हैं कि वह वित्तीय घाटा नियंत्रण में रखें जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुला मैदान मिले। अर्थव्यवस्था कमजोर पड़े तो इन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता है, चूंकि इनके वेतन सुरक्षित रहते हैं। इसलिए सरकार के सामने है कि वित्तीय घाटे को बढ़ने दे और निवेश करे जिससे कि भारत की अर्थव्यवस्था पुनः पटरी पर आ सके।

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