अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बनते एमएसएमई

सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए साख गारंटी आवरण (क्रेडिट गारंटी कवर) की सीमा को 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए कर दिया गया है। 10 करोड़ रुपए तक के ऋण की गारंटी स्वयं सरकार देगी, जिससे बैंक बिना झिझक उद्यमियों को ऋण दे सकेंगे…

इन दिनों पूरे देश की निगाहें संसद के इसी मानसून सत्र में प्रस्तुत किए जाने वाले ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विकास (संशोधन) विधेयक 2026’ पर भी टिकी हुई हैं। इस संशोधन विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश के एमएसएमई के लिए बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप नीतियों और नियमों को कारगर बनाना है। इसके साथ ही इसका ध्येय कारोबार सुगमता को बढ़ाना, विलंबित भुगतानों से निपटने के लिए तंत्र को मजबूत करना और एमएसएमई क्षेत्र के लिए मध्यस्थता के फैसलों को प्रभावी ढंग से लागू करना है। विधेयक में राज्यों को ‘सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद’ (एमएसईएफसी) के गठन के संदर्भ में लचीलापन और अनुकूल प्रावधान दिए गए हैं, ताकि अधिक संख्या में एमएसईएफसी गठित करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। उम्मीद है कि यह संशोधन विधेयक कानून बनने पर एमएसएमई को देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव के रूप में स्थापित करने के मद्देनजर असाधारण भूमिका निभाएगा। निश्चित रूप से देश के आर्थिक ढांचे में एमएसएमई का महत्वपूर्ण योगदान है। एमएसएमई आम आदमी के आर्थिक सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह क्षेत्र कम पूंजी निवेश के साथ नए व्यवसाय शुरू करने का अवसर प्रदान करता है। एमएसएमई देश में बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करता है। स्थानीय स्तर और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने से बड़े शहरों की ओर पलायन कम होता है। सरकार की विभिन्न प्राथमिक योजनाओं के तहत छोटे उद्यमियों को बिना किसी कठिन गारंटी के आसान और रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

यह क्षेत्र आम लोगों को हुनरमंद बनाकर खुद का काम शुरू करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वे आत्मनिर्भर बनते हैं। महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारीगरों को मुख्यधारा से जोडक़र आर्थिक विषमता को दूर करने में सहायता मिलती है। एमएसएमई आम नागरिकों की आजीविका सुधारने और देश की प्रगति में योगदान देने का सशक्त माध्यम है। उल्लेखनीय है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक देश में पंजीकृत एमएसएमई की संख्या 7.86 करोड़ से अधिक है। ये उद्योग देश के दूरदराज के गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में फैले हुए हैं, जिससे देश का संतुलित क्षेत्रीय विकास संभव हो पा रहा है। कृषि के बाद यह क्षेत्र भारत में आजीविका का दूसरा सबसे बड़ा आधार है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में, जहां हर साल लाखों नए युवा रोजगार की तलाश करते हैं, वहां बड़े उद्योगों की तुलना में ये छोटे उद्योग बहुत कम पूंजी में अधिक से अधिक लोगों को रोजगार देने की क्षमता रखते हैं। इस क्षेत्र के माध्यम से देश में लगभग 32.82 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इन उद्योगों की हिस्सेदारी लगभग 31.1 प्रतिशत है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश की कुल कमाई का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इन छोटे कारखानों, दुकानों और स्थानीय निर्माण इकाइयों से आता है। देश के कुल विनिर्माण उत्पादन में इन उद्योगों की भागीदारी करीब 35.4 प्रतिशत है। देश से होने वाले कुल निर्यात में एमएसएमई का योगदान लगभग 48.58 प्रतिशत का है। हस्तशिल्प, वस्त्र, चमड़े के सामान, इंजीनियरिंग के छोटे पुर्जे और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ जैसी वस्तुएं इन्हीं उद्योगों के जरिए दुनिया भर में भारत का नाम रेखांकित कर रही हैं।

यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि एमएसएमई का देश के विकास में अभूतपूर्व योगदान है। इसके बावजूद इन छोटे उद्योगों को चलाने वाले उद्यमियों को कई कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ता है। इनमें कार्यशील पूंजी और कोष की किल्लत प्रमुख है। छोटे उद्यमियों के पास सीमित परिसंपत्तियां होती हैं। बैंकों से ऋण लेते समय उन्हें लंबी और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिससे समय पर पूंजी न मिलने के कारण चलते हुए उद्योग भी बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं। फंसा हुआ पैसा और भुगतान में देरी भी इस क्षेत्र की गंभीर समस्या है। जब छोटे उद्योग बड़ी कंपनियों या सरकारी विभागों को माल की आपूर्ति करते हैं, तो उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता। उनका पैसा महीनों और वर्षों तक फंसा रहता है। नकद धन के अभाव में वे न तो कच्चा माल खरीद पाते हैं और न ही कर्मचारियों को वेतन दे पाते हैं। इसके अलावा, बड़ी संख्या में एमएसएमई जटिल कानूनी अड़चनों और मुकदमों के डर का सामना करते हैं। अनजाने में बही-खाते, कर दाखिल करने या किसी प्रशासनिक नियम के पालन में छोटी-मोटी चूक होने पर भी उद्यमियों को कानूनी कार्यवाही का डर सताता रहता है। वे ‘इंस्पेक्टर राज’ के शिकार होते रहते हैं, जिससे वे खुलकर काम नहीं कर पाते। एमएसएमई के समक्ष आधुनिक तकनीक और बाजार की प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ी समस्या है। वर्तमान दौर कंप्यूटर, ऑटोमेशन और एआई का है। बड़ी कंपनियों के पास इन तकनीकों के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान होता है, जबकि छोटा उद्यमी महंगी तकनीक अपनाने में असमर्थ रहता है।

इससे उनकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है और वे बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। निश्चित रूप से एमएसएमई के लिए इन सभी चुनौतियों के मद्देनजर ‘एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक 2026’ एक दूरगामी कदम है। यह रोजगार और अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस विधेयक के पारित होने से कई सकारात्मक बदलाव दिखाई देंगे। पुराने नियमों में एमएसएमई की परिभाषा संकीर्ण थी। कारोबार (टर्नओवर) या निवेश बढ़ते ही उद्योग इस श्रेणी से बाहर हो जाते थे और सरकारी लाभ बंद हो जाते थे। नए संशोधन में निवेश और कारोबार की सीमाओं को क्रमश: 2.5 गुना और 2 गुना तक बढ़ा दिया गया है। इससे उद्यमी बिना किसी डर के अपने व्यापार का विस्तार कर सकेंगे। भुगतान में देरी से निपटने के लिए एक आधिकारिक ऑनलाइन विवाद निवारण प्रणाली और ‘डिजिटल मध्यस्थता तंत्र’ को कानूनी ढांचा दिया जा रहा है। अब अदालतों के चक्कर काटे बिना डिजिटल माध्यम से तय समय-सीमा के भीतर मामलों का निपटारा कर व्यापारियों को फंसा हुआ धन वापस दिलाया जाएगा। छोटे अपराधों का गैर-अपराधीकरण भी महत्वपूर्ण है।

किसी विवरण दाखिल करने में देरी या कागजी रिकॉर्ड में मामूली विसंगतियों जैसी मानवीय भूलों को अब आपराधिक मुकदमों की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। ऐसी गलतियों पर केवल तार्किक वित्तीय दंड (जुर्माना) लगाया जाएगा, जिससे कारोबार सुगमता को वास्तविक बल मिलेगा। ‘उद्यम आंकड़े’ (डेटाबेस) को केंद्रीय बैंकिंग प्रणालियों से जोड़ा जा रहा है। इससे बैंकों के लिए ग्राहक पहचान प्रक्रिया (केवाईसी) और आंकड़ों की सत्यता जांचना आसान हो जाएगा, जिससे कार्यशील पूंजी ऋण कुछ ही घंटों में स्वीकृत हो सकेंगे। सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए साख गारंटी आवरण (क्रेडिट गारंटी कवर) की सीमा को 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए कर दिया गया है। 10 करोड़ रुपए तक के ऋण की गारंटी स्वयं सरकार देगी, जिससे बैंक बिना झिझक उद्यमियों को ऋण दे सकेंगे । ‘उद्यम पोर्टल’ के माध्यम से लाखों महिला-स्वामित्व वाले सूक्ष्म उद्यम पंजीकृत हुए हैं। हस्तशिल्प, वस्त्र निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और गृह उद्योग जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व है, जिससे वे न केवल वित्तीय रूप से स्वतंत्र हो रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आजीविका प्रदान कर रही हैं। एमएसएमई संबंधी नए संशोधन लागू होने से स्थानीय संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग हो सकेगा। कानूनी जटिलताओं को समाप्त करना और डिजिटल माध्यमों से मुकदमों व बकाये का निपटारा करना अब आसान होगा।

डा. जयंती लाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री


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