पुस्तक समीक्षा : लोककथाओं का नया खजाना

By: Sep 20th, 2026 12:02 am

जगदीश कपूर और कृष्णचंद्र महादेविया ने लोककथाओं पर नई पुस्तक का संपादन किया है। ‘एक था भाट और अन्य लोककथाएं’ नामक पुस्तक में विभिन्न लेखकों की 28 लोककथाएं संकलित हैं। इसमें पहली लोककथा चंचल सरोलवी की ‘होनी’ है। बड़ा कौन, सच्चा सुख परिश्रम का, साठ वाली मक्की, मुर्गी और बिल्ली, वो नहीं तो वह भी नहीं, माया और भोले की सोलह जैसी लोककथाएं कृष्णचंद्र महादेविया ने लिखी हैं। पदीनू चिड़ू तारा नेगी की लोककथा है। इसी तरह जगदीश कपूर ने बदारू का किरडू, एक था भाट, टुंडीरागस व घमंडी जूं नामक लोककथाएं लिखी हैं। इनकी एक अन्य लोककथा है- परमात्मा सबकी सुनता है। दो बहनें, चतुर चिडिय़ा व आटे की रोटी नामक लोककथाएं डा. अनीता शर्मा ने लिखी हैं। भीम सिंह चौहान की लोककथा ‘भीम राजा खाना पीना हुआ बध, पर देखा नी लख’ भी इसमें संकलित है। अर्पणा धीमान की लोककथा संयोग भी पाठकों को पसंद आएगी। कृष्णा ठाकुर ‘कविता’ की लोककथा है- चन्दे्र की पन्द्रह, भोले की सोलह, उमा ठाकुर नधैक की लोककथा है- सती चैखी।

प्रकाश चंद्र धीमान ने लिखी है ‘किस्मत का खेल’। रतन चंद रत्नेश की लोककथा बुद्धिमान गोलू भी अच्छी है। लाहुला और सीख नामक दो लोककथाएं विद्या शर्मा ने लिखी हैं। देवता श्री कुलदेव जी प्रकटीकरण नामक लोककथा अर्जुन सिंह नेगी ने लिखी है। पूर्णेश गौतम ने कपिला गाय तथा अशोक दर्द ने महल नाग और पुन्नी माता नामक लोककथाएं लिखी हैं। ये लोककथाएं पाठकों को बांधने में सफल रही हैं। हिमाचल में तरह-तरह की लोककथाएं कही और सुनाई जाती हैं। आज हालांकि लोककथा सुनाने वाले कम होने लगे हैं। इस कारण इनका संग्रहण, संकलन और पुस्तक रूप में समक्ष प्रस्तुत करना और भी अपरिहार्य हो जाता है। हालांकि आज फेसबुक, यूट्यूब, अन्य आधुनिक साधन भी लोकसाहित्य को प्रस्तुत करने लगे हैं। हिमाचली लोकसाहित्य के संग्रहण और संरक्षण की दिशा में यह प्रयास सराहनीय है। प्रकाशक साहित्यागार, जयपुर ने इस पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसका मूल्य दो सौ रुपए है।

-फीचर डेस्क


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