फैसले, रिश्ते और समाज
बस इतना ही याद रखना काफी है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है। जब हमें यह समझ आ जाए कि मन पहले से निर्णय बना लेता है, तो हम छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं। बस जरा रुककर सोचें कि क्या मैं सच में विकल्प देख रहा हूं, या सिर्फ अपने फैसले को सही ठहरा रहा हूं? इसके लिए आवश्यक है कि हम सामने वाले की बात को धीरज से सुनना सीखें, खासकर रिश्तों में। बिना अपना कोई जवाब तैयार किए सुनें। तसल्ली से सुनें। कम से कम बोलकर सुनें। बिना टोके सुनें, और फिर अपने विचारों पर सवाल करें कि क्या मेरी ये सोच सही है, क्या ये सचमुच मेरी ही सोच है या कहीं से सीखी हुई है। थोड़ा रुक कर फिर सोचें। ईमानदारी से विश्लेषण करें। अपने विचारों को परखने के लिए अपने आप को समय दें। हर निर्णय तुरंत लेना जरूरी नहीं होता। आदर्श स्थिति यह है कि हम जागरूक हों और यह समझ लें कि हमारे ज्यादातर फैसले अचानक नहीं होते, वे धीरे-धीरे बनते हैं और उनके पीछे हमारी धारणाओं, अनुभवों और समाज का प्रभाव बहुत बड़ा होता है…
हम अक्सर सोचते हैं कि हम अपने फैसले बहुत सोच-समझकर लेते हैं, पर क्या सच में ऐसा है? सच्चाई यह है कि ज्यादातर बार फैसला पहले ही हमारे मन में बन चुका होता है, और बाद में हम सिर्फ उसे सही साबित करने के लिए कारण ढूंढते हैं। यानी, पहले से बना मन ही हमारे फैसलों की अदृश्य दिशा तय करता है। अगर एक आसान उदाहरण की बात करें तो मान लीजिए कि आप मोबाइल खरीदने जाते हैं। अक्सर होता यह है कि जाने से पहले ही आपने तय कर लिया होता है कि कौनसा ब्रांड लेना है, कौनसा रंग ज्यादा पसंद है, और लगभग कितनी कीमत का फोन लेना है। ब्रांड, रंग, बजट सब तय है। सिर्फ मॉडल चुनना है। दुकान पर जाकर आप कई विकल्प देखते हैं, दुकानदार से बात करते हैं, रिव्यू भी पढ़ते हैं, लेकिन अंत में खरीदते वही हैं, जो पहले से तय था। तो सवाल यह है कि जब निर्णय पहले ही हो चुका था, तो इतना समय और ऊर्जा क्यों खर्च हुई? क्योंकि असल में हम ‘बेहतर विकल्प’ नहीं ढूंढ रहे होते, हम अपने पहले से बने निर्णय को सही साबित कर रहे होते हैं ताकि हम अपनी नजरों में खुद की इज्जत बनाए रख सकें, खुद को बुद्धिमान और तर्कशील मानते रह सकें। सवाल यह है कि आखिर इतनी छोटी सी बात को मैं इतना महत्व क्यों दे रहा हूं? इसका सीधा सा कारण यह है कि जीवन के बाकी सभी सामान्य ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण मामलों में भी निर्णय लेने का हमारा यह पैटर्न साफ नजर आता है, यहां तक कि रिश्तों में भी यही पैटर्न चलता है। परिणाम यह है कि बहुत से नाजुक रिश्ते अकारण ही सूख जाते हैं, टूट जाते हैं।
यह समझना और याद रखना जरूरी है कि जब हम किसी से नाराज होते हैं या रिश्ता खत्म करने का मन बना लेते हैं तो हम धीरे-धीरे उन्हीं बातों पर ध्यान देने लगते हैं जो हमारे फैसले को सही साबित करें। हमें उनकी गलतियां ज्यादा दिखती हैं, हमें वही बातें याद रहती हैं जो हमें चोट पहुंचाती हैं। हम उनके अच्छे प्रयासों को नजरअंदाज कर देते हैं और फिर एक दिन हम कहते हैं कि अब यह रिश्ता नहीं चल सकता, जबकि सच यह है उस फैसले की शुरुआत बहुत पहले ही हो चुकी थी और हमने खुद भी धीरे-धीरे इस रिश्ते को सूख जाने दिया जिससे वह रिश्ता टूटने की कगार तक आ पहुंचा। गड़बड़ यह भी है कि जब हमें किसी का व्यवहार खलता है तो हमारे शब्द, हमारी टोन, हमारे आव-भाव सब नेगेटिव हो जाते हैं। जब हम नेगेटिव हो गए तो यह नहीं हो सकता कि सामने वाला उसे न भांप सके। तब सामने वाला व्यक्ति और भी ज्यादा नेगेटिव हो जाता है और फिर रिश्ता तोड़ देना ही सबसे ज्यादा तर्कसंगत फैसला लगता है। अपनी इस मानसिकता के कारण ही हम उस रिश्ते को दूसरा मौका नहीं दे पाते, क्योंकि जब मन निर्णय ले लेता है तो वह नए विकल्प देखना बंद कर देता है। वह नए रास्ते खोजने के बजाय पुराने निर्णय को और मजबूत करता है। परिणाम यह होता है कि हम बातचीत करने के बजाय बहस करते हैं, समझने के बजाय साबित करने की कोशिश करते हैं, सुधारने के बजाय खत्म करने का रास्ता चुन लेते हैं। उल्लेखनीय है कि अक्सर हमारे फैसलों पर विरासत में मिली या अपने सामाजिक परिवेश से मिली धारणाओं, समाज और प्रचार का गहरा असर होता है। हमारे फैसले पूरी तरह हमारे अपने नहीं होते। उन पर असर होता है समाज का, विज्ञापनों का, आसपास की घटनाओं और उनकी कहानियों का।
जैसे बाजार में हर ब्रांड खुद को ‘सबसे अच्छा’ बताता है, वैसे ही समाज भी ‘आदर्श’ की एक छवि बनाता है और आदर्श पति या पत्नी, आदर्श परिवार, आदर्श जीवनशैली को परिभाषित करता है। यह धारणा हमारे अंतर्मन में कहीं गहरे बैठ जाती है और धीरे-धीरे ये छवियां हमारी सच्चाई बन जाती हैं, और हम अपने रिश्तों और जीवन को उसी मापदंड से तौलने लगते हैं। अगर हमारी वास्तविकता उस छवि से मेल नहीं खाती तो हमें लगता है कि कुछ कमी है जबकि हो सकता है सब कुछ अपने तरीके से ठीक ही हो। यह समझना आवश्यक है कि सही-गलत और खूबसूरती की कोई सार्वभौम परिभाषा है ही नहीं। खूबसूरती, अच्छाई और सही-गलत हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं, होते ही हैं, लेकिन जब समाज हमें तय परिभाषाएं देता है तो हमें वही अच्छा लगने लगता है जो दिखाया जाता है। हमें वही सही लगता है जो बार-बार कहा जाता है, हम वही चुनते हैं जो पहले से तय होता है, और इस प्रक्रिया में हम अपनी असली सोच और अनुभव से दूर हो जाते हैं। हमने समस्या तो समझ ही ली, अब जानना यह है कि इस समस्या के समाधान के लिए हम क्या कर सकते हैं? दरअसल, यह बहुत आसान है। बस इतना ही याद रखना काफी है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है। जब हमें यह समझ आ जाए कि मन पहले से निर्णय बना लेता है, तो हम छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं। बस जरा रुककर सोचें कि क्या मैं सच में विकल्प देख रहा हूं, या सिर्फ अपने फैसले को सही ठहरा रहा हूं? इसके लिए आवश्यक है कि हम सामने वाले की बात को धीरज से सुनना सीखें, खासकर रिश्तों में। बिना अपना कोई जवाब तैयार किए सुनें। तसल्ली से सुनें। कम से कम बोलकर सुनें।
बिना टोके सुनें, और फिर अपने विचारों पर सवाल करें कि क्या मेरी ये सोच सही है, क्या ये सचमुच मेरी ही सोच है या कहीं से सीखी हुई है। थोड़ा रुक कर फिर सोचें। ईमानदारी से विश्लेषण करें। अपने विचारों को परखने के लिए अपने आप को समय दें। हर निर्णय तुरंत लेना जरूरी नहीं होता। आदर्श स्थिति यह है कि हम जागरूक हों और यह समझ लें कि हमारे ज्यादातर फैसले अचानक नहीं होते, वे धीरे-धीरे बनते हैं और उनके पीछे हमारी धारणाओं, अनुभवों और समाज का प्रभाव बहुत बड़ा होता है। समस्या फैसले लेने में नहीं है, बल्कि बिना जागरूकता के पहले से तय फैसलों को अपना खुद का स्वतंत्र फैसला मानकर उन पर अड़े रहने में है। अगर हम थोड़ा-सा सचेत हो जाएं, तो हम बेहतर चुनाव कर सकते हैं तो जीवन में जीत सकते हैं, व्यवसाय में ज्यादा प्रगति कर सकते हैं, बेहतर सेहत बना सकते हैं और अपने रिश्तों को भी समझदारी से संभाल सकते हैं, क्योंकि कभी-कभी सबसे सही निर्णय वही होता है, जिसे हमने पहले से तय नहीं किया होता।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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