ज्ञान पर एकाधिकार का प्रश्न
इतिहास को जन भाषा में सम्प्रेषित करने वाला भी ब्राह्मण है और उसका विरोध करने वाले भी ब्राह्मण हैं। दरअसल समुदाय/जाति को लेकर समस्या नहीं थी, मूल समस्या तो ज्ञान के एकाधिकार की थी। लेकिन डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने तो ज्ञान के एकाधिकार प्रश्न पर एक नए स्थान से एक नई बहस शुरू कर दी थी। ज्ञान पर एकाधिकार किस समुदाय का था/है? अधिकांश शास्त्रों के लेखक महर्षि वेद व्यास जी माने जाते हैं और महाकाव्य के रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि। इसी पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए अंबेडकर ने लिखा कि भारत के शास्त्र एक शूद्र वेद व्यास ने लिखे, महाकाव्य, मसलन रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखे और आज की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति, भारतीय संविधान की रचना अंबेडकर के हाथों ही हुई…
आज देश में सब जगह से, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों, पर्वतीय क्षेत्रों, पिछड़े वर्गों से मांग उठ रही है कि ज्ञान पर कुछ समुदायों का ही एकाधिकार नहीं होना चाहिए। समाज के हर वर्ग को ज्ञान प्राप्ति का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों का कहना है कि भारतीय भाषाओं में ज्ञान नहीं दिया जा सकता। यदि किसी की ज्ञान प्राप्ति की इच्छा है तो उसे उन लोगों की ही भाषा सीखनी होगी जिनके पास ज्ञान की कुंजी है। ज्ञान पर एकाधिकार वालों की भाषा अंग्रेजी है। यह विवाद आज का नहीं है बल्कि युगों से चला आ रहा है। प्रयागराज में कुंभ के मेले का अवसर था। कुंभ पर्व में देश के दूरस्थ स्थानों से श्रद्धालु आए हैं। तमिलनाडु से भी और असम से भी। बंगाल से भी और सप्त सिन्ध क्षेत्र से भी। पेशावर, बलोचिस्तान, पंजाब, असम, तमिल प्रदेश जैसे सारा भारत ही प्रयागराज में जुट गया हो। गुरु रविदास जी भी अपने कुछ शिष्यों के साथ कुंभ मेले में आए हुए थे। शिविर लग गया था, नित्य प्रति सत्संग होने लगा। रविदास जी तन्मयता से गाते तो संगत सुध बुध भूल जाती। सब लोग साथ मिलकर गाने लगते। साधु संतों के भी अपने अपने अखाड़े हैं, अपनी अपनी मर्यादा है। लेकिन भीड़ रविदास जी के अखाड़े में इतनी ज्यादा क्यों जुटती है? रविदास जन भाषा में गाते हैं। सभी से लोक भाषा में ही संवाद करते हैं। आभिजात्य भाव का तो सवाल ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि ‘लोक’ तो वही कहलाएगा जहां लोक मानस ध्वनित हो रहा हो। रविदास जी का शिविर इसका प्रतीक था। आश्रम में शालिग्राम को भी स्थापित किया हुआ था। शालिग्राम, विष्णु का विग्रह है। इस प्रकार की स्थिति में आम तौर पर जो हो सकता था, वही होने लगा। कुछ दूसरे अखाड़ों को ईष्र्या होने लगी। वाराणसी के रविदास प्रयागराज के कुछ अहंकारी पंडितों की आंख की किरकरी बन गए थे। तनातनी बढ़ चुकी थी। प्रयागराज के कुंभ में सब जगह रविदास की चर्चा हो रही है।
जलन तो होती ही। सबसे बड़ी बात कि रविदास जी स्वयं ही उच्च स्वर में घोषणा कर रहे हैं कि वे चमार समाज से ताल्लुक रखते हैं। दोनों समाज शालिग्राम की पूजा करते हैं। लेकिन कुछ लोगों को अपने ज्ञान का अभिमान भी तो हो सकता है। वही अभिमान कुछ पंडितों का पीछा नहीं छोड़ रहा था। कहा भी गया है कि अभिमान और अहंकार सद्गुणों का नाश कर देता है और आपके ज्ञान को भी निष्फल कर देता है। थोथा ज्ञान तो भार बन जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि अंत में भार ही डुबो देता है। शर्त लग गई दोनों अपने अपने शालिग्राम को गंगा जी में छोड़ेंगे। जिसका शालिग्राम गंगा जी में तैर गया, वही सच्चा। लेकिन यहां भी एक चालाकी। किसी पंडित ने अपना शालिग्राम खोखली लकड़ी से बना लिया। देखने में बिल्कुल पत्थर का लगे ताकि कोई पहचान भी न सके। उसको लगा कि रविदास जी का शालिग्राम तो पत्थर का है तो निश्चय ही डूब जाएगा। गंगा के तट पर भीड़ जुट गई है। सब उत्सुक हैं। देखें क्या होता है। रविदास के चेहरे पर मुस्कान है। वे आश्वस्त हैं। उन्हें विश्वास है। उधर लकड़ी का खोखला शालिग्राम हाथ में लिए सज्जन के चेहरे पर धूर्ततापूर्ण मुस्कान है। एक का शालिग्राम नकली है और दूसरे का असली है। नकली कुछ देर तक जनमानस को प्रभावित कर सकता है। विजय तो असली की, सत्य की ही होती है। दोनों ने अपने अपने शालिग्राम गंगा जी को अर्पित कर दिए। लेकिन सभी देखते हैं रविदास जी का शालिग्राम गंगा में तैर रहा है। लकड़ी का खोखला शालिग्राम देखते देखते गंगा जी में डूब गया। चारों ओर रविदास जी की जय जयकार होने लगी। इस कथा का महात्म्य क्या है? इससे क्या शिक्षा मिलती है? ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। कोई भी व्यक्ति पुरखों से प्राप्त ज्ञान को अपने पास ही रख लेता है और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं करता तो वह ज्ञान डुबो देता है।
(अज्ञेय कहते हैं मर कर भी उसकी गति नहीं होती, वह ब्रह्म राक्षस बन जाता है। अज्ञेय की ‘ब्रह्म राक्षस’ कहानी देखें)। ज्ञान समाज के सभी वर्गों तक उन्हीं की भाषा में संप्रेषित करना चाहिए, तभी वह ज्ञान लोकोपयोगी होता है। रविदास यही कर रहे थे। यही कारण था, उनका शालिग्राम, उनका ज्ञान तैर गया। वह जन जन तक पहुंच गया। मध्ययुगीन समाज में ऐसे प्रसंग और भी मिलते हैं। तुलसी दास (सन् 1532 ईस्वी से 1623 ईस्वी) के साथ भी ऐसा प्रसंग जुड़ा हुआ है। तुलसी दास तो स्वयं ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखते थे। वे काशी जी में बैठकर त्रेता युग के इतिहास का एक अध्याय लिख रहे थे। त्रेता युग में अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश का राज्य था। महाराजा अज्ज के सुपुत्र महाराज दशरथ के राज्यकाल की घटना है। उनके ज्येष्ठ सुपुत्र को चौदह वर्ष का वनवास। रावण वध। राम राज्य की स्थापना। यह सारा इतिहास महर्षि वाल्मीकि जी ने संस्कृत भाषा में लिखा है। लेकिन तुलसीदास ने भारतीय इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय को जन जन तक पहुंचाने के लिए, उस क्षेत्र की जन भाषा अवधी में लिखना शुरू कर दिया। इसका विरोध भी वाराणसी के कुछ ब्राह्मणों ने ही करना शुरू कर दिया। तर्क एक ही था। जन भाषा में ज्ञान संप्रेषित नहीं होना चाहिए। यह संभव ही नहीं है। मामला यहां भी काफी आगे बढ़ गया। तब निर्णय हुआ कि परीक्षा हेतु विश्वनाथ मंदिर में सबसे नीचे तुलसीदास जी की रामचरितमानस रख दी जाए, उसके ऊपर अन्य ग्रंथ उपनिषद, पुराण और सबसे ऊपर वेद रख दिए गए।
मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। जब प्रात:काल मंदिर के कपाट खोले गए तब तुलसी की रामायण सबसे ऊपर रखी हुई थी। इतना ही नहीं उस पर शंकर के हस्ताक्षर भी दिखाई दे रहे थे। इतिहास को जन भाषा में सम्प्रेषित करने वाला भी ब्राह्मण है और उसका विरोध करने वाले भी ब्राह्मण हैं। दरअसल समुदाय/जाति को लेकर समस्या नहीं थी, मूल समस्या तो ज्ञान के एकाधिकार की थी। लेकिन डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने तो ज्ञान के एकाधिकार प्रश्न पर एक नए स्थान से एक नई बहस शुरू कर दी थी। ज्ञान पर एकाधिकार किस समुदाय का था/है? अधिकांश शास्त्रों के लेखक महर्षि वेद व्यास जी माने जाते हैं और महाकाव्य के रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि। इसी पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए अंबेडकर ने लिखा कि भारत के शास्त्र एक शूद्र वेद व्यास ने लिखे, महाकाव्य, मसलन रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखे और आज की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति, भारतीय संविधान की रचना अंबेडकर के हाथों ही हुई। विरासत से लेकर आज तक ज्ञान किसके हाथ रहा? अंबेडकर ठीक कहते हैं। ज्ञान साधना कोई करता है। ज्ञान पर अधिकार कोई दूसरा कर लेता है। फिर ज्ञान को किसी भाषा के डिब्बे में बंद कर दिया जाता है। अब उस डिब्बे तक वही जा सकता है जो उस विशेष भाषा को जानने वाला हो। सबसे बड़ी समस्या इसी चक्रव्यूह से निकलने की है।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री
वरिष्ठ स्तंभकार
ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com
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