समान नागरिक संहिता की जरूरत

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

जो लोग अरब क्षेत्रों से भारत में आकर बस गए, उन्होंने आपराधिक मामलों में भी आंख के बदले आंख की परंपरा जारी रखी। यहां तक कि हत्या के मामले में भी रिश्तेदारों को खून की कीमत चुका कर छुटकारा पाया जा सकता है। धीरे-धीरे जिन भारतीयों ने अरब के संप्रदाय को स्वीकार कर लिया, उन्होंने भी इसी आपराधिक कोड की वकालत करना शुरू कर दिया…

भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। वह भाषा, लिंग, जाति, वर्ण, मजहब या मजहबी विश्वासों या आस्था के कारण न तो किसी से भेदभाव करता है और न ही प्रताडि़त करता है, लेकिन इतने बड़े देश में  विभिन्न मजहबी आस्थाओं के कारण विभिन्न समाजों के सामाजिक कायदे-कानून भी अलग-अलग हो सकते हैं। संपत्ति को लेकर नियम कानून, विवाह-शादी को लेकर नियम कानून इत्यादि अनेक विषय हैं जहां समाज के विभिन्न वर्गों में अलग-अलग प्रचलन है । यहां तक कि एक ही जाति के अलग-अलग समूहों के अलग अलग कायदे कानून हो सकते हैं। इसे कस्टमरी कानून या कोड भी कहा जा सकता है, लेकिन यह संहिता विन्निता केवल सिविल मामलों में है, ऐसा नहीं है। आपराधिक मामलों में भी यह भिन्नता दिखाई देती है। जो लोग अरब क्षेत्रों से भारत में आकर बस गए, उन्होंने आपराधिक मामलों में भी आंख के बदले आंख की परंपरा जारी रखी। यहां तक कि हत्या के मामले में भी रिश्तेदारों को खून की कीमत चुका कर छुटकारा पाया जा सकता है। धीरे-धीरे जिन भारतीयों ने अरब के संप्रदाय को स्वीकार कर लिया, उन्होंने भी इसी आपराधिक कोड की वकालत करना शुरू कर दिया। बाद में आपराधिक व सिविल मामलों में लागू इस अरबी कोड को शरीयत कहा जाने लगा, लेकिन भारत पर जब अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया तो उन्होंने आपराधिक मामलों के लिए अपने मुल्क का कोड लागू कर दिया, जो थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ अभी भी लागू है। अलबत्ता इसको नाम भारतीय दंड संहिता का दे दिया गया है। इसे लगभग भारत के सभी संप्रदायों ने स्वीकार कर लिया है। यहां तक कि दिन-रात  अरबी व मध्य एशियायी मूल के उन मुसलमानों ने भी जो सदियों से भारत में रहने के बावजूद शरीयत या शरा की माला जपते रहते है, ने भी इसे प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया, लेकिन सिविल मामलों में यही समुदाय शरीयत वाला सिविल कोड जारी रखना चाहता है। यहां तक कि इस मामले में इन्होंने उन भारतीयों को भी अपने साथ जोड़ लिया है जिन्होंने पूजा पाठ के लिए इस्लामी तौर तरीके को प्रयोग करना शुरू कर दिया था। कुछ सीमा तक इन के साथ वे भारतीय भी जुड़ गए हैं जिन्होंने अपनी परंपरागत पूजा पद्धति छोड़ कर मध्य एशिया में पैदा हुए एक दूसरे महापुरुष यीशु मसीह की पूजा शुरू कर दी थी, लेकिन बाबा साहिब अंबेडकर का मानना था कि पूरे देश के लिए सामाजिक जीवन के मोटे-मोटे मामलों में एक समान सिविल कोड बनाया जाना लाजिमी है। सामाजिक जीवन के ये मुद्दे जिन्हें अंग्रेजी भाषा वाले पर्सनल कानून भी कहते हैं, विवाह, तलाक, पुश्तैनी संपत्ति का बंटवारा, गुजारा भत्ता, किसी को गोद लेना से ताल्लुक रखते हैं। दरअसल सिविल कोड का मजहब से कुछ लेना-देना नहीं हैं। कोई भी सिविल सोसायटी अपने लिए समय और स्थान के अनुकूल नियम कायदे बनाती है। उन सांसारिक नियम कायदों से परमात्मा या अल्लाह  से संवाद स्थापित करने या उसकी पूजा करने में कोई बाधा नहीं पड़ती।

किसी पुश्तैनी संपत्ति का बंटवारा कैसे करना है, इससे  ईश्वर या अल्लाह की इबादत से क्या लेना-देना है? विवाह एक किया जा सकता है या दो, यह निर्णय समय के अनुसार समाज तय करेगा न कि अल्लाह या ईश्वर। परंतु सदियों से अरब व मध्य एशिया से भारत में आकर बसे लोग यह मान कर चलते हैं कि इनका ताल्लुक उनके मजहब से है, यह सिविल सोसायटी का मामला नहीं है। कोई अपनी पत्नी को छोड़ देता है, तो कायदे के अनुसार उसके भरण-पोषण की व्यवस्था उसके पति को करना ही चाहिए। सभी सभ्य समाजों में यह होता ही है। शाहबानो के मामले में यही हुआ था। उस बेचारी बुढि़या को उसके वकील पति ने उमर की चौथ में घर से बाहर कर दिया तो उसने इतनी ही फरियाद की थी कि दो जून के निकाले की व्यवस्था उसका पति कर दे तो वह अपने नसीब से समझौता कर लेगी, लेकिन उसके लिए भी उसे निचली अदालत से शुरू करके सबसे ऊंची अदालत में जाना पड़ा। उसका मुकाबला अपने सुशिक्षित पति से था। ऐसा नहीं कि वह इसकी व्यवस्था कर नहीं सकता था, लेकिन उन लोगों ने यह मामला मजहब से जोड़ लिया था। उनका मानना था कि शाहबानो को दो जून की रोटी के लिए चंद रुपए दे देने से अल्लाह नाराज हो जाएगा। उनका अरबी मजहब खतरे में पड़ जाएगा, लेकिन खुदा शायद शाहबानो के हक में था। वह उच्चतम न्यायालय से मामला जीत गई। सबने राहत की सांस ली कि कोर्ट का यह फैसला समान सिविल कोड की ओर पहला कदम है, लेकिन कांग्रेस को चिंता इन अरबी व मध्य एशियायी मुसलमानों के खफा हो जाने की थी।

भारतीय मुसलमान तो प्रसन्न थे। उनकी विरासत हिंदोस्तान की विरासत थी। वे तो समझ गए थे कि शाहबानो को चंद रुपए देने का न खुदा से संबंध है न ही मजहब से, यह संसारी मामला है। यह बात भारतीय संविधान के निर्माता भी समझते थे। इसलिए उन्होंने संविधान के चौथे भाग में एक पूरा अध्याय डाला जिसमें राज्य की नीति के निर्देशक तत्त्व दिए गए हैं। संविधान निर्माताओं का आग्रह था कि भारत सरकार अपनी आगामी रीति नीति इन निर्देशक तत्त्वों के आधार पर बनाए। इन निर्देशक तत्त्वों के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि भारत सरकार पूरे देश के लिए एक समान सिविल कोड लागू करे, लेकिन आज सात दशक हो गए हैं, सरकार ने इस दिशा में कदम तो क्या बढ़ाना था, सरकार इसकी विपरीत दिशा में ही चल पड़ी। महात्मा गांधी को शायद कांग्रेस की इस फितरत की जानकारी थी। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की वकालत करनी शुरू कर दी थी। बाबा साहिब अंबेडकर तो कांग्रेस की नस-नस से वाकिफ थे। कांग्रेस ने जब संविधान की आत्मा से किनारा करना शुरू कर दिया तो उन्होंने गुस्से में आकर कहा था मुझे मौका मिले, तो मैं इस संविधान को ही आग लगा दूं। तब लोग बड़े हैरान हुए। बाबा साहिब ने कारण बताया। उन्होंने कहा कि संविधान रूपी मंदिर में राक्षसों का कब्जा हो गया है। किसी ने सुझाव दिया कि मंदिर से राक्षसों को निकालो, मंदिर को क्यों जलाते हो? बाबा साहिब का उत्तर था, मुझमें इतनी ताकत नहीं है कि मैं मंदिर से राक्षसों को निकाल सकूं। समान सिविल कोड की आकांक्षा लिए बाबा साहिब चले गए, लेकिन एक गुमनाम शाहबानो अपने बलबूते परोक्ष रूप से समान सिविल कोड के लिए लड़कर दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय के अंदर तक पहुंच गई। मुल्ला मौलवी चिल्लाते रहे, हमारा अपना पर्सनल कानून है। शाहबानो को उसके घेरे में ही रहना होगा। यह सिविल कानून मांग नहीं कर सकती, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय अंततः शाहबानो के साथ खड़ा हो गया। अकेली शाहबानो ने समान सिविल कोड की दिशा में लंबी छलांग लगा दी थी। बाबा साहिब अंबेडकर की आत्मा स्वर्ग में भी प्रसन्न हो रही होगी, लेकिन बाबा साहिब ने जो जिंदा रहते कहा था, शायद वही इसका सत्य था। उन्होंने कहा था कि संविधान के मंदिर में राक्षसों का कब्जा हो गया है।

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