कहानी की तलाश में हिमाचल : जीना इसी का नाम है
यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम। कभी किसी दूब पर दूर से आती छटा, शब्दों को भावों में पिरोती हवा। एक स्पर्श कहीं दीप में बुझती बाती को सहला रहा, तो कहीं क्रंदन किसी महफिल के रोमांच में अनसुना रह गया। हिमाचल का कहानीकार, समाज के रंगमंच पर वर्षों से श्रम साधना करता हुआ, अभिव्यक्ति के नजराने पेश कर रहा। ‘हिमाचली हिंदी कहानी – विकास यात्रा’ की 106 किस्तों के बाद कहानी अपने शृंगार में सीधे पाठकों तक। हर कहानी की पृष्ठभूमि, उसकी संरचना, कथानक, विषय, पात्र, उद्देश्य, भाषा और शैली के साथ एक पूरा रचना संसार शिरकत कर रहा है। एक अपनापन या अपनों से रूठा मन, पहाड़ की गवाहियों में खड़े उदास मंजर या किसी झरने के पास प्यासी नदी का स्पंदन। जीवन की तलाश में कहानी का सफर कहां पहुंचा, इसी बिंदु पर विवेचन की परंपरा के हिमाचली हस्ताक्षर खोज कर ला रहे हैं, प्रसिद्ध साहित्यकार राजेंद्र राजन। पेश है आज 52वीं किस्त :
सृजन प्रक्रिया
‘जीना इसकी का नाम है’ निर्भया से प्रेरित है। सामाजिक मुद्दे पर लिखी यह रचना सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाती है कि समाज में किस तरह से परिवार को भी यातना झेलनी पड़ती है। लेकिन परिवार व समाज के सहयोग से किस प्रकार वह महिला जीने के लिए अपनी लड़ाई को निरंतर लड़ती है, वह पूरे परिवार व समाज के साथ लड़ाई लडऩे को तैयार है। यह एक मां की ताकत को भी दिखाती है कि एक मां में कितनी ताकत होती है…
सुरभि बाली
मो.-7018013834
कहानी/भाग-1
आज मुझे पुन: काम से बाहर जाना था। कम्पनी में मेरा काम ही कुछ ऐसा है कि अक्सर मुझे काम से दूसरे शहरों में भी जाना पड़ता है। पिछले कुछ दिनों से नीरजा परेशान चल रही थी। हमारी 17 वर्ष की बेटी नेहा कोचिंग क्लासिज से वापस आते समय कुछ मनचलों की अभद्र भाषा को झेल रही थी। परिणामस्वरूप जब मैं यहां होता हूं तो अक्सर उसे कोचिंग क्लासिज से वापस लाने की जिम्मेदारी मेरी ही होती है। नेहा की सुरक्षा को लेकर हम पति-पत्नी दोनों ही काफी चिन्तित थे। मेरे दूसरे शहर को काम से जाने के कारण कोई एफआईआर भी दर्ज नहीं करवा पाए थे। नीरजा अक्सर नेहा के भविष्य को लेकर चिन्तित रहती थी। हमेशा कक्षा में अव्वल आने वाली हमारी बेटी अभी से कोचिंग क्लासिज लेना चाहती थी, अत: उसके भविष्य को लेकर हम किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते थे। हम इस शहर में अभी दो वर्ष पहले ही बच्चों की पढ़ाई के कारण ही आए हैं। हमें अपने-अपने कार्यक्षेत्र में भी काफी समझौता करना पड़ा था। मेरा काम यहां आकर कम्पनी में टूर वाला हो गया था। अत: परिवार को भी काफी परेशानी हो रही थी। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। नीरजा भी अपने कार्यक्षेत्र से सन्तुष्ट थी। बच्चों के भविष्य के लिए ही नीरजा ने भी काम पर जाना शुरू किया था, ताकि बच्चों की पढ़ाई की, जरूरतों की, व कोचिंग क्लासिज की फीस हम वहन कर सकें। ताकि आज के हिसाब से बच्चों को पूरी सुविधाएं मिल सके और उन्हें उनकी इच्छानुसार और रुचि के अनुसार आगे बढऩे का सुअवसर प्राप्त हो। हम जिस प्रकार कई बार अपने मन मार कर जीते थे, अपनी इच्छाओं और रुचियों का त्याग कर देते थे घर के अभाव के कारण, हमारे बच्चे वंचित न रहें, उनके लिए ही हम शहर में आकर रह रहे थे।
यूं तो हमारा विवाह दोनों परिवारों के माता-पिता व बड़े बुजुर्गों की सहमति व आशीर्वाद से हुआ था। नीरजा ने सौम्य व्यवहार से सारे परिवार का दिल जीत लिया था। अपने सास-ससुर की वह चहेती बहु थी और बहुत जल्द ही उसने खुद को हमारे परिवार के रीति-रिवाज और नियमों में ढाल लिया था। विवाह के एक वर्ष के भीतर ही नेहा हमारे परिवार में आ गई थी। इसके तीन वर्ष बाद आयुष्मान भी हमारे परिवार का हिस्सा बन चुका था। परिवार के बढऩे से नीरजा घर के कार्यों में तथा बच्चों को संभालने में ही व्यस्त हो गई थी। धीरे-धीरे समय आगे बढ़ रहा था। और हमारे बीच सम्बन्ध समय के साथ और भी मधुर होते जा रहे थे। नीरजा के कारण मुझे अपने माता-पिता और बच्चों के लिए किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं होती थी। पढ़ी लिखी होने के कारण वह बच्चों की पढ़ाई और भोजन का भी पर्याप्त ख्याल रखती थी और मैं अच्छे से अपनी नौकरी कर पा रहा था। घर पर ही बच्चों की पढ़ाई की ओर पर्याप्त ध्यान देने के कारण ही हमारे दोनों बच्चे पढ़ाई में अच्छा कर रहे थे, जो हमारी आशाओं से बहुत ऊपर था। वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह में हर बार हमारे बच्चे ढेरों ईनाम लाते। पढ़ाई के साथ-साथ वे अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे। अत: अपने बच्चों की इस प्रगति पर हमारा पूरा परिवार और विद्यालय भी गर्व कर रहा था। इस सबमें नीरजा का योगदान सर्वोपरि रहा है। यदि नीरजा भी नौकरीपेशा होती तो बच्चे इस प्रकार सभी क्षेत्रों में इतनी ऊंचाइयां नहीं छूते। अत: अभिभावक होने के नाते हमारा दायित्व काफी बढ़ गया था और बच्चों से हमारी अपेक्षाएं भी बढ़ गई थीं।
उस दिन नीरजा नेहा की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित दिखी। नेहा इतनी रूआंसी हो गई थी कि वह कोचिंग क्लासिज छोडऩे तक की बात कर रही थी। इस पर मैंने ही जोर देकर समझाया था, ‘‘नहीं बेटा, इस तरह की बातें नहीं सोचा करते, तुम तो मेरी बहादुर बेटी हो, इस तरह की बातों से हतोत्साहित नहीं होते। किसी तरह तुम ये तीन दिन निकालो, उसके बाद देखते हैं इनसे किस तरह निपटना है।’’ नीरजा ने बीच में ही मुझे रोकते हुए कहा था, ‘‘नहीं अरुण जी, आप समझ नहीं रहे हैं, वे लडक़े चार-पांच के समूह में होते हैं, मुझे भी डर लगता है। जब आप नहीं होते हैं तो मैं कितनी मुश्किल से उन गुंडों से अपनी नेहा को बचा कर लाती हूं।’’ ‘‘तुम बेकार ही डर रही हो नीरजा, और मेरी बेटी को भी डरा रही हो, ये तो मेरी शेरनी है।’’ कहने को मैंने कह तो दिया था लेकिन भीतर तक मैं भी दहल गया था अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर। अजीब स्थिति है यहां, शहर में बच्चों की पढ़ाई की सभी सुविधाएं हैं, परन्तु जहां तक सुरक्षा का प्रश्न है तो…हर माता-पिता चिंतित और परेशान हैं, विशेषकर बेटी का पिता…अपने काम पर शहर से बाहर जाते समय अपने काम की चिंता कम और यहां बेटी की सुरक्षा की अधिक चिंता रहती है। इसी तरह दो दिन ठीक-ठाक निकल गए थे। मैंने और नीरजा ने चैन की सांस ली थी। उस दिन जैसे ही मैं शाम को शहर पहुंचा था, नीरजा और नेहा का नम्बर लगा रहा था। नीरजा का नम्बर बंद आ रहा था तो कभी पहुंच से बाहर आ रहा था। यही हाल नेहा के नम्बर का भी था। मन बुरी तरह से आशंका से भर गया था। तभी मेरे नम्बर पर नेहा का नम्बर फ्लैष हुआ। नेहा कुछ बोल नहीं पा रही थी। ‘‘तुम ठीक हो न बेटा।’’ किसी तरह उसने कहा, ‘‘हां पापा मैं ठीक हूं। परन्तु ममा….’’, वह कहकर रोने लगी थी। ‘‘कहां हो तुम इस समय।’’ ‘‘पापा मैं घर पर ही हूं।’’ मैं बदहवास किसी तरह घर पहुंचा था तो नेहा ने पूरा घटनाक्रम सुनाया था। उस दिन घर वापसी के समय उन चार-पांच गुंडा टाईप लडक़ों ने नेहा को घेर लिया था और उसे जबरदस्ती गाड़ी में ले जाने की तैयारी में थे। तभी नीरजा वहां पहुंची थी और उसने किसी तरह उसे उनसे छुड़ाया था और उसे भागने को कहा था। परन्तु वे गुंडे उसके स्थान पर नीरजा को ही गाड़ी में डालकर ले गए थे।
यह सब कुछ सुनाते हुए नेहा पूरी तरह दहशत में थी और बराबर रोए जा रही थी। ‘‘पापा, मम्मी को उन गुंडों से बचाइए।’’ मैंने तुरन्त पुलिस स्टेशन का रुख किया ताकि नीरजा का पता लगाया जा सके। पुलिस में एफआईआर दर्ज कराकर घर की ओर वापस आ ही रहा था कि नीरजा के फोन से फोन आया, नीरजा पास के अस्पताल में भर्ती (एडमिट) थी। मैं पागलों की तरह किसी तरह अस्पताल पहुंचा, देखा नीरजा लगभग बेसुध थी और आस-पास के न्यूज चैनल वालों को बैठे बिठाए मसाला मिल गया था। मैं डॉक्टरों से और नर्सों से नीरजा का हाल पूछ रहा था कि वह कब तक ठीक होगी और उसकी स्थिति क्या है और कैसी है? पता चला कि मामला गैंग रेप का था और नीरजा की हालत अब खतरे से बाहर थी, परन्तु वो पूरी तरह सदमें में थी। यह सब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा मेरे कानों में उंड़ेल दिया हो। अपने स्थान पर खड़े रह पाना भी मेरे लिए मुश्किल था। किसी तरह पास की दीवार का सहारा लिया था, आंखों के आगे जैसे अंधेरा छा गया था। मुझे जाते समय के नीरजा के शब्द याद आ रहे थे। उसने कहा था, ‘‘आप निश्ंिचत होकर जाईए, मैं अपनी जान पर खेल कर भी अपनी बेटी नेहा की रक्षा करूंगी, उसे आंच भी नहीं आने दूंगी।’’ एक मां का अपनी बेटी के लिए इतना बड़ा बलिदान सोचकर भी दिल दहल गया था। पुलिस भी पहुंच गई थी और नीरजा के होश में आने की प्रतीक्षा में थी। पुलिस को नीरजा का बयान लेना था।
मैंने किसी तरह हिम्मत जुटा कर नीरजा का निरीक्षण करने वाली लेडी डॉक्टर से नीरजा की तबीयत की जानकारी ली थी तो डॉक्टर साहिबा भी भावुक हो गई थी उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे बीस साल के व्यवसाय में ऐसा केस पहली बार देख रही हूं, बहुत दरिंदे किस्म के लोग थे। नीरजा के शरीर पर जगह-जगह नाखून के और दांतों के निशान थे। बहुत दर्द और पीड़ा से गुजरना पड़ा है उन्हें। बीच बचाव और हाथापाई से भी उसके शरीर पर कई जगह चोटें और घाव हुए थे। यहां तक कि कई जगह सिगरेट के जलाने के भी निशान मिले थे।’’ ‘‘वह बच तो जाएगी न डॉक्टर साहिबा।’’ किसी तरह मेरे मुंह से निकला था। मैं इस समय सिर्फ और सिर्फ नीरजा की जान बचाने के बारे में ही सोच रहा था। ‘‘देखिए मिस्टर अरुण, हमारी टीम का भरसक प्रयास रहेगा कि हम आपकी पत्नी को बचाएं। आप इलाज के खर्चे की चिंता न करें। सीएम साहब का आदेश है कि आप की पत्नी का सरकारी खर्चे से इलाज हो।’’
इस सब की मैं क्या प्रतिक्रिया दूं, समझ नहीं पा रहा था। यहां भी कैसी राजनीति हो रही है। ‘‘हे भगवान! मेरी नीरजा को बचा लेना प्लीज’’, मैं सोफे में धंसा आंखों में आंसू लिए बस नीरजा के अच्छा होने के लिए प्रार्थना कर रहा था। हे ईश्वर हम इस अनजान शहर में क्यों आ गए। अस्पताल में महिला आयोग की अध्यक्षा, और भी कई एन. जी. ओ. आ गए थे और मैं डॉक्टरों से विनती कर रहा था और उसका हाल जानने का प्रयास कर रहा था। इस बीच डॉक्टरों के भरसक प्रयासों से लगभग दो घंटे बाद नीरजा को होश आ गया था। मैं भीतर जाने का प्रयास कर रहा था, परन्तु पहले पुलिस नीरजा का बयान लेने चली गई थी। नीरजा नेहा के बारे में पूछ रही थी। मैंने दूर से ही उसे कहा था कि नेहा ठीक है। उसने पुलिस को बयान देते हुए बताया था कि वे लोग संख्या में पांच थे। गाड़ी से उसे वे एक अंधेरी सुनसान जगह ले गए थे और बारी-बारी से उन्होंने अपनी हवस पूरी की थी। उनमें से एक तो मुश्किल से 17 साल का ही था।
इस बीच पुलिस ने नेहा के बयान से स्केच कलाकारों की मदद से दोषियों के स्केच बना लिया थे। जिस किशोर का स्केच बना था, वह मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री का पुत्र था। उस किशोर को छोडक़र बाकी सभी दोषी पकड़े गए थे। और वीडियो कांफ्रेंस के जरिये नीरजा ने उन सभी अभियुक्तों को पहचान भी लिया था। पुलिस के बयान इत्यादि के बाद मुझे नीरजा से मिलने का मौका दिया गया था। मैं बहुत भावुक हो रहा था कि कैसे नीरजा का सामना कर पाऊंगा, बड़ी मुश्किल से आंखों में आए आंसुओं को पोंछा था और अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया था। ‘‘कैसी हो तुम?’’ मैंने पूछा था। ‘‘बस जिंदा हूं अभी भी।’’ ‘‘ऐसा मत कहो प्लीज’’, मैंने उसके होठों पर हाथ रखते हुए कहा था। परन्तु वह पीड़ा से कराह उठी थी और मुझसे नजरें चुराने का प्रयास कर रही थी। सम्भवत: शारीरिक पीड़ा से अधिक मानसिक यातना रही होगी, तभी उसकी आंखों से आंसू बह निकले थे। मैं उससे अपने आंसू छुपाने का प्रयास कर रहा था और हमारे बीच काफी लम्बा मौन रहा था। नीरजा के बहते आंसुओं को मैंने पौंछने का प्रयास भी नहीं किया। इस बीच घर से नेहा भी आ गई थी और अपनी मां का हाल देखकर उसने रोना शुरू कर दिया था। ‘‘मम्मा की कैसी हालत हो गई है। पापा, मम्मा ठीक तो हो जाएंगी ना।’’ वह मेरे गले लग कर बोली थी। ‘‘हां बेटा तुम्हारी मां तुम्हारी तरह बहुत बहादुर है, उन्हें हम सबके लिए ठीक होना पड़ेगा।’’ मैंने नीरजा की तरफ देखते हुए कहा था। वो मुझसे अभी भी नजरें चुरा रही थी। शायद जी भर कर रोना चाहती होगी। दिल तो कर रहा था कि उसे गले से लगा लूं और उससे कहूं, ‘‘जितना रोना चाहती हो, जी भरकर रो लो नीरजा। मैं हर हाल में तुम्हारे साथ खड़ा हूं। और आगे भी खड़ा रहूंगा।’’ पर हालात ऐसे नहीं थे। सच तो यह है कि मैं खुद भी जी भर कर रोना चाहता था, मुझसे भी अपनी पत्नी की ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी।
उसने तो यह सब सहन किया था। इस बीच नेहा ने भरे गले से कहा था, ‘‘पापा, मम्मी ठीक समय पर आ गई थी, नहीं तो मम्मी की जगह मैं होती।’’ उसकी बात सुन कर कलेजा मुंह को आ गया था। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा था और मेरे आंसू गिरकर नेहा के बालों में खो गए थे। ‘‘बस बेटी हिम्मत रखो और अपनी मम्मी का ध्यान रखो।’’ इस बीच नर्स भी आई थी और दवाई देने का समय हो गया है, ऐसी हिदायत दी थी। मैंने नेहा के कान में फुसफुसा कर कहा था, ‘‘अपनी मां के सामने इस तरह बात नहीं करनी है, तुम्हें मजबूत बनना है ताकि तुम्हारी मां जल्दी ठीक हो जाए।’’ ‘‘सॉरी पापा, आगे से ध्यान रखंूगी।’’ नेहा ने अपने आंसू पौंछते हुए कहा था। मैंने आगे बढक़र नर्स से दवाईयों की समय सारिणी को समझा था और नीरजा को दवाईयां खिलाने के लिए नर्स को ही कहा था। नर्स ने उसे दवाईयां खिलाई थीं। नर्स ने नीरजा को दर्द न हो, इसके लिए इंजेक्शन भी लगा दिया था। इंजेक्शन लगाने के कुछ समय बाद नीरजा सो गई थी। अच्छा हुआ वरना बाहर से प्राइवेट चैनल वाले रिपोर्टर भी नीरजा से बात करने के इच्छुक थे, सनसनीखेज समाचार का उन्हें मसाला जो मिल गया था। जबकि मेरी पत्नी अभी मुझसे भी बात करने की स्थिति में नहीं थी। इस बीच नेहा ने मुझसे खाना खाने के लिए कहा था। अत: मैंने और नेहा ने कैन्टीन जाकर थोड़ा सा खाना खा लिया था। पुलिस पर भी महिला आयोग की अध्यक्षा तथा विभिन्न एन. जी. ओ. का बहुत दबाव था कि मंत्री जी के किशोर पुत्र को अति शीघ्र पकड़ा जा सके। -(शेष भाग अगले अंक में)
टिप्पणियां
भले वक्त का इंतजार करती कहानी
अशोक गौतम
मो.-9418070089
सुरभि बाली की कहानी ‘जीना इसी का नाम है’ यथार्थवाद और आदर्शवाद के बीच विपरीत परिस्थितियों में भी एक साथ खुशी खुशी जीते मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है जो समय के साथ समाज में सब सही होने के लिए बहुत कुछ परिर्वतनों की मांग करती है। उन परिवर्तनों की ताकि ये शहर जीने लायक बचे रहें, जहां पर जंगल के खूंख्वार शहर में संभ्रांत बन अपनी हवस मिटाने को कुछ भी करने पर आमादा हंै। जिनके लिए उनकी हवस ही नैतिकता है। इस कहानी में कहानीकार सवाल खड़ा करती है कि शहरों में मध्यम वर्ग अपनी बेटियों के सपनों को उड़ान देने के लिए जी-तोड़ मेहनत करता तो है, पर दरिंदगी से भरे माहौल में उसे अपनी बेटियों को सुरक्षित रख पाना कितना कठिन हो गया है। व्यवस्था का हादसा हो जाने के बाद हरकत में आना, मीडिया का किसी भी को केवल टीआरपी के कोण से देखना, स्वप्निल ही सही, एक उम्मीद जगाता है कि समाज को अभी भी बुराइयों की ओर जाने से बचाया जा सकता है, जो सब मिलकर मन से प्रयास करें तो।
यथार्थ से दूर, कलेवर प्रभावशाली
अजय पाराशर
मो.-8894055557
आज की सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था में एक मां-बाप द्वारा अपनी बच्ची को मुकाम तक पहुंचाने के संघर्ष से आरंभ होने वाली यह कहानी अंतत: ऐसे परिलोक में पहुंच जाती है, जिसे हजम करने में शायद हाजमोला भी असमर्थ रहे। धन, ताकत, छीजती मानवीय संवेदनाएं, सत्ताधीशों और आम आदमी- दोनों का नैतिक पतन, साम्प्रदायिक वैमनस्य, नशे का बढ़ता चलन, बेरोजगारी, कानून और न्याय जैसी समस्याओं से जूझते समाज में, जब आम नागरिक के सामने स्वयं को देश का नागरिक सिद्ध करने का संकट गहराता जा रहा हो, और केन्द्र सरकार घोटालों, धांधलियों तथा बलात्कार जैसी घटनाओं के बीच सार्वजनिक रूप से यह कहे कि ‘एनडीए सरकार में इस्तीफे नहीं होते’, तब किसी मुख्यमंत्री द्वारा अपने मंत्री से इस्तीफा लेना और उसके बेटे को किशोर सुधार गृह भेज देना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। हां, यह संभव है कि जान के खतरे के कारण कोई दम्पति अवैध गर्भपात का जोखिम न उठाए, किन्तु लेखिका इस विरोधाभास को अपने शब्दों में समेट नहीं पाई हैं। फिर भी, कहानी का कलेवर प्रभावशाली है। यदि लेखिका वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसका पुनर्लेखन करें, तो संभवत: कथा अधिक न्यायपूर्ण और यथार्थपरक बन सके। निर्भया कांड के बाद देश में अनेक हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, जिनमें सरकारें आज तक नैतिकता की फटी चादर ओढ़े गहरी नींद में सो रही हैं।
जीवन के पक्ष में खड़ा एक मार्मिक आख्यान
गुरमीत बेदी
मो.-9418033344
सुरभि बाली की कहानी ‘जीना इसी का नाम है’ समकालीन समाज की उन भयावह सच्चाइयों से टकराती है जिनके बारे में हम अक्सर समाचारों में पढ़ते हैं, पर उनके भीतर छिपी मानवीय त्रासदी को समझ नहीं पाते। यह कहानी केवल एक अपराध की कथा नहीं है, बल्कि उस मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष का दस्तावेज है जो किसी यौन हिंसा की शिकार स्त्री और उसके परिवार को झेलना पड़ता है। कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखिका ने घटना की सनसनी नहीं रची, बल्कि उसके बाद के जीवन पर अपना फोकस रखा है। नीरजा का चरित्र एक ऐसी स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी बेटी को बचाने के लिए स्वयं नरक से गुजरती है। उसके भीतर का अपराधबोध, आत्मग्लानि, सामाजिक उपेक्षा और टूटन अत्यंत स्वाभाविक ढंग से उभरती है। वहीं पति अरुण का संवेदनशील और सहायक स्वरूप कहानी को एक सकारात्मक मानवीय धरातल प्रदान करता है। लेखिका ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि अपराध केवल अपराधी नहीं करता, समाज भी अपनी टिप्पणियों, कानाफूसियों और दृष्टि से पीडि़ता को बार-बार दंडित करता है। यही बिंदु कहानी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ता है। संवाद सहज हैं और कथानक पाठक की संवेदना को लगातार स्पर्श करता चलता है। कहानी की भाषा सरल, प्रवाहमयी और संप्रेषणीय है।
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