कश्मीरी तैमूर को क्या कहें

By: Jul 25th, 2020 12:08 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

मतांतरण की यह प्रक्रिया आज तक चली हुई है। फारस देश से आने वाले इन सैयदों और मध्य एशिया से आने वाले तुर्क-मुगल मंगोल ने अपने प्रयास नहीं छोड़े। वे कश्मीर के केवल इस्लामीकरण से ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उसके अरबीकरण की ओर भी प्रयासरत रहे। 1990 में कश्मीर से हिंदू कश्मीरियों का निकलना उसी अभियान का हिस्सा था। कश्मीरी भाषा के सिद्धहस्त साहित्यकार अवतार कृष्ण रहबर की कहानी ‘छाया’ में कई सवाल उठाए गए हैं। अपनी कहानी में अवतार कृष्ण ने यही प्रश्न उठाया है कि वे तैमूर को तैमूर ही कहें या तैमूर लंग कहें…

कश्मीरी साहित्य, विशेषकर कश्मीरी लोक साहित्य में अरब के सैयदों और मध्य एशिया के तुर्क-मंगोलों द्वारा कश्मीर पर किए गए सांस्कृतिक आक्रमण की वेदना सर्वत्र देखी जा सकती है। वैसे तो पूरे भारतवर्ष में अरब आक्रमणों व मध्य एशिया के आक्रमणों से उत्पन्न स्थितियों का विश्लेषण सभी भारतीय भाषाओं में मिलता है, लेकिन कश्मीर घाटी की वेदना ज्यादा गहरी है क्योंकि वहां सांस्कृतिक आक्रमण ज्यादा गहरा व प्रभावी रहा। इतना ही नहीं, वहां का सत्ता पक्ष भी अरब के सैयदों और मध्य एशिया के तुर्क-मंगोलों के साथ मिल गया लगता था।

कश्मीर घाटी में आज भी जिस सैयद की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वह सैयद अली हमदानी हैं। उनकी चर्चा नकारात्मक व सकारात्मक दोनों प्रकार से होती है। ऐसा माना जाता है कि कश्मीर घाटी में इस्लाम का नया पंथ प्रचलित करने  में उनका सबसे ज्यादा हाथ था। सैयद अली हमदानी का कश्मीर में आगमन तैमूर लंग के कारण हुआ। आज का जो तजाकिस्तान है, तैमूर लंग वहां का रहने वाला था। तैमूर किसी दुर्घटना में लंगड़ा हो गया था, इसलिए उसे तैमूर लंग यानी लंगड़ा तैमूर कहा जाने लगा। तैमूर (1336-1405) ने 1370 में मध्य एशिया में तैमूर वंश के शासन की स्थापना की। तैमूर लंग ने बलख, खुरासान, हेरात को जीतकर इरान पर हमला किया। वहां उसके निशाने पर सैयद आ गए। उसने सैयदों के साथ अच्छे व्यवहार की एक शर्त रखी कि वे यह स्वीकार करें कि तैमूर लंग या तुर्कों को इस्लामी जगत का सम्राट बनने का अधिकार है। अब से तुर्क इस्लाम के खलीफा हैं। लेकिन सैयद ऐसा कैसे स्वीकार कर सकते थे? वे तो अपने आप को हजरत अली के खानदान से जुड़ा होने के कारण इस्लाम का मजहबी नेता मानते थे।

इसलिए इस्लामी जगत के नेतृत्व का पैदायशी अधिकार वे अपना ही समझते थे। हमदान और बिहाक में रह रहे सैयदों ने मुसलमानों पर शासन करने के तैमूर लंग के अधिकार को मानने से इंकार कर दिया। सैयदों में अहंकार और श्रेष्ठता का भाव तो था ही। आखिर वे सीधे हजरत अली के समुदाय से ताल्लुक रखते थे। मध्य एशिया के किसी कबीले के आदमी को, चाहे उसके कबीले ने इस्लाम मत को ग्रहण ही क्यों न कर लिया हो, मुसलमानों और वह भी सैयदों पर राज करने का अधिकार कैसे हो सकता है? तैमूर लंग तुर्क-मंगोल प्रजाति से ताल्लुक रखता था। उसका जो परिणाम होना था, वही हुआ। तैमूर ने सैयदों को दिन में तारे दिखा दिए। तैमूर लंग से मार खाए बिहाकी और हमदानी सैयद भारत की ओर भागे। इरान से भाग कर सैयद महमूद बिहाकी अपने चेलों के साथ कश्मीर में आ गया था। ये सैयद स्वयं को किसी न किसी सूफी सिलसिले का बताते थे। ऐसी ही एक और खेप 1372 में ही सैयद अली हमदानी (1314-1384) के नेतृत्व में कश्मीर घाटी में पहुंच गई। सैयद अली हमदानी ने श्रीनगर में वितस्ता जेहलम के किनारे जहां काली मां का प्राचीन मंदिर था, अपना डेरा जमाया। हमदानी के वहां डेरा जमा लेने से इरान से आए सैयद और इस्लाम में मतांतरित हुए कुछ कश्मीरी हिंदू  भी उस स्थान पर आने  लगे। हमदानी अपने आप को कुबराविया सिलसिले का सूफी बताता था। जब हमदानी कश्मीर में पहुंचा तो वहां शाहमीर वंश के सुल्तान कुतुबुद्दीन (1374-1389) का राज था।

दूसरी खेप में आने वाले इन सैयदों ने बुलबुल शाह की विफलता से सबक सीख लिया था। उन्होंने  अपने कार्य के लिए दूसरा रास्ता  चुना।  अतः सैयदों की रणनीति राजा को ही अपने प्रभाव क्षेत्र में लाकर काबू करना हो गई ताकि मतांतरण का काम राज शक्ति के बल पर शुरू किया जा सके।  इसमें वे कुछ सीमा तक सफल भी हुए। सैयद अली हमदानी ने सुल्तान कुतुबुद्दीन को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया। सुल्तान ने शरीयत का पालन करते हुए अपनी एक पत्नी को तलाक भी दे दिया। स्थानीय कश्मीरियों जैसे कपड़े पहनने छोड़ कर सैयदों जैसे कपड़े भी पहनने शुरू कर दिए। कश्मीर में मतांतरण का काम उस वक्त के शाहमीरी शासकों और इन सैयदों की आपसी सांठगांठ से ही शुरू हुआ।

सुल्तान कुतुबुद्दीन की मौत के बाद सुल्तान सिकंदर कश्मीर का बादशाह बना और सैयद अली हमदानी की मौत के बाद कश्मीर में उसका उत्तराधिकारी उसका बेटा सैयद महमूद हमदानी बना। सुल्तान सिकंदर (1389-1413), जो कश्मीर के इतिहास में बुतशिकन के नाम से जाना जाता है, शाहमीरी वंश का छटा सुल्तान था। वह हमदान से आए इन सैयदों के प्रभाव में पूरी तरह आ चुका था। बुतशिकन सिकंदर ने लगभग पच्चीस वर्ष तक शासन किया। कश्मीर घाटी में हिंदुओं का मतांतरण इसी कालखंड में हुआ। इससे पूर्व कश्मीर घाटी में मुसलमान बनने वाले कश्मीरियों की जनसंख्या नगण्य थी। सिकंदर बुतशिकन और सैयद महमूद हमदानी समकालीन हुए। बुलबुल शाह के इतने साल बाद भी सैयद अपने प्रचार और प्रभाव से कश्मीर के लोगों को प्रभावित नहीं कर सके थे। कश्मीर के लोग इस्लाम में मतांतरित नहीं हो रहे थे। अब दूसरी खेप के इन सैयदों ने मतांतरण के लिए राज्यसत्ता से सांठगांठ का रास्ता चुना। सैयदों का सौभाग्य यही था कि कश्मीर घाटी की सत्ता पर मुसलमान सुल्तान कब्जा कर चुके थे। बुतशिकन उनके प्रभाव क्षेत्र में था। बुतशिकन के राज्यकाल में कश्मीर घाटी में हिंदुओं का हर प्रकार से इस्लाम में मतांतरण किया गया। जिन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया उनको या तो कत्ल कर दिया गया या डल झील में डुबो कर मार दिया गया। मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी गईं।

मतांतरण की यह प्रक्रिया आज तक चली हुई है। फारस देश से आने वाले इन सैयदों और मध्य एशिया से आने वाले तुर्क-मुगल मंगोल ने अपने प्रयास नहीं छोड़े। वे कश्मीर के केवल इस्लामीकरण से ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उसके अरबीकरण की ओर भी प्रयासरत रहे। 1990 में कश्मीर से हिंदू कश्मीरियों का निकलना उसी अभियान का हिस्सा था। कश्मीरी भाषा के सिद्धहस्त साहित्यकार अवतार कृष्ण रहबर की कहानी ‘छाया’ में कई सवाल उठाए गए हैं। अपनी कहानी में अवतार कृष्ण ने यही प्रश्न उठाया है कि वे तैमूर को तैमूर ही कहें या तैमूर लंग कहें? लेकिन ताज्जुब है कि हिंदुस्तान में अभी भी कुछ लोग अपने बच्चों का नाम तैमूर रख रहे हैं।

ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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