राष्ट्रहित में नियमित सैन्य भर्ती जरूरी

By: Jul 30th, 2026 12:05 am

राष्ट्र की सुरक्षा केवल आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित, अनुशासित, प्रेरित और राष्ट्रनिष्ठ सैनिकों से सुनिश्चित होती है। इसलिए भारत की सैन्य भर्ती व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो सेना को दीर्घकाल तक सक्षम बनाए, युवाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित भविष्य प्रदान करे तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। समय की मांग है कि सरकार, सेना और रक्षा विशेषज्ञ चिंतन करें…

जून 2026 के अंतिम सप्ताह में देश के विभिन्न सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों से अग्निवीरों की पासिंग आउट परेड के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से चर्चा में रहे। प्रशिक्षण पूरा कर घर लौटते इन युवा सैनिकों का गांवों और शहरों में जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ स्वागत हुआ, उसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। कहीं माता-पिता अपने बेटे को सैनिक की वर्दी में देखकर भावुक हुए, तो कहीं फूलमालाओं और बैंड-बाजों के साथ उनका अभिनंदन किया गया। इन दृश्यों ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि भारतीय समाज में सैनिक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा, अनुशासन और त्याग का प्रतीक हैं। इन भावनात्मक दृश्यों के साथ अग्निपथ योजना को लेकर एक गंभीर बहस भी तेज हुई। प्रश्न यह है कि क्या चार वर्ष की संविदा आधारित भर्ती व्यवस्था भारत की दीर्घकालीन सुरक्षा आवश्यकताओं और युवाओं के सुरक्षित भविष्य के अनुरूप है, अथवा इसमें आवश्यक सुधारों का समय आ गया है? भारत सरकार ने 14 जून 2022 को अग्निपथ योजना को मंजूरी दी और 16 जून 2022 को इसकी घोषणा की। इसके अंतर्गत 17 से 21 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की चार वर्ष के लिए भर्ती की जाती है। पहले वर्ष लगभग 30 हजार रुपए मासिक वेतन मिलता है, जो चौथे वर्ष तक लगभग 40 हजार रुपए हो जाता है। वेतन का 30 प्रतिशत भाग सेवा निधि में जमा होता है, जिसमें सरकार भी समान राशि का योगदान देती है।

सेवा अवधि पूरी होने पर लगभग 11.7 लाख रुपए की कर-मुक्त सेवा निधि, लगभग 48 लाख रुपए का जीवन बीमा तथा कौशल प्रमाणपत्र उपलब्ध कराए जाते हैं। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार लगभग 25 प्रतिशत अग्निवीरों को प्रदर्शन, योग्यता और रिक्तियों के आधार पर नियमित सेवा में रखा जाना है, शेष 75 फीसदी अग्निवीरों को 4 साल बाद सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा, जिसके बाद उनके करियर और स्थायी रोजगार को लेकर भारी अनिश्चितता रहना तय है, दूसरे चार साल बाद बाहर होने वाले जवानों को भूतपूर्व सैनिक का दर्जा, आजीवन पेंशन या स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलेंगी, जो पहले स्थायी सैनिकों को मिलती थीं। कई राज्य सरकारों ने पुलिस और अन्य सेवाओं में अग्निवीरों को प्राथमिकता देने की घोषणा की है तथा निजी क्षेत्र की अनेक कंपनियों ने भी उन्हें रोजगार देने में रुचि दिखाई है। योजना के इन सकारात्मक पक्षों के बावजूद अनेक रक्षा विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं। उनका मानना है कि आधुनिक सैनिक तैयार करने की प्रक्रिया केवल हथियार चलाने का प्रशिक्षण नहीं है। सामरिक सोच, नेतृत्व क्षमता, रेजिमेंटल परंपराओं, टीम भावना, मानसिक दृढ़ता और युद्धक्षेत्र में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता विकसित होने में कई वर्ष लगते हैं। इसलिए चार वर्ष की सेवा अवधि अपेक्षाकृत कम मानी जानी चाहिए। आज भारत के सामने सुरक्षा चुनौतियां पहले से कहीं अधिक जटिल हैं। उत्तरी सीमा पर चीन के साथ तनाव, पश्चिमी सीमा पर आतंकवाद, ड्रोन के बढ़ते खतरे, साइबर हमले और तकनीक आधारित युद्ध ने सैन्य तैयारियों का स्वरूप बदल दिया है। ऐसे समय में सेना को ऐसे सैनिकों की आवश्यकता है जो आधुनिक तकनीक के साथ-साथ लंबा व्यावहारिक अनुभव भी रखते हों। रेजिमेंटल भावना भी भारतीय सेना की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। यह केवल प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि वर्षों तक साथ सेवा करने, कठिन परिस्थितियों का सामना करने और आपसी विश्वास से विकसित होती है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि चार वर्ष की सेवा अवधि इस भावना को किस सीमा तक प्रभावित करेगी, इसका आकलन दीर्घकालिक अनुभव और सैन्य अध्ययनों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अग्निपथ योजना के पहले बैच का कार्यकाल वर्ष 2026 में पूरा हो रहा है। कुछ समाचारों में यह भी कहा गया है कि तीनों सेनाएं प्रशिक्षित अग्निवीरों की अधिक संख्या को नियमित सेवा में बनाए रखने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे आधुनिक हथियारों, ड्रोन और डिजिटल युद्ध प्रणाली का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। हालांकि इस विषय में केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसे में यह उचित होगा कि चार वर्षों के अनुभव का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए और यह देखा जाए कि योजना अपने मूल उद्देश्यों यथा- युवा सेना, सैन्य दक्षता, वित्तीय संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा को किस सीमा तक पूरा कर पाई है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियां स्थायी नहीं होतीं। यदि व्यावहारिक अनुभव यह संकेत दें कि किसी नीति में सुधार की आवश्यकता है, तो समयानुकूल परिवर्तन करना ही दूरदर्शिता है। इसलिए अग्निपथ योजना का मूल्यांकन केवल भावनाओं या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य दक्षता, आर्थिक व्यवहार्यता और युवाओं के दीर्घकालीन भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यदि समीक्षा से यह स्पष्ट हो कि नियमित सैनिक भर्ती व्यवस्था सेना की युद्ध क्षमता, रेजिमेंटल परंपराओं और युवाओं के हितों के लिए अधिक उपयुक्त है, तो उसे पुन: प्राथमिकता देने या अग्निपथ योजना में आवश्यक सुधार करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

राष्ट्र की सुरक्षा केवल आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित, अनुशासित, प्रेरित और राष्ट्रनिष्ठ सैनिकों से सुनिश्चित होती है। इसलिए भारत की सैन्य भर्ती व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो सेना को दीर्घकाल तक सक्षम बनाए, युवाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित भविष्य प्रदान करे तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। समय की मांग है कि सरकार, सेना और रक्षा विशेषज्ञ मिलकर अग्निपथ योजना के अनुभवों की व्यापक समीक्षा करें और जो भी निर्णय लें, वह राष्ट्रीय सुरक्षा, सैनिकों के मनोबल तथा देश के भविष्य को ध्यान में रखकर लें। यही एक सशक्त, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।

अनुज आचार्य

लेखक बैजनाथ से हैं


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