‘आप’ ने भाजपा को उखाड़ फेंका

By: Feb 14th, 2020 12:06 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 282 सीटें मिलीं, जबकि 2015 में विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीटें मिलीं, बाकी तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 303 सीटें मिलीं, जबकि इस बार विधानसभा चुनाव में लगभग पिछली बार वाली स्थिति ही रही है। आप को 62 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को केवल आठ सीटों पर संतोष करना पड़ा…

भाजपा, जिसका एक गौरवमयी इतिहास रहा है और जिससे कई बड़े बुद्धिजीवी जुडे़ हुए हैं, वह एक ऐसी नई नवेली पार्टी से हार गई, जो अरविंद केजरीवाल की एक नेता पर आधारित पार्टी है। इस पार्टी से कभी प्रशांत भूषण, योगिंद्र यादव व कई अन्य लोग भी जुड़े रहे हैं। ये लोग अन्ना आंदोलन के समय से ही इससे जुड़े थे, वह आंदोलन जिसने इस पार्टी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में ये पार्टी को छोड़कर चले गए। केजरीवाल ने पार्टी के लिए ऐसी व्यवस्था की कि उसे विदेशों से बहुतायत में धन प्राप्त हुआ और उन्होंने सभी पुराने साथियों को बाहर निकाल दिया। पूरे आंदोलन को संभव बनाया गया क्योंकि विदेशी फंडिंग ‘आप’ को पूरे देश में अपने पंख फैलाने में सक्षम बना सकती थी। आरंभ में केजरीवाल ने पूरे देश में चुनाव लड़ने की सोची, लेकिन वह संगठन को कामयाबी नहीं दिला पाए। वह खुद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए वाराणसी गए थे। उन्होंने पूरे देश को दिखाया कि उनके पास भव्य डिजाइन के लिए तेजतर्रार दृष्टिकोण है। उनके सभी कार्य और डिजाइन अति महत्त्वाकांक्षी थे, लेकिन फिर भी बहुत कुछ बच गया। पंजाब में भी उनकी पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई। दिल्ली उनका केंद्र और आधार बनी रही। उन्होंने दिल्ली में पहली बार दस साल पहले चुनाव जीता था और उन्होंने जो वीरतापूर्ण कार्य किया था, वह यह था कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सबसे प्रतिष्ठित मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया था। उन दिनों भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा था क्योंकि कांग्रेस के शासनकाल में घोटाले पर घोटाले हो रहे थे और पूरा देश इससे तंग आ चुका था। केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की लहर पर सवार होकर आए, लेकिन वह पांच साल बाद फिर से जीत गए। …और यह तीसरी बार है जब उनकी पार्टी ने बहुमत हासिल किया है। यह चुनाव निर्णायक था क्योंकि भाजपा ने अनुच्छेद 370 को हटाकर संविधान में संशोधन करने के अपने फैसले को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया था। इसके साथ ही भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट की सहमति से राम मंदिर पर आए फैसले को भी अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। इसके अलावा तीन तलाक का उन्मूलन भी एक उपलब्धि है, जो अन्यायपूर्ण मुस्लिम परंपरा थी। इसी बीच शाहीन बाग का मसला आगे आया जहां प्रदर्शनकारियों ने सड़कों को जाम कर दिया। वे नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ  विरोध कर रहे हैं और इनमें ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग हैं। शांतिपूर्ण विरोध ने राजनीतिक माहौल को बिगाड़ दिया, लेकिन शांतिपूर्ण रहने के साथ ही यह जारी रहा और यातायात को बाधित करने के लिए सार्वजनिक सड़कों पर कब्जे भी कानून का उल्लंघन था जिसे सरकार ने यह सोचकर अनदेखा कर दिया कि चुनाव जल्द ही होने वाले हैं और वे तितर-बितर हो जाएंगे। परंतु ऐसा नहीं हो पाया।

यह वस्तुतः राज्य सत्ता और संविधान के लिए चुनौती थी, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। मेरे विचार में देश के कानून का प्वाइंट खोने के बजाय चुनाव हारना बेहतर था। राज्य ने कोई कार्रवाई नहीं की, वह अपनी भूमिका का त्याग कर रहा था और एक उल्लंघन के लिए आत्मसमर्पण कर रहा था जो आपराधिक था। लेकिन भाजपा जिसके नियंत्रण में पुलिस थी, वह सिर्फ  देखती रही। इसका देश में दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। इस बीच भाजपा और कांग्रेस को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। केजरीवाल के खिलाफ भाजपा मुकाबले में नहीं थी, और इसमें मनोज तिवारी की फेस वैल्यू का अभाव था जो अच्छे कलाकार हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिज्ञ नहीं। भाजपा उनके पूर्बी समर्थन पर निर्भर थी, किंतु यह उनकी कला के लिए था, न कि चुनाव के लिए। उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। संसदीय चुनाव के मामले में भाजपा ने युवा लोगों को टिकट देने की रणनीति अपनाई, लेकिन विधानसभा चुनाव के मामले में उसने इस रणनीति का त्याग कर दिया। दूसरी ओर केजरीवाल ने केंद्र और राज्य के मध्य अंतर को पाटते हुए काम किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 282 सीटें मिलीं, जबकि 2015 में विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीटें मिलीं, बाकी तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 303 सीटें मिलीं, जबकि इस बार विधानसभा चुनाव में लगभग पिछली बार वाली स्थिति ही रही है। आप को 62 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को केवल आठ सीटों पर संतोष करना पड़ा। दिल्ली के नागरिकों ने भाजपा को संदेश दिया है कि आप केंद्र की चिंता करें और राज्य का मसला हम पर छोड़ दें। जैसा कि कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक आईआईटी स्नातक ने मुझे बताया था कि ‘केजरीवाल मुफ्त पानी, बिजली, शिक्षा और चिकित्सा देते हैं, तो हमें उन्हें वोट क्यों नहीं देना चाहिए। भ्रष्टाचार की हम परवाह नहीं करते हैं, इसे छोड़ देना चाहिए या इसे केंद्र को ध्यान में रखना चाहिए।’ यह बहुमत के दृष्टिकोण को दर्शाता है और अब जबकि भाजपा शाहीन बाग के बारे में सोच सकती है, केजरीवाल परेशान नहीं होंगे क्योंकि उन्हें वह मिल गया है जो वह चाहते थे। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में अशांति थी। केजरीवाल की चालाक रणनीति ने अपनी घोषणा में दिखाया कि उनके पास मोदी उनके पीएम हैं और वह उनके खिलाफ  कुछ नहीं करेंगे। वह केवल सीएम हैं, वह अपने हिस्से का काम करेंगे। उन्होंने शाहीन बाग को अंडरप्ले किया, जबकि इस मसले को वामपंथियों तथा कांगे्रस के लिए छोड़ दिया गया था। वह मतदाताओं को संदेश दे रहे थे कि वह काम करेंगे सुचारू रूप से और स्थानीय मुद्दों को हल करेंगे। हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां हमें एक परिपक्व और पेशेवर विपक्ष की जरूरत है। छोटे मसलों पर अंक जुटाने और राष्ट्रीय हितों को बाधित करने का कोई फायदा नहीं है। आइए देखें कि यह कैसे विकसित होता है क्योंकि सभी पक्षों को सोचना और विश्लेषण करना चाहिए।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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