सच बोलने वाली सरकार चाहिए

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

सत्या नडेला भारतीय मूल के हैं। वे अमरीका में रह रहे हैं और उन्हें माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनी का सीईओ बनने का अवसर मिला। वह यह कहना चाह रहे हैं कि अन्य देशों के लोग यदि भारत में आएं तो उन्हें यहां की कंपनियों का सीईओ बनने का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। इसमें उनका धर्म या देश आड़े नहीं आना चाहिए…

माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने नागरिकता संशोधन कानून से जुड़ा जो बयान दिया है उसके गहन विश्लेषण की आवश्यकता है। उन्होंने देश के वर्तमान हालात को दुखद बताते हुए कहा जो है उसका भावार्थ है कि मैं यह देखना पसंद करूंगा कि एक बांग्लादेशी अप्रवासी भी यदि भारत आए तो उसे इंफोसिस का अगला सीईओ बनने का अवसर मिल सके। सत्या नडेला भारतीय मूल के हैं। वे अमरीका में रह रहे हैं और उन्हें माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनी का सीईओ बनने का अवसर मिला। वह यह कहना चाह रहे हैं कि अन्य देशों के लोग यदि भारत में आएं तो उन्हें यहां की कंपनियों का सीईओ बनने का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। इसमें उनका धर्म या देश आड़े नहीं आना चाहिए। उनका मानना है कि यदि ऐसा होगा तो भारत में अन्य देशों के काबिल लोगों का भारत आना संभव हो सकेगा जो अंततः देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होगा। उन्होंने एक ट्वीट करके इसी भावना को दर्शाया है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है… ‘मैं भारतीय विरासत से जुड़ा हूं, बहुसांस्कृतिक भारत में पला-बढ़ा हूं और अमरीका में मेरे पास अप्रवासी होने का अनुभव है। मैं ऐसे भारत की उम्मीद करता हूं जहां एक अप्रवासी किसी स्टार्ट-अप को शुरू कर सकता हो या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का नेतृत्व कर सकता हो, जिससे भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर फायदा मिले।’ गूगल, उबर, एमेजन और फेसबुक जैसी दुनिया की कई बड़ी कंपनियों में काम करने वाले भारतीय मूल के 150 प्रोफेशनल्स ने भी इसी भावना के वशीभूत होकर नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ  खुला खत लिखा था। यही नहीं, कुछ दिन पहले 106 सेवानिवृत्त अफसरों ने देश के आम लोगों के नाम खत लिखकर इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था और एनपीआर और एनआरसी को गैर-जरूरी बताया था। इनमें दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग, पूर्व कैबिनेट सचिव के.एम. चंद्रशेखर, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला सहित तमाम बड़ी हस्तियां शामिल थीं। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार कार्यालय ने भी इसे भेदभाव करने वाला और भारत के संविधान में प्रदत्त समानता के संकल्प को कमजोर करने वाला कानून बताया है। यह कानून सही है या गलत है, इसकी बहस में न जाएं तो भी यह देखना आवश्यक है कि सरकार इन कानूनों के बारे में समय-समय पर खुद क्या कहती रही है।

गृहमंत्री अमित शाह ने टाइम्स नाउ को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड और पैन कार्ड ही नहीं बल्कि पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। कुछ दिन पहले न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने भी सरकारी सूत्रों के हवाले से ऐसी ही एक खबर छापी थी। उन्होंने न केवल संसद में बल्कि कई बार इंटरव्यू में और विभिन्न जनसभाओं में भाषण देते हुए कहा है कि एनआरसी आएगा, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी पिछले ही वर्ष एक जनसभा में जोर दे कर कहा कि उनकी सरकार आने के बाद देश में कभी एनआरसी पर चर्चा नहीं हुई है और कहीं कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बने हैं। दरअसल यह उस तकनीक का प्रतिरूप है जिसमें कहा गया है कि इतना बड़ा झूठ बोलो और उसे इतनी बार दोहराओ कि लोग उसे सच मान लें। सवाल सिर्फ  यह नहीं है कि एनआरसी लागू होगा या नहीं, सवाल सिर्फ  इतना भी नहीं है कि एनआरसी सही है या गलत, सवाल यह भी है कि सरकार के दो प्रमुख प्रतिनिधि देश को बहकाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? अगर आपने अपने घोषणा पत्र में एनआरसी लाने का वादा किया है और इस पर यदि जनता ने आपको समर्थन दिया है तो एनआरसी लाइए, उसके प्रारूप पर खुली बहस करवाइए ताकि जो कानून बने वह जनहितकारी हो, झूठ क्यों बोलते हैं? प्रधानमंत्री कहते हैं कि एनआरसी पर चर्चा तक नहीं हुई और गृहमंत्री कहते हैं कि एनआरसी अवश्य आएगी। यह कहना गलत होगा कि इससे पहले की सरकारें सच बोलती थीं। कांग्रेस शासन में भी हमेशा झूठ पर झूठ बोले जाते थे। कांग्रेस का झूठ ही वह कारण था जिसने एक जमाने में लोकनायक जय प्रकाश को आंदोलन की राह पर चलने को विवश किया और हाल के सालों में अन्ना हजारे के आंदोलन को देश का समर्थन दिलाया।

जनता झूठ नहीं चाहती, न कांग्रेस से, न भाजपा से, न किसी अन्य सरकार से। लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई किसी भी सरकार से देश के नागरिकों की तीन अपेक्षाएं होती हैं। एक, सरकार जो कहे उस पर अमल करे। दो, सरकार का कोई भी व्यक्ति या अंग पूर्णतः निरंकुश न हो। तीन, सरकार जो कानून बनाए उसके जनहितकारी होने का पूरा इंतजाम करे। अभी इसी माह 6 जनवरी को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट में कहा कि वह देश की कांग्रेस को, यानी संसद को, बताना चाहते हैं कि यदि ईरान ने किसी अमरीकी टारगेट या व्यक्ति पर हमला किया तो उस पर उससे ज्यादा बड़ी मात्रा में जवाबी हमला किया जाएगा, तो तुरंत अमरीका हाउस फारेन अफेयर्स कमेटी की ओर से जवाबी ट्वीट आया कि ट्रंप महोदय को युद्ध संबंधी शक्तियों का कानून पढ़ लेना चाहिए क्योंकि अमरीकी संविधान के मुताबिक इस निर्णय का अधिकार देश की कांग्रेस के पास है। हमारे देश में यह भ्रांत धारणा है कि अमरीकी राष्ट्रपति सर्वशक्तिमान होता है, तानाशाह जैसा होता है। सच तो यह है कि यदि भारतीय प्रधानमंत्री के पास पूर्ण बहुमत हो और आधे से अधिक राज्यों की सरकारें उनके दल की हों तो वह सचमुच सर्वशक्तिमान सरीखा होता है, वह देश का संविधान बदल सकता है, यहां तक कि वह चुनाव आयोग जैसी किसी महत्त्वपूर्ण संवैधानिक संस्था को भी भंग कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल नोटबंदी लागू की बल्कि योजना आयोग को भंग करके नीति आयोग बना दिया। तो हमें समझना चाहिए कि आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सच बोलने वाली होनी चाहिए, सरकार जो कानून बनाना चाहे उस पर खुली बहस होनी चाहिए ताकि नया कानून वास्तव में जनहितकारी हो तथा सरकार का कोई प्रतिनिधि या शासन का कोई अंग निरंकुश न हो सके। समस्या यह है कि वर्तमान सरकार न केवल तानाशाही ढंग से व्यवहार कर रही है बल्कि अपने निर्णयों को जनहितकारी मुखौटा देने के लिए झूठ पर झूठ बोले जा रही है। देखना यही है कि सरकारों के इस दोगले चरित्र पर रोक लगाने के लिए हम क्या कर सकते हैं।

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