उल्टे बांस बरेली को

By: Jun 25th, 2026 12:05 am

अगर हम पेड़ न काटें, जंगल न काटें, पशुओं के लिए घास के मैदानों पर नाजायज कब्जा करके उन्हें कंक्रीट के पहाड़ों में न बदलें तो इन पशु-पक्षियों को हमारी किसी और सहायता की आवश्यकता ही न हो। मजे की बात ये कि फिर हम इन्हें ‘बचाने’ और संरक्षित करने की प्रक्रिया को ‘पुण्य’ बना लेते हैं, धर्म बना लेते हैं और मंचों पर चढक़र पाप और पुण्य की दुहाई देते हैं। ये मक्कारी और नौटंकी सिर्फ हम इनसान ही करते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस पेड़ पर चिडिय़ा रहती थी, वो पेड़ काटकर हमारे लिए फ्लैट बना, फिर हम फ्लैट में एक कटोरा पानी और थोड़ा सा दाना रखकर गौरैया की सेवा करने लगते जाते हैं। जहां गाय चरती थी उस मैदान में हमारे बच्चों को पेड़ काटकर, उस लकड़ी के कागज से बनी किताबें रटाने के लिए स्कूल बन गया और अब हम गाय को रोटी खिला कर पुण्य कमा रहे हैं। इस पृथ्वी के पशु-पक्षियों को हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। हमने प्राकृतिक जीवन जीना छोड़ दिया है…

सन 2020 में जब कोविड आया तो लोग घरों में कैद हो गए, सडक़ें खाली हो गईं, मोटरें गैरेज में पार्क हो गईं, आदमजात की आवाजाही बंद हो गई तो ऐसे-ऐसे वीडियो सामने आने लगे जहां सडक़ों पर हिरनों, मोरों और अन्य सुंदर पशु-पक्षियों का आना-जाना बढ़ गया। घरों की बाड़ पर मोर और दूसरे पक्षी दिखाई देने लगे। लोगों में खुशी की एक अनजानी सी लहर फैली। कोविड खत्म हुआ तो कोविड से कोई सबक सीखने के बजाय हमने फिर से वही दूषित दिनचर्या आरंभ कर दी और प्रकृति का विनाश करके कंक्रीट के जंगल खड़े करने का क्रम फिर से शुरू कर दिया। हमें याद रखना चाहिए कि प्राकृतिक आपदाएं किसी देवता का कोप नहीं हैं, ये मानव-निर्मित समस्याएं हैं। जून 2013 में उत्तराखंड में भयानक बाढ़ ने प्रदेश के पांच जिलों में भारी तबाही मचाई थी। छह हजार से भी अधिक लोग इस बाढ़ में फंसे रहे थे, जिन्हें दस दिन बाद वहां से निकाला जा सका था। इससे पहले भी कई पहाड़ी राज्यों में बादल फटने की घटनाओं ने तबाही मचाई है। हिमाचल प्रदेश में बादल फटने और भीषण बाढ़ के कारण पूरे के पूरे गांव बह जाने या मलबे में पूरी तरह से दफन होने की कई दुखद घटनाएं सामने आई हैं। इन विनाशकारी घटनाओं में से एक जुलाई 2024 की है। शिमला जिले के रामपुर उपमंडल के अंतर्गत आने वाले समेज गांव में बादल फटने के कारण अचानक आई बाढ़ ने बड़ा विनाश किया।

इस जल प्रलय में पूरा का पूरा गांव मलबे और पानी के तेज बहाव में बह गया, जिसमें दर्जनों लोग लापता हो गए, केवल कुछ ही घर बाकी बच पाए थे। इसके अलावा, हिमाचल के कुल्लू, मंडी और धर्मशाला जैसे क्षेत्रों में भी ऐसे हादसे हो चुके हैं। अभी पिछले ही वर्ष कुल्लू और धर्मशाला के खनियारा की मनोड़ी खड्ड में बादल फटने से आई बाढ़ और सैलाब में पेड़-पौधों, रास्तों के साथ पूरे के पूरे गांव बह गए थे। यही नहीं, मंडी के पांडव शिला जैसे कई इलाकों में अचानक आई बाढ़ और उफनती नदियों के कारण बड़े-बड़े पत्थर और मलबा रिहायशी इलाकों में घुस गए थे, जिससे भारी तबाही हुई। इन प्राकृतिक आपदाओं में पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर, घर और खेत तबाह हो गए, और यह इलाके नक्शे से ही गायब जैसे हो गए थे। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि हमने पहाड़ों को बेतहाशा काट-छील कर खोखला कर दिया। यह बहुत दुखद स्थिति है कि मार्केटिंग के दुष्प्रचार के इस युग में हम प्रकृति का विनाश करते चल रहे हैं और दानवीर होने और आध्यात्मिक होने का भ्रम भी पाल रहे हैं। इसे जरा गहराई से समझने की आवश्यकता है। किसी भी गाय को हमारी रोटी की आवश्यकता नहीं है। किसी भी पक्षी को हमारे दानों की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति ने प्रकृति में ही उनके भोजन की भरपूर व्यवस्था कर रखी है। गाय को घास से भरा मैदान चाहिए, जिसे वह चर सके। पक्षियों को फल-फूल वाले पेड़ चाहिएं ताकि उनकी भूख भी मिटे और प्रजनन काल में वे उन पर अपने घोंसले बना सकें। हम बेतहाशा पेड़ काट रहे हैं, घास के मैदानों को ऊंचे-ऊंचे भवनों में तब्दील कर रहे हैं। हम पशुओं-पक्षियों से उनका प्राकृतिक आवास और भोजनालय छीन रहे हैं, बदले में जब हम किसी गाय को रोटी डाल देते हैं तो हम खुद को दानवीर मान लेते हैं।

पक्षियों के लिए दाना डालकर या पानी का बर्तन भर कर रख देने के बाद हम सोच रहे हैं कि हमने बहुत अच्छा काम किया है। पशु-पक्षियों की रक्षा के नाम पर हम उन्हें तबाही दे रहे हैं। हमें जानवरों को बचाने की जरूरत नहीं है। हमें उन्हें दाना पानी देने की जरूरत नहीं है। क्या हमने कभी ध्यान दिया है कि हम जानवरों को किस से बचाने का प्रयत्न कर रहे हैं? क्या हमने कभी सोचा है कि गाय को रोटी खिलाने की नौबत ही क्यों आई है? न गाय हमारी रोटी के लिए पृथ्वी पर आई है, न पक्षी हमारे दानों के मोहताज हैं। जब हम बड़े जोर-शोर से ‘सेव एनिमल’ और ‘सेव अर्थ’ का नारा लगाते हैं तो दरअसल हम किस से इस पृथ्वी और जानवर को बचाने की बात करते हैं? कौन है जो जानवरों को खत्म किए दे रहा है? कौन है जिसकी वजह से पक्षियों को दाना-पानी नहीं मिल रहा है, और गउएं रोटियां खा रही हैं? कौन है जिसके कारण ये सब हो रहा है? पृथ्वी और जानवरों को बचाने की ये सारी कवायद इसलिए है क्योंकि हम इनसान ही इनका विनाश कर रहे हैं और परिणामस्वरूप खुद हमारा जीवन भी दूभर होता जा रहा है। अगर हम पेड़ न काटें, जंगल न काटें, पशुओं के लिए घास के मैदानों पर नाजायज कब्जा करके उन्हें कंक्रीट के पहाड़ों में न बदलें तो इन पशु-पक्षियों को हमारी किसी और सहायता की आवश्यकता ही न हो। मजे की बात ये कि फिर हम इन्हें ‘बचाने’ और संरक्षित करने की प्रक्रिया को ‘पुण्य’ बना लेते हैं, धर्म बना लेते हैं और मंचों पर चढक़र पाप और पुण्य की दुहाई देते हैं।

ये मक्कारी और नौटंकी सिर्फ हम इनसान ही करते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस पेड़ पर चिडिय़ा रहती थी, वो पेड़ काटकर हमारे लिए फ्लैट बना, फिर हम फ्लैट में एक कटोरा पानी और थोड़ा सा दाना रखकर गौरैया की सेवा करने लगते जाते हैं। जहां गाय चरती थी उस मैदान में हमारे बच्चों को पेड़ काटकर, उस लकड़ी के कागज से बनी किताबें रटाने के लिए स्कूल बन गया और अब हम गाय को रोटी खिला कर पुण्य कमा रहे हैं। इस पृथ्वी के पशु-पक्षियों को हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। हमने प्राकृतिक जीवन जीना छोड़ दिया है और बहुत सा धन कमाने की धुन में हम परेशानियों से घिर गए हैं, फिर उन परेशानियों से बचने के लिए हम आध्यात्मिक होने का नाटक कर रहे हैं। हमारा यह घोर धार्मिक पागलपन ही अध्यात्म को व्यवसाय में बदलने का कारण बन गया है और कुकुरमुत्तों की तरह उग आई नई-नई धार्मिक संस्थाएं कर्मकांड के माध्यम से डोपामीन बांट कर हमारी उत्तेजना में इजाफा कर रही हैं। ये सब किताबें हमने ही लिखकर उनमें सेवा का महिमामंडन किया है। गायों ने ये किताबें नहीं लिखी हैं। उन्होंने लिखी होतीं तो वे अपने लिए घास के मैदान मांगतीं, हमारी बनाई रोटी नहीं। अब समय आ गया है कि हम झूठे धार्मिक ज्ञान वाले इस ‘उल्टे बांस बरेली को’ के दुष्चक्र को बंद करें और प्राकृतिक जीवन जिएं, और पशु-पक्षियों को भी प्रकृति के उपहार का आनंद लेने दें। इसी में हमारी भलाई है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण

गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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