स्टोक्स ने लिया संन्यास, बोले- ऐशेज में मिली हार के बाद मुझमें लड़ने की शक्ति नहीं बची थी
नॉटिंघम। बेन स्टोक्स ने कहा है कि इंग्लैंड के टेस्ट कप्तान के तौर पर बिताया गया उनका साढ़े चार साल का कार्यकाल उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान था, लेकिन इस जिम्मेदारी ने उन्हें भीतर तक थका दिया। पिछले ऐशेज दौरे में 4-1 की हार के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अब उनके भीतर आगे लड़ते रहने की शक्ति नहीं बची है। न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज के निर्णायक टेस्ट के चौथे दिन अपने संन्यास की घोषणा के बाद स्काई स्पोर्ट्स से बातचीत में स्टोक्स ने कहा कि यह एहसास उन्हें लॉर्ड्स टेस्ट से पहले ही हो गया था। उन्होंने कहा कि यह फैसला किसी एक घटना का नतीजा नहीं था, बल्कि लंबे समय से जमा हो रही मानसिक और शारीरिक थकान का परिणाम था।
स्टोक्स ने कहा, “मैंने टीम की कप्तानी करते हुए मैदान पर बिताए हर पल का आनंद लिया। किसी खिलाड़ी के लिए अपने देश की कप्तानी करना सबसे बड़ा सम्मान होता है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है जिसे लोग नहीं देख पाते। केवल आपके सबसे करीबी लोग ही समझ सकते हैं कि यह जिम्मेदारी आपको कितना थका देती है और कई बार नकारात्मक रूप से प्रभावित भी करती है। पिछले साढ़े चार सालों में मैंने हर पल का आनंद लिया, लेकिन कुछ पल दूसरों की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल थे।”
स्टोक्स ने स्वीकार किया कि इस पूरी गर्मियों में वह मानसिक रूप से संघर्ष कर रहे थे और लॉर्ड्स में मिली 115 रन की जीत के दौरान भी वह पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर रहे थे। उन्होंने कहा, “लॉर्ड्स टेस्ट ने मेरे करियर से जुड़ी कई नकारात्मक यादें फिर से ताजा कर दीं। ऑस्ट्रेलिया से लौटने के बाद मैंने चीजों को सही करने के लिए बहुत मेहनत की। मुझे लगा कि मैं सही दिशा में जा रहा हूं, लेकिन शायद मैंने खुद को ही थका दिया। जब मैं लॉर्ड्स टेस्ट के सप्ताह में पहुंचा तो मेरे भीतर एक अजीब सा एहसास था। मैंने स्वयं को पूरा मौका दिया कि शायद यह केवल एक अस्थायी दौर हो, लेकिन कुछ ठीक नहीं लग रहा था। कल जब मैं बल्लेबाजी के लिए पैड पहन रहा था, तभी मुझे महसूस हो गया कि यह आखिरी संकेत है।”
उन्होंने कहा, “मैंने कोशिश की लेकिन इस सप्ताह वैसा एहसास वापस नहीं आया। मैंने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं, लेकिन इस समय मुझे लगा कि मैं सिर्फ़ इसलिए खेल रहा हूं क्योंकि मुझे खेलना चाहिए। यह फै़सला शायद थोड़ा स्वार्थी लगे, लेकिन इस समय मेरे लिए यही सबसे सही फै़सला है। मैं इस खेल से प्यार करता हूं और चाहता हूं कि वह प्यार बना रहे।”
अपने करियर में मैंने मैदान के भीतर और बाहर कई निराशाओं का सामना किया है और उनसे उबर भी गया हूं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में जो हुआ, उसके बाद भावनात्मक रूप से चीज़ें बदल गईं। मैंने अपनी पत्नी से कहा था कि मुझे नहीं लगता कि अब मेरे भीतर इससे उबरने की लड़ाई लड़ने की ताक़त बची है।”
35 वर्षीय स्टोक्स ने कहा , “यह खेल बहुत कठोर है, शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से। मैं 35 साल का हूं और मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए मुझे लगातार बहुत मेहनत करनी पड़ती है। सवाल यह था कि क्या मेरे भीतर वह लड़ाई अभी भी बची है? क्या मैं आगे भी उसी स्तर की मेहनत कर सकता हूं। भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक – हर पहलू ने मुझे इस फैसले की ओर धकेला।”
उन्होंने कहा, “अगर वह सीरीज का आखिरी मैच होता और हम ऐशेज जीत जाते तो वह और भी खास होता। फिर भी वह मेरी पसंदीदा पारियों में से एक रहेगी। मैं अपने करियर से पूरी तरह संतुष्ट हूं। मैंने ऐशेज जीती है, वनडे विश्व कप और टी-20 विश्व कप जीता है, इंग्लैंड की कप्तानी की है और खेल के कुछ महान खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका मिला है। शिकायत करने के लिए मेरे पास बहुत कुछ नहीं है।”
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