‘Mahashay’ Dharampal Gulati: एक तांगे वाला, जिसने 1,500 से 2,000 हजार करोड़ रुपए बनाए

By: Dec 4th, 2020 12:06 am

मसालों की दुनिया के किंग कहे जाने वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी का गुरुवार को निधन हो गया। 98 साल के गुलाटी अपने मसालों का विज्ञापन भी खुद ही करते थे। पाकिस्तान के सियालकोट से बंटवारे के बाद भारत आने वाले श्री गुलाटी को काफी मुसीबत का सामना करना पड़ा था। 1500 रुपए लेकर भारत आए श्री गुलाटी ने करोड़ों का कारोबार शुरू किया। बोर्ड मीटिंग लाफ्टर क्लास लगवाने वाले श्री गुलाटी का कर्मचारियों के प्रति रवैया शानदार रहता था। 98 साल की उम्र में उनके पास पद्मभूषण भी था और लक्ष्मी भी। एफएमसीजी सेक्टर के सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले सीईओ थे एमडीएच ग्रुप के धर्मपाल गुलाटी…

पद्मभूषण से सम्मानित एमडीएच के महाशय धर्मपाल गुलाटी अमर हुए

अत्यंत दुख के साथ आपको सूचित किया जाता है कि गुरुवार प्रातः 5ः38 बजे एमडीएच मसाला कंपनी के चेयरमैन और पद्मभूषण से सम्मानित महाशय धर्मपाल गुलाटी जी का दिल का दौरा पड़ने से 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। यह गौरव की बात है कि एमडीएच मसाला कंपनी अपने गौरव 101 साल पूरे कर चुकी है। एमडीएच ने स्थापना काल से शुद्धता को लेकर एक अलग पहचान बनाई और भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों में भी एमडीएच ब्रांड मसाले लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। आज से 101 साल पहले ही एमडीएच कंपनी सियालकोट (जो आज पाकिस्तान में है) से काम कर रही थी। एमडीएच मसालों की शुद्धता एवं गुणवत्ता ही एमडीएच की पहचान है।

महाशय जी का जन्म 27 मार्च, 1923 को सियालकोट के एक सम्मानित परिवार में हुआ था। महाशज जी ने अपनी आरंभिक शिक्षा आर्य समाज स्कूल में प्राप्त की  तथा पांचवीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के बाद अपने पुश्तैनी मसालों के कार्य में जुट गए। 1947 में भारत के विभाजन के कारण अपना सब कुछ पीछे छोड़कर और 1500 रुपए की मामूली राशि के साथ वह अपने परिवार सहित भारत आ गए। यहां आकर दिल्ली के करोल बाग में स्थापित हुए। महाशय जी ने 650 रुपए का एक तांगा खरीदा और कुछ दिन चलाया, जिससे अपने परिवार की जीविका चलाई, किंतु शीघ्र ही कुछ बड़ा करने की इच्छा मन में जागी और पुनः अपने पुश्तैनी व्यापार मसालों का कार्य आरंभ कर दिया। मजबूत इच्छा शक्ति और कड़ी मेहनत के बल पर  एमडीएच कंपनी को शिखर तक ले जाने का संकल्प पूरा कर दिखाया और एमडीएच मसालों की शुद्धता के क्षेत्र में एक विशेष पहचान बनाई।

महाशय जी अपने जीवन में छह सिद्धांतों का पालन करते थे इमानदार बनना, मेहनत करना, मीठा बोलना, कृपा परम-पिता परमात्मा की, आर्शीवाद माता-पिता का और संसार का। महाशय धर्मपाल जी ने सियालकोट (पाकिस्तान) से आकर कठिन परिस्थितियों और संघर्ष से अपने जीवन को संवारा और बड़े पैमाने पर समाज और मानव जाति की सेवा के लिए अपने व्यवसाय को समर्पित किया। उनके शुभ प्रयास से 70 से अधिक संस्थाएं जैसे ः विद्यालय, गौशालाएं, अस्पताल, अनाथालय, वृद्धाश्रम, गुरुकुलों, महिला आश्रम, विधवाआें एवं निर्धन कन्याआें के विवाह, आर्य समाज, आदिवासी क्षेत्रों में बोर्डिंग स्कूल, प्रतिभावान छात्रों की उच्च शिक्षा एवं अनरू समाज के प्रति संस्थाआें का निर्माण एंव संचालन हो रहा है। यह सब धार्मिक व सामाजिक कार्य महाशय धर्मपाल चैरिटेबल ट्रस्ट और महाशय चुन्नीलाल चैरिटेबल ट्रस्ट के अंतर्गत चलते हैं।

650 रुपए में खरीदा था तांगा

पाकिस्तान से भारत आने के बाद श्री गुलाटी ने 650 रुपए में तांगा खरीदा था। उस वक्त उन्हें तांगा चलाने भी नहीं आता था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें तांगा चलाने भी नहीं आता था। वह धीरे-धीरे चलाना शुरू किए। उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड और करोल बाग से बारा हिंदू राव के लिए तांगा चलाया।

दिल्ली में खोली मसाले की दुकान

श्री गुलाटी ने दिल्ली में करोल बाग के अजमल खां रोड पर एक दुकान खरीदी और अपने परिवार के मसाले का बिजनेस शुरू किया और ‘महाशियां दी हट्टी ऑफ सियालकोट (डेगी मिर्च वाले)’ के नाम से दुकान खोल ली। इसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। आज महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर है।

कुछ ऐसी थी दिनचर्या

श्री गुलाटी रोजाना सुबह 4 बजे उठकर पंजाबी बीट्स पर डंबल से कसरत करते थे, फिर फल खाते थे। इसके बाद नेहरू पार्क में सैर करने जाते थे, दिन पराठों के साथ गुजरता था, शाम होते ही दोबारा सैर पर निकलते थे और फिर रात में मलाई और रबड़ी का दौर शुरू होता था। 98 साल के महाशय फिर भी कहते थे ‘अभी तो मैं जवान हूं।


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