शिक्षा में भारतीय भाषाओं की महत्ता

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

व्यक्तिगत रूप में मुझे संस्कृत भाषा पर बहुत अभिमान है। यह भाषा मुझे ठीक से आनी चाहिए, ऐसा मुझे आज भी लगता है। मैं अब खुद ही संस्कृत पढ़ता हूं। अपने इस परिश्रम के कारण मैं थोड़ी-थोड़ी संस्कृत पढ़ने व समझने लगा हूं। इस भाषा में प्रवीण होने की मेरी तीव्र इच्छा है। पता नहीं वह दिन कब आएगा?….संस्कृत साहित्य की तुलना में फारसी साहित्य एकदम फीका  है। संस्कृत साहित्य में काव्य है, काव्य मीमांसा है, अलंकार शास्त्र है, नाटक है, आधुनिक ज्ञानशाखाओं की दृष्टि से संस्कृत साहित्य में सब कुछ है। संस्कृत भाषा मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो, इसके संबंध में मेरे मन में विलक्षण आत्मीयता थी लेकिन दुष्टकृत्यों वाले तथा संकुचित दृष्टिकोण के लोगों के कारण मुझे संस्कृत से दूर रहना पड़ा, अंबेडकर की दृष्टि में भारतीय संदर्भों में संस्कृत की महत्ता कितनी थी…

संपूर्ण देश में राष्ट्र बोध को संपुष्ट करने में शिक्षा की असाधारण भूमिका है। इसमें भारतीय भाषाओं की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अंबेडकर इस प्रयोग में संस्कृत को प्रथम स्थान पर रखते हैं। उनकी दृष्टि में आधुनिक ज्ञान की सभी शाखाएं संस्कृत साहित्य में उपलब्ध हैं। वे संस्कृत नहीं पढ़ पाए, इसका उन्हें उम्र भर मलाल रहा। वह कहते हैं, ‘मैं संस्कृत पढूं, ऐसी मेरे पिताजी की तीव्र इच्छा थी। परंतु मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। उसका भी एक कारण था। मैं और मेरे बड़े भाई सातारा के स्कूल में पढ़ते थे। जब बड़े भाई चौथी कक्षा में पहुंचे तब उनकी इच्छा संस्कृत विषय लेने की थी। उनके मन की इच्छा थी कि मैं संस्कृत का बड़ा विद्वान बनूं, लेकिन स्कूल में संस्कृत के अध्यापक ने कहा कि वे अस्पृश्यों के बारे में अपमानजनक बोलते थे।

मैं भी जब चौथी में पहुंचा तो मुझे पता ही था कि संस्कृत नहीं पढ़ाएंगे। इसलिए मजबूरी में मेरे बड़े भाई को संस्कृत के स्थान पर फारसी लेनी पड़ी। संस्कृत के वे अध्यापक क्लास में भी अस्पृश्यों के बारे में अपमानजनक बोलते थे। मैं भी जब चौथी कक्षा में  पहुंचा तो मुझे पता ही था कि संस्कृत के अध्यापक तो यही होंगे। इसलिए मजबूरी में मैं भी फारसी की ओर मुड़ा। व्यक्तिगत रूप में मुझे संस्कृत भाषा पर बहुत अभिमान है। यह भाषा मुझे ठीक से आनी चाहिए, ऐसा मुझे आज भी लगता है। मैं अब खुद ही संस्कृत पढ़ता हूं। अपने इस परिश्रम के कारण मैं थोड़ी-थोड़ी संस्कृत पढ़ने व समझने लगा हूं। इस भाषा में प्रवीण होने की मेरी तीव्र इच्छा है। पता नहीं वह दिन कब आएगा?….संस्कृत साहित्य की तुलना में फारसी साहित्य एकदम फीका  है।

संस्कृत साहित्य में काव्य है, काव्य मीमांसा है, अलंकार शास्त्र है, नाटक है, आधुनिक ज्ञानशाखाओं की दृष्टि से संस्कृत साहित्य में सब कुछ है। संस्कृत भाषा मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो, इसके संबंध में मेरे मन में विलक्षण आत्मीयता थी लेकिन दुष्टकृत्यों वाले तथा संकुचित दृष्टिकोण के लोगों के कारण मुझे संस्कृत से दूर रहना पड़ा, अंबेडकर की दृष्टि में भारतीय संदर्भों में संस्कृत की महत्ता कितनी थी इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने संस्कृत को देश की राजभाषा बनाने के लिए संविधान सभा में इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। जब संविधान सभा में राजभाषा को लेकर बहस चल रही थी, तब राजभाषा के संबंध में कुछ संशोधन प्रस्ताव आए।

उनमें से एक प्रस्ताव संस्कृत को संघ की राजभाषा बनाने के लिए था। परंतु यह संशोधन पारित नहीं हो सका। समाचार पत्रों ने यह खबर दी थी कि भारत के विधि मंत्री डा. अंबेडकर ने भारत की राजकीय भाषा हेतु संस्कृत का समर्थन किया है। डा. अंबेडकर की इच्छा थी कि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के विषय में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के कार्यकारी  मंडल में 10 सितंबर 1946 को प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए, लेकिन उनका यह उत्साह केवल संस्कृत के लिए ही नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के लिए था। उनकी दृष्टि में मातृभाषा तो अभिमान की वस्तु है। पुणे में अंग्रेजी ठीक से बोलता हूं लेकिन मुझे अभिमान अपनी मराठी भाषा का ही है। चाहते थे कि राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी सभी को अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए। मराठी उत्कृष्ट भाषा है, मैं उसे ठीक से जानता हूं, ठीक से लिखता भी हूं, परंतु अब भविष्य में केवल मराठी से कैसे काम चलेगा?

मुझे तो पूरे भारत का एकीकरण करना है, उसके लिए मुझे यहां की पूरी जनता की समझ में आ जाए, ऐसी हिंदी भाषा सीखनी पड़ेगी। मेरी मराठी, मेरा गुजराती, मेरी बंगाली, मेरी कन्नड़ ऐसी संकुचित वृत्ति से अब काम नहीं चलेगा। पूरे भारत की एक भाषा हो, उसके लिए हमें आरंभ से ही हिंदी को अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाना होगा। इस समय यहां की अधिकांश जनता अशिक्षित ही है। केवल 10 फीसदी लोग ही लिखना-पढ़ना जानते हैं। इसका उपयोग कर सारी जनता को हिंदी पढ़ाने की व्यवस्था की जाए, तब इस राष्ट्र की एक बहुत बड़ी समस्या हल हो जाएगी। देश में एक संपर्क भाषा होनी चाहिए और वह हिंदी ही हो सकती है। वह केवल यही नहीं रुके, उनको लगता था कि पूरे देश में राष्ट्रीय बोध जागृत करने के लिए भारत की सब भाषाओं की एक ही लिपि होनी चाहिए और वह देवनागरी हो सकती है।

वह महाराष्ट्र के एकीकरण का आंदोलन चलाने वालों से पूछते हैं कि आप लोग भारत को एक राष्ट्र कहते हैं न? अथवा एक राष्ट्र हो, ऐसा आपको लगता है न? अब मुझे पूछने दो कि एक राष्ट्र होने के लिए आपने अब तक कौन से और कितने प्रयत्न किए हैं? पूरे भारत में आदान-प्रदान के लिए एक लिपि हो, इसके लिए क्या आपने कभी प्रयत्न किए? एक लिपि शुरू करें, ऐसा आपके मन में कभी विचार भी आया? फिर आप इस देश में एक राष्ट्रीतत्व की भावना कैसे स्थापित करेंगे?

अगर मराठी, हिंदी, गुजराती तथा बंगला इत्यादि देश की प्रमुख भाषाएं देवनागरी लिपि में लिखी जाने लगें या छपने लगें तो मैं सहजता से बंगाली पढ़ सकता हूं, गुजराती भी पढ़ सकता हूं। तब उनके साहित्य के बारे में एक प्रकार की आत्मीयता का निर्माण हो जाएगा। इस कारण से एक राष्ट्रीयत्व भाव में कितनी प्रगति हो जाएगी।

ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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