कर्मचारी एक्ट सुप्रीम कोर्ट में भी खारिज, अनुबंध कर्मियों को पहली नियुक्ति की तिथि से देने होंगे वरिष्ठता-वित्तीय लाभ
विधि संवाददाता — शिमला
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश भर्ती और सरकारी कर्मचारियों की सेवा की शर्त अधिनियम, 2024 रद्द कर दिया था। महाधिवक्ता के आग्रह पर सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को लागू करने के लिए चार महीने का समय राज्य सरकार को दिया है। स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम देविंद्र कुमार मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ में हुई। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार को अब सभी अनुबंध कर्मचारियों को पहली नियुक्ति की तिथि से सीनियोरिटी और सभी वित्तीय लाभ देने होंगे। इसी भारी वित्तीय देनदारी को टालने के लिए राज्य सरकार ने विधानसभा में ये एक्ट पारित किया था और इसे 2003 से लागू किया गया था। इससे पहले हिमाचल हाई कोर्ट में न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने एक साथ 445 याचिकाओं का निपटारा करते हुए अधिनियम को कानून के प्रावधानों के विपरीत पाते हुए रद्द कर दिया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अधिनियम की धारा 3, 5 व 9 संवैधानिक ढांचे के विपरीत हैं और केवल इन धाराओं को असंवैधानिक घोषित करने के बाद, शेष प्रावधानों में कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं बचेगा और इसलिए अदालत संपूर्ण अधिनियम को निरस्त करने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर अपने निर्णय में कहा था कि विवादित अधिनियम को निरस्त किए जाने के मद्देनजर, प्रतिवादी-राज्य और उसके पदाधिकारियों द्वारा विवादित अधिनियम के आधार पर की गई सभी परिणामी कार्रवाई असंवैधानिक और अमान्य घोषित की जाती हैं और परिणामस्वरूप विवादित अधिनियम के आधार पर जारी किए गए सभी आदेश, निर्देश, लाभों की वापसी, इनकार या पहले से दी गई राहतों की वसूली का प्रस्ताव, जो न्यायालय के आदेश के विपरीत हैं, रद्द और निरस्त किए जाते हैं और सक्षम अधिकारियों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे सक्षम न्यायालयों द्वारा पारित निर्णयों के अनुसार कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर लाभ प्रदान करना सुनिश्चित करें। आरंभ में अनुबंध पर नियुक्त हुए हजारों कर्मचारियों ने उक्त एक्ट को चुनौती दी थी।
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