मूल से जुड़ने की शुरुआत : डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

May 23rd, 2020 12:07 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इस एसटीएम को यह बहम था कि हिंदुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले उनका राज था और भारत के लोग उनकी प्रजा थे। इसलिए कायदे से अंग्रेजों के जाने पर भारत का शासन उनके हवाले किया जाना चाहिए। लेकिन ब्रिटेन सरकार भी यह जानती थी कि ऐसा संभव नहीं है। परंतु ब्रिटेन को हिंदुस्तान का विभाजन जरूर करना था ताकि एशिया में एक नई शक्ति न उभर सके। परंतु प्रश्न था कि मजहबी आधार पर हिंदुस्तान को तोड़ने का आंदोलन कौन चलाए? एसटीएम तो यह आंदोलन चला नहीं सकते थे क्योंकि एसटीएम के ही एक प्रमुख नेता सैयद मौलाना अबुल कलाम आजाद के अनुसार भारत में एसटीएम मूल के मुसलमानों की संख्या पांच प्रतिशत है। शेष 95 प्रतिशत मुसलमान भारतीय हैं जो कभी मतांतरित हो गए थे…

डा. इंद्र मोहन कपाही मेरे पुराने मित्र हैं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय में एक लंबे अरसे तक भौतिक विज्ञान पढ़ाते रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सदस्य भी रहे हैं। अनेक सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। व्यक्तिगत बातचीत के माध्यम से नहीं, सार्वजनिक रूप से ही। उनकी चिंता है कि पाकिस्तान के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना तो पहली पीढ़ी के ही मुसलमान थे। उनके पिता तो गुजराती हिंदू थे। परिवार गुजराती परंपरा के अनुसार शाकाहारी था, लेकिन दादा ने मछली का व्यवसाय शुरू कर दिया जिसके कारण समाज ने उन्हें जातिच्युत कर दिया। दादा तो चुप रहे, लेकिन उनका बेटा चुप न रह सका। उसने गुस्से में आकर इस्लाम की हरी चादर ओढ़ ली। यह गुस्सैल व्यक्ति ही मोहम्मद अली जिन्ना का बाप था। जाहिर है बाप मुसलमान हो गया तो बेटे भी अपने आप मुसलमान हो गए। बाकी बेटों का तो पता नहीं, लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने सूअर का मांस खाना शुरू कर दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद उसने अपने बाप के निर्णय का अपने इस तरीके से प्रतीकात्मक विरोध किया हो। लेकिन पहली पीढ़ी का मतांतरित यह मोहम्मद अली जिन्ना भारत का इतना विरोधी कैसे हो गया कि उसने मतांतरित भारतीयों को लेकर हिंदुस्तान को तोड़ने की जिद पकड़ ली और अंततः पाकिस्तान बना लिया। प्रश्न सार्वजनिक रूप से उठा है तो उस पर मंथन भी सार्वजनिक रूप से ही करना होगा।

जिन्ना किस प्रकार के मुसलमान थे, इस पर बहस करना बेकार है। वह मजहबी मुसलमान नहीं थे, बल्कि राजनीतिक मुसलमान थे। भारत को तोड़ने में दो शक्तियों  की रुचि थी। पहली शक्ति तो ब्रिटिश सरकार ही थी। उनको कमजोर हिंदुस्तान चाहिए था। दूसरी शक्ति हिंदुस्तान का एसटीएम समूह था। एसटीएम यानी सैयद अरब, तुर्क, मुगल मंगोल मूल के मुसलमान, जो कभी विदेशी हमलावरों के साथ भारत में आए थे और यहीं बस गए थे।  इस एसटीएम को यह बहम था कि हिंदुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले उनका राज था और भारत के लोग उनकी प्रजा थे। इसलिए कायदे से अंग्रेजों के जाने पर भारत का शासन उनके हवाले किया जाना चाहिए। लेकिन ब्रिटेन सरकार भी यह जानती थी कि ऐसा संभव नहीं है। परंतु ब्रिटेन को हिंदुस्तान का विभाजन जरूर करना था ताकि एशिया में एक नई शक्ति न उभर सके। परंतु प्रश्न था कि मजहबी आधार पर हिंदुस्तान को तोड़ने का आंदोलन कौन चलाए? एसटीएम तो यह आंदोलन चला नहीं सकते थे क्योंकि एसटीएम के ही एक प्रमुख नेता सैयद मौलाना अबुल कलाम आजाद के अनुसार भारत में एसटीएम मूल के मुसलमानों की संख्या पांच प्रतिशत है। शेष 95 प्रतिशत मुसलमान भारतीय हैं जो कभी मतांतरित हो गए थे। दूसरे एसटीएम मूल के मुसलमान सोच में अभी भी मध्य एशिया के अंधकार में जी रहे थे, उनको अरबी भाषा में कुरान कंठस्थ करने के अलावा कुछ नहीं आता था। ऐसे एसटीएम के पीछे भारतीय मूल के 95 प्रतिशत मुसलमान, जो इस एसटीएम से ज्यादा प्रबुद्ध और जागृत थे, कैसे चल सकते थे। अपनी इस कमजोरी को एसटीएम भी जानता था। उसे भारतीय मुसलमानों में पैठ बनाने के लिए कोई फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला पैंट-कोट पहने भारतीय चाहिए था, जो सूअर चाहे खा जाए, लेकिन अंग्रेजी में धोखा न खाए। ब्रिटेन ने एसटीएम को जिन्ना के रूप में ऐसा मुखौटा दे दिया। जिन्ना ने पाकिस्तान बनवा दिया या फिर ब्रिटेन ने जिन्ना को पाकिस्तान दे दिया। पाकिस्तान बनने से ब्रिटेन का उद्देश्य भी पूरा हो गया और एसटीएम का भी। अब पाकिस्तान के एसटीएम को जिन्ना की जरूरत नहीं थी। पाकिस्तान बनने के बाद जितने महीने जिन्ना जिंदा रहे, उसमें उनकी जो दुर्दशा हुई, वह सब जानते हैं।

इतना ही नहीं, जिन्ना के मरने के बाद उनकी बहन को भी अपमानित किया गया। लेकिन भारतीय मूल के मुसलमानों के दुर्भाग्य से, उनमें से भी एक समूह अपने आप को दूसरे समूह से ऊंचा मानता है। इसके मूल को भी समझना होगा। प्रो. इंद्र मोहन कपाही यहां पर एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। उनका कहना है कि एसटीएम मूल के मुसलमानों में सैयद तो अरब मूल के हैं और हजरत मोहम्मद के कुल गोत्र से हैं, लेकिन भारतीय मूल के मुसलमान भी सैयद लिखते हैं। यह गोरखधंधा क्या है? यहां कपाही एक उदाहरण देते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में सैयद मुनीस रजा कुलपति बने थे। कपाही के अनुसार मैंने उन्हें पूछा था कि आप लोग तो त्रिपाठी ब्राह्मण हो, फिर सैयद कैसे हो गए, सैयद तो अरब मूल के हैं। इसके उत्तर के लिए इतिहास में पीछे जाना होगा। जब एसटीएम के हमले भारत पर शुरू हुए तो भारतीय समाज की तथाकथित ऊंची जातियों के बहुत से लोगों ने सत्ताधारियों के नजदीक रहने के लिए इस्लाम का चोगा पहन लिया। ये ब्राह्मण भी थे, राजपूत भी थे और वैश्य भी। जाहिर है भारतीय समाज ने इनको हिकारत से देखा। लेकिन ये लोग यह तो स्वीकार कर नहीं सकते थे कि इन्होंने इस्लाम को डर या लालच के कारण स्वीकार किया है। अक्लमंद लोग थे। इसलिए इन्होंने तर्क गढ़ने शुरू कर दिए कि इस्लाम भारतीय परंपराओं और आस्थाओं से बेहतर है। इनका अपना समाज क्योंकि मतांतरण के कारण इनका अपमान कर रहा था, इसलिए इन्होंने शासकों की सहायता से अपने समाज पर ही सबसे ज्यादा अत्याचार किए।  तथाकथित बड़ी जातियों के मतांतरित लोग इस्लाम के अरबों-तुर्कों से भी बड़े पैरोकार बन गए। उधर एसटीएम मूल के विदेशी शासकों ने भारतीयों पर जजिया टैक्स लगा दिया। खेती करने वाले किसान, अन्य काम धंधे करने वाले आम आदमी के लिए विदेशी राज में दो रोटी जुटा पाना मुश्किल था। ऊपर से जजिया टैक्स। कंगाली में आटा गीला। इससे निजात पाने के लिए वे भी इस्लाम की हरी चादर ओढ़ने लगे। अब तो बड़ी जातियों से मतांतरित और आम आदमी से मतांतरित में कोई फर्क न रहा। दोनों हरी चादर ओढ़े घूम रहे हैं। लेकिन बड़ी जातियों के मतांतरित लोग यह कैसे सहन कर सकते थे। शुभ संकेत यह है कि भारतीय मुसलमानों की युवा पीढ़ी एसटीएम के नियंत्रण से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है।

ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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