दस दिनों का मौन, जीवन भर की सीख
प्रो.एस.एस.डोगरा, वरिष्ठ पत्रकार
स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, लगातार आने वाली सूचनाओं और अत्यंत व्यस्त जीवनशैली के इस दौर में क्या कोई यह कल्पना कर सकता है कि वह लगातार दस दिनों तक बिना मोबाइल फोन, पुस्तकों, समाचार पत्रों, कलम या सामान्य बातचीत के जीवन व्यतीत कर सके। अधिकांश लोगों का उत्तर निश्चित रूप से नहीं होगा। किंतु यही अनुभव मुझे 3 जून से 14 जून 2026 तक हरियाणा के सोहना स्थित विपश्यना साधना संस्थान के सोहट्टा केंद्र में आयोजित दस दिवसीय विपश्यना ध्यान शिविर के दौरान प्राप्त हुआ। जो अनुभव प्रारंभ में एक चुनौतीपूर्ण प्रयोग प्रतीत हुआ, वह शीघ्र ही मेरे जीवन के सबसे सार्थक और ज्ञानवर्धक अनुभवों में परिवर्तित हो गया।
एक अनोखी यात्रा का आरंभ- पंजीकरण प्रक्रिया अत्यंत सरल और पारदर्शी है। इच्छुक प्रतिभागियों को अपनी मूल व्यक्तिगत जानकारी एवं आधार कार्ड विवरण के साथ ऑनलाइन आवेदन करना होता है। कुछ ही दिनों में विपश्यना साधना संस्थान की ओर से ईमेल और वॉट्सऐप के माध्यम से पुष्टि प्राप्त हो जाती है। केंद्र में पहुंचने पर प्रतिभागियों को अपने मोबाइल फोन और अन्य ध्यान भंग करने वाली वस्तुएं जमा करनी होती हैं, मानो वे बाहरी दुनिया को पीछे छोड़ रहे हों। इसके बाद प्रारंभ होती है भीतर की ओर एक गहन यात्रा, आत्म अवलोकन, आत्म अनुशासन और आत्म खोज की यात्रा।
आर्य मौन का अनुशासन- इस पाठ्यक्रम की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है ‘आर्य मौन’ का पालन। प्रतिभागियों को पूरे दस दिनों तक पूर्ण मौन बनाए रखना होता है। सह ध्यानकर्ताओं से बातचीत करना पूर्णत: प्रतिबंधित होता है। न पढऩा, न लिखना, न इंटरनेट, न टेलीविजन, न समाचार पत्र और न ही बाहरी दुनिया से कोई संपर्क। एक पत्रकार, लेखक और स्तंभकार होने के नाते मेरे लिए स्वेच्छा से शब्दों, पुस्तकों और संचार माध्यमों से दूर रहना संभवत: सबसे कठिन पक्ष था। किंतु अंतत: यही सबसे अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे यह मौन व्यक्ति का ध्यान बाहरी संसार से हटाकर उसके आंतरिक मनोविश्व की ओर ले जाता है, जहां जागरूकता और आत्म निरीक्षण के नए आयाम खुलते हैं।
सुबह 4 बजे शुरू होता है दिन-दैनिक कार्यक्रम कठोर होने के बावजूद अत्यंत सुव्यवस्थित है। दिन की शुरुआत प्रात: 4 बजे जागरण घंटी के साथ होती है और रात 9:30 बजे समाप्त होती है। प्रतिभागी प्रतिदिन लगभग 10 से 11 घंटे ध्यान करते हैं, जिसमें व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के सत्र शामिल होते हैं। दिनचर्या में ध्यान, भोजन, विश्राम, शिक्षक साक्षात्कार तथा सायंकालीन प्रवचन सम्मिलित होते हैं, जो आचार्य एस.एन.गोयनका की शिक्षाओं पर आधारित हैं। प्रारंभ में यह कार्यक्रम कठिन प्रतीत हो सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यह मानसिक दृढ़ता, एकाग्रता, अनुशासन और आंतरिक स्थिरता का विकास करता है।
सुविधाएं और उत्कृष्ट प्रबंधन- सोहट्टा केंद्र ने अपने उत्कृष्ट प्रबंधन, स्वच्छता और सूक्ष्म व्यवस्थाओं से मुझे अत्यंत प्रभावित किया। प्रत्येक प्रतिभागी को संलग्न स्नानघर सहित एक आरामदायक एकल कक्ष प्रदान किया जाता है, जहां गर्म और सामान्य जल की निरंतर व्यवस्था रहती है। शुद्ध पेयजल आवासीय भवनों, ध्यान कक्षों के निकट उपलब्ध रहता है। प्रतिभागियों को स्वच्छ एवं अनुशासित वातावरण में पौष्टिक शाकाहारी भोजन परोसा जाता है।
आचार्य एस.एन. गोयनका की ज्ञानवाणी-प्रतिदिन सायंकाल प्रतिभागी दिवंगत आचार्य एस.एन. गोयनका के रिकॉर्डेड प्रवचन सुनते हैं, जिनकी शिक्षाओं ने विश्वभर में लाखों लोगों को विपश्यना से परिचित कराया है। उनका मुख्य संदेश अत्यंत सरल किंतु गहन है, अपने आपको जैसा है वैसा देखो। गोयनका जी के अनुसार विपश्यना न तो कोई धर्म है और न ही कोई कर्मकांड। यह मन और शरीर का एक सार्वभौमिक विज्ञान है, जो सभी धर्मों, संस्कृतियों और पृष्ठभूमियों के लोगों के लिए समान रूप से उपयोगी है। उनके प्रवचनों में आत्म अवलोकन, आत्म परिवर्तन, अनुभवजन्य ज्ञान, समता, करुणा और वर्तमान में जीने पर विशेष बल दिया जाता है।
एक अनुभवी शिक्षक से प्राप्त मार्गदर्शन- मेरी विपश्यना यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक पहलू केंद्र के आचार्य अश्विनी मेहता जी से संवाद रहा। उन्होंने बताया कि उनका परिचय लगभग एक दशक पूर्व अपनी पत्नी के माध्यम से विपश्यना से हुआ था और आज उनकी पोती भी इस साधना मार्ग का अनुसरण कर रही है। यह इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि यह अभ्यास परिवार की कई पीढिय़ों को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। मेहता जी के अनुसार सजगता का प्रशिक्षण बहुत कम आयु से प्रारंभ किया जा सकता है। आठ वर्ष तक के बच्चे विशेष एक दिवसीय आनापान पाठ्यक्रम में भाग ले सकते हैं, जबकि 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों के लिए अलग ध्यान शिविर आयोजित किए जाते हैं। गर्भवती महिलाओं को भी मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और आंतरिक कल्याण के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रमों में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है।
साधकों का वैश्विक परिवार- इस पाठ्यक्रम का एक अत्यंत प्रेरणादायक पहलू इसकी अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता थी। प्रतिभागियों में जापान के साइतामा शहर से आए 24 वर्षीय युवा आबेर्यूतु भी शामिल थे। समापन दिवस पर जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें विपश्यना के बारे में कैसे पता चला और उनका अनुभव कैसा रहा, तो मुस्कराते हुए उन्होंने बताया कि उन्हें यह पाठ्यक्रम गूगल सर्च के माध्यम से मिला था। उन्होंने स्वीकार किया कि दूसरे दिन तक वे अत्यंत असहज महसूस कर रहे थे और लगभग शिविर छोडऩे का मन बना चुके थे। किंतु समय के साथ वे अनुशासित दिनचर्या के अभ्यस्त हो गए, मानसिक रूप से अधिक मजबूत बने और ध्यान के सकारात्मक प्रभावों का अनुभव करने लगे। पाठ्यक्रम के अंत तक वे आत्मविश्वास से भर चुके थे और इस अनुभव को अत्यंत समृद्ध करने वाला मानते थे। उन्होंने यह भी बताया कि जापान में विपश्यना काफी प्रसिद्ध और सम्मानित है। उनकी कहानी धैर्य, आत्म अन्वेषण और आत्म परिवर्तन की उस शक्ति को दर्शाती है, जो विश्वभर के साधकों को आकर्षित करती है।
एक व्यक्तिगत परिवर्तन- इस पाठ्यक्रम में शामिल होने से पहले मैंने कभी गंभीरता से ध्यान का अभ्यास नहीं किया था, यहां तक कि लगातार दस मिनट भी नहीं। ऐसी स्थिति में दस दिनों तक प्रतिदिन दस घंटे से अधिक ध्यान करना लगभग असंभव प्रतीत होता था। फिर भी धैर्य और दृढ़ संकल्प के बल पर मैंने इस पाठ्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा किया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने श्वास, जागरूकता और शारीरिक संवेदनाओं के गहन महत्त्व को समझा। मैंने सीखा कि मन सुखद और दुखद अनुभवों पर निरंतर प्रतिक्रिया करता रहता है तथा समता का अभ्यास जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। घर लौटने के बाद मैंने अपनी दिनचर्या में कई सकारात्मक बदलाव शामिल किए हैं। अब मैं प्रतिदिन सुबह और शाम एक-एक घंटे ध्यान करता हूं तथा स्वस्थ भोजन और अनुशासित जीवनशैली पर अधिक ध्यान देता हूं।
जीवन में एक सार्थक निवेश- विपश्यना केवल ध्यान की एक विधि नहीं है, यह आत्म जागरूकता, भावनात्मक संतुलन और व्यक्तिगत विकास का व्यावहारिक प्रशिक्षण है। तनाव, चिंता, क्रोध और भटकाव से भरी आज की दुनिया में ऐसे कार्यक्रम व्यक्ति को स्वयं से पुन: जुडऩे और जीवन के उद्देश्य को समझने का अमूल्य अवसर प्रदान करते हैं।
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