युद्ध से लौटे पिता की कविताएं
समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य
कविताओं की महफिल में लेखन का न•ाराना और भाव व्यंजना का समावेश करते कवियों ने हिमाचली प्रसंगों की चित्रावलियां बनाई हैं। कविता जैसे पहाड़ की बर्फ को पिघला कर नदी के रूप में, पाठकों की यादों से गुजरी है। कविता का पहाड़ी कैनवास कई रंगों को सम्मिलित करता हुआ, परिपक्वता की कलम में आज बहुत कुछ कह रहा है, तो हमने इस शृंखला को नाम दिया ‘समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य’। काव्य रचनाओं के सागर को प्रतिबिंब की गागर में भरने का जहां प्रयास होगा, वहीं मूर्धन्य कवि एवं समीक्षक सतीश धर इस पूरी शृंखला का तराजू थामे बता रहे हैं कि हर कविता का वजन कितना है। काव्य रचनाओं की समीक्षा का फलक ऊंचा करेंगे कई साहित्यकार। प्रस्तुत है इस शृंखला की किस्त-6…
सतीश धर
मो.-9582347455
कविता
दीनू कश्यप
मो.-9816462707
हिमाचल की सांस्कृतिक राजधानी मंडी के वरिष्ठ कवियों में कवि दीनू कश्यप प्रगतिशील कवि के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। हिमाचल प्रदेश के सूचना एवं जन संपर्क विभाग में नौकरी से पूर्व दीनू कश्यप बीस वर्ष तक सेना में कार्यरत थे। जबलपुर में प्रशिक्षण के दौरान कविता-लेखन के प्रति रुचि को धार मिली। सेना की सेवाओं के दौरान ही कवि दीनू कश्यप अपनी बहुचर्चित और प्रभावशाली कविता ‘युद्ध से लौटा पिता’ के कारण चर्चित हो चुके थे। यह कविता युद्ध की भयावह स्थिति को एक बाल-कथा के रूप में पिता अपने बच्चों को सुनाता है। कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कवि युद्ध को सीधे युद्धभूमि के दृश्य के रूप में नहीं, बल्कि युद्ध से लौटे पिता और उसके बच्चों के बीच संवाद के रूप में प्रस्तुत करता है जिससे कविता का मानवीय प्रभाव बहुत गहरा हो जाता है। कविता देखें : ‘बच्चे खुश होते हैं/महान? और सुरक्षित समझते हैं/जब लौटता है/युद्ध से उनका सिपाही पिता।/बारी-बारी गोद में बैठते हैं वे/पिता के खुरदरे चेहरे को/नन्हीं उगलियों के पोरों से छूते हुए वे लाड़ जताते हैं/अपनी-अपनी समझ से/करते हैं प्रश्न/दुश्मन कैसा होता है पापा/गोली भागती है कितनी तेज/क्या दुश्मन देश में होते हैं खरबूजे/पिता उनको पसंद के/जवाब देता है/वे पूछते रहते हैं बराबर/क्या टैंक खुद ही/चढ़ जाता है टीलों पर/कैसे लांघी जाती हैं/चौड़ी गहरी नदियां/दुश्मन देश की तितलियां/कैसी होती हैं पापा/पिता उकताता नहीं प्रश्नों से/बाहों में समेट कर/चूमता है उन्हें/बड़ा लडक़ा पूछता है/क्या खाने-सोने के लिए/फौजी लौट आते हैं बैरकों में/क्या अंधेरा घिरते ही/कर दी जाती है लड़ाई बंद/तब पिता बखानता है/मुस्कुराते हुए सिलसिलेवार/सबसे भयानक-सबसे त्रासद/सबसे कठिन-सबसे यतीम/युद्ध में बिताए/अपने समय को।/लेकिन बच्चे हंसते नहीं/भय से उनकी आंखों के डेले/फैलने लगते हैं/बच्चों का यह रूप/पिता को कतई पसंद नहीं/सबसे छोटे को बहलाते हुए/पिता गढ़ता है कथा/जब मैं पहुंचा सीमा पार के गांव/सबसे पहले मिली/हलवाई की दुकान/वहां थी/गुलाब जामुनों की कड़ाही/बड़ा व मंझला चुटकी लेते हैं/आहा! छुटके के गुलाब जामुन/मंझला पूछता है/आपने कितने खाए पापा/अरे, खाता क्या/मुझे छुटके की याद आई/मैंने पौचेज और पिट्ठू से/गोलियां फैंक दी/उन में भर दिए गुलाब जामुन/तभी दुश्मन ने/गोलीबारी शुरू कर दी/पिट्ठू और पौचेज छलनी हो गए/गोलियों को ठण्डा किया/खांड की पात ने/गोलियों को रोका/गुलाब जामुनों ने/मैं तो बच गया/लेकिन गुलाब जामुन मारे गए/बच्चे समवेत कहते हैं/कोई बात नहीं…/कोई बात नहीं…/तो छुटके के गुलाब जामुनों ने बचाया आपको/पिता हां भरता है/छुटका पिता की मूंछों में/पिरोने लगा है/अपनी नन्हीं-नन्हीं उंगलियां।/जहां से शुरू हुआ जंगल।’
कविता का बिम्ब-विधान इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। इसमें युद्ध के कठोर बिम्बों और बचपन की कोमल दुनिया के बिम्बों का अद्भुत द्वंद्व है। यह कविता युद्ध-विरोधी कविता होते हुए भी प्रत्यक्ष राजनीतिक या घोषणात्मक कविता नहीं है। इसकी संवेदना का केंद्र सैनिक नहीं, सैनिक-पिता और उसके बच्चे हैं। कथात्मकता, संवाद, बाल-मन की भाषा, युद्ध और मिठास के विरोधी बिम्ब तथा अंत में वात्सल्यपूर्ण दृश्य- इन सबके कारण कविता युद्ध की भयावहता को मानवीय और मार्मिक धरातल पर स्थापित करती है। कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि कवि ने युद्ध की विभीषिका को गोलियों से नहीं, गुलाब जामुनों से अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। यही इस कविता का विशिष्ट शिल्पगत और संवेदनात्मक सौंदर्य है। हिमाचल के अन्य कवियों की भांति कवि दीनू कश्यप ने भी पर्वतीय जीवन की पीड़ा और विडंबनाओं को अपनी पहाड़-1, पहाड़-2 और पहाड़-3 जैसी कविता में सशक्त अभिव्यक्ति दी है : पहाड़-1 : ‘अलस्सुबह/सबसे पहले/जाग जाता है/हसरत से देखता है/घाटी से उठता धुआं/आमदरफ्त चौपायों की/धीरे-धीरे क्वाली चढ़ते/लकड़हारे के पांवों को/रपट जाता है/चिल्लारू पर/पगड़ीवाले आदमी का पांव/झाडिय़ों के कांटे/खींचते हैं/सैलानी बाबू की/झकझक कमीज को/तब वह/होहोऽऽहोहोऽऽ करके/हंसता है/परिवार के सयाने की तरह।
पहाड़-2 : ‘चल रही हैं उस पर/कुल्हाडिय़ां…/कुदालियां निरन्तर/हमलावरों के बरअक्स/खड़ा होता है/सीने को सख्त किए/वज्र चट्टान-सा/लेकिन जब/अपना ही कोई हाथ/डाइनामाइट को/लगाता है पलीता/तो मार्मिक हो कराहता है/घायल, बेबस और आसान/होते जाने की पीड़ा से/फूटती हैं धाराएं/जन्म देती हुई/एक और क्रोधित नाले को।’ पहाड़-3 : ‘अब रात-बेरात/काले अर्धचन्द्र-सा/खड़ा रहता है वह/उसकी गोद में/टिमटिमाता है/कुछ…बचे हुए पेड़/मायूसी में/कहते हैं/यह आग नहीं/बंधुआ रोशनी है/वरना/पहाड़ काला ना होता।’ पहाड़ पर श्रृंखला में लिखी इन तीनों कविताओं में पहाड़ केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं, बल्कि जीवित, संवेदनशील और घायल मनुष्य की तरह सामने आता है। कवि ने पहाड़ के बदलते चेहरे, उसके भीतर के उल्लास, प्रतिरोध, पीड़ा और विडंबना को बहुत कम शब्दों में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। पहाड़-1 में पहाड़ अपने आसपास के जीवन को बड़ी आत्मीयता से देखता है। यहां प्रकृति और मनुष्य के बीच एक जीवंत रिश्ता दिखाई देता है। पहाड़ -2 में पहाड़ पर लगातार चलती कुल्हाडिय़ां और कुदालियां विकास और दोहन की हिंसक प्रक्रिया का प्रतीक बन जाती हैं। पहाड़ बाहरी हमलावरों के सामने ‘वज्र चट्टान’ की तरह खड़ा रहता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी त्रासदी तब शुरू होती है जब ‘अपना ही कोई हाथ’ डाइनामाइट को पलीता लगाता है। इसी पीड़ा से फूटती धाराएं और ‘क्रोधित नाला’ प्रकृति के प्रतिशोध का संकेत बन जाते हैं। पहाड़-3 तक आते-आते पहाड़ का दृश्य अत्यंत भयावह और करुण हो जाता है। अब वह ‘काले अर्धचन्द्र’ की तरह खड़ा है। उसकी गोद में बची हुई रोशनी को पेड़ पहचानते हैं और कहते हैं- ‘यह आग नहीं/बंधुआ रोशनी है।’ यह बिंब पूरी कविता का केंद्रीय व्यंग्य बन जाता है। विकास की चमक, बिजली और आधुनिकता की रोशनी के बावजूद पहाड़ का काला पड़ जाना बताता है कि यह रोशनी उसके जीवन को प्रकाशित नहीं कर रही, बल्कि उसके विनाश की कीमत पर मौजूद है। पहाड़ यहां पर्यावरणीय संकट का महज प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य की विकासवादी मानसिकता के विरुद्ध खड़ा एक मौन साक्षी और घायल प्रतिरोध है।
कविता मोलाइजे : वर्ष 1985 में दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन के क्रांतिकारी युवा कवि बेंजामिन मोलाइजे को प्रिटोरिया सेंट्रल जेल में दी गई फांसी के प्रतिरोध में कवि दीनू कश्यप की कविता मोलाइजे अपनी ओर विशेष ध्यान आकर्षित करती है : ‘मोलाइजे/भाई/तुम जीत गए हो/जीत गई है/तुम्हारी निर्भीक कविता/तुम्हारी देह से टकराती/चाबुक की आवाज/मुक्तिगीत बन गई है/हर खित्ते में शोषित/बिरादर भाई की।/हल्की-सी खरोंच से भी/परेशान होने वाले/अम्मा-बाबा/इस परोसी गई मौत पर/क्रांति-गीत दोहराते निकले हैं/जेल से बाहर/जोहान्सबर्ग की गलियों में/आज हर अश्वेत मां/गर्वित महसूस कर रही है/पोस कर उदर में नवशिशु/हर नवशिशु में/क्रांति-विचार की तरह तुम्हें/मोलाइजे भाई/इस बीमार सदी में/जब-जब तानाशाह ने/बंदूक उठाई है/ईमानदार प्रतिबद्ध कविता/शेर की मानिंद गुर्राई है/तुम जीत गए हो/जीत गई है/तुम्हारी निर्भीक कविता।’ फांसी से पूर्व मोलाइजे ने अपनी मां के माध्यम से संदेश के रूप में जो कविता की पंक्तियां दुनिया तक पहुंचाई थी वही पंक्तियां निर्भीक कविता बनी।
कवि दीनू कश्यप की एक और कविता ‘ओ आकाश’ युद्ध को सैनिक की वीरता के पार जाकर एक साधारण मनुष्य की विवशता और उसके भीतर बचे मनुष्यत्व की दृष्टि से देखती है : ‘ओ आकाश/ये जो पहना है मैंने/लोहे का टोप/कंधे पर लटकी है जो बंदूक/देखो…/यह हमारे भारी भरकम बूट/ये मेरे नहीं हैं।/ओ आकाश/ये नहीं हैं मेरे/इन्हें बनाया होगा/किन्हीं बिके या/मजबूर हाथों ने/इन्हें बनवाया होगा/किसी महत्वाकांक्षी ने/ओ आकाश/ये मेरे नहीं…/बेमौसम की बारिश से/परेशान था मेरा खपरैल/सावन के मेघ/छिडक़ रहे थे जेठ की धूप/साफ कहूं/तो मैं निकला था।/घर से रोटी की तलाश में।/लेकिन उन्हें पहले से तलाश थी मुझ जैसी कद काठी की/जबकि उनका पान चबाता गबरू कम नहीं था मुझसे किसी बात से।/ओ आकाश/उन्होंने मुझे समझाया/मैंने भी पहली बार समझा/तुम्हारे नीचे पृथ्वी एक नहीं है।/पृथ्वी के हैं बड़े बहुत बड़े टुकडे।/हर टुकड़े की है अपनी-अपनी हद/मुझे ठेलनी है अपनी सरहद/किन्हीं बेगाने टुकड़े पर/ओ आकाश/जिंदा रहने का यह बीज गणित/मेरी समझ से बाहिर है/मेरी रोटी खेतों नहीं उगती।/वह गुथी हुई उग रही है/संगीनो की टहनियों पर।/ओ आकाश/युद्ध के इस ऊसर मैदान में/तुम वैसे ही नजर आते हो/जैसे घर के छोटे से आंगन से/फर्क तो है सिर्फ इतना/इस मरु प्रदेश में/ठण्डे पानी की बावडिय़ां नहीं हैं।’ कविता कहीं युद्ध की उस निर्मम राजनीति को उजागर करती है जिसमें बेरोजगारी, गरीबी और विवशता से निकला आदमी सैनिक बना दिया जाता है। कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह सैनिक को ‘योद्धा’ की अमूर्त छवि से निकालकर फिर से ‘रोटी की तलाश में निकले आदमी’ में बदल देती है। कवि का कोई भी कविता-संकलन अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है।
आत्म कथ्य
जन्म : 26 जनवरी 1944, 20 वर्ष तक सेना में अपनी सेवाओं के बाद हिमाचल प्रदेश के सूचना एवं जन संपर्क विभाग से जिला लोक संपर्क अधिकारी के पद से वर्ष 2002 में रिटायर होने के बाद कई बरसों तक अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की हिमाचल इकाई के प्रधान रहे। पहली रचना 1967-68 में ‘सैनिक समाचार’ में प्रकाशित हुई, तदोपरांत देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर छपते रहे। जबलपुर में सेना के प्रशिक्षण के दौरान ‘पहल’ के पूर्व संपादक स्व. ज्ञानरंजन के संपर्क में आए। हिमाचल में प्रगतिशील लेखन को धार प्रदान करने में कवि दीनू कश्यप की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
टिप्पणियां
मनुष्य के सरोकारों वाली कविताएं
कुलदीप शर्मा
मो.-7018402984
यदि समग्र रूप से देखें तो दीनू कश्यप की कविताओं की जो स्पष्ट काव्य-दृष्टि उभरती है वह मोटे तौर पर युद्ध-विरोध, मनुष्य की पक्षधरता, पहाड़ और पर्यावरण की पीड़ा, तथा सत्ता और हिंसा के विरुद्ध कविता का स्वर और तेवर है। हालांकि, कोई भी समीक्षा/टिप्पणी निष्कर्षात्मक नहीं हो सकती, न होनी चाहिए। किसी भी कविता में भाषा, संरचना, बिंब, प्रतीक, कथात्मकता, और वैचारिक अंतर्वस्तु के साथ-साथ कवि की सीमाएं-क्षमताएं भी परख में रहनी आवश्यक हैं। ‘युद्ध से लौटा पिता’ दीनू कश्यप की हस्ताक्षर कविता है, और निस्संदेह सबसे प्रभावशाली भी। इसकी शक्ति युद्ध के प्रत्यक्ष दृश्यों में नहीं बल्कि युद्ध से लौटे पिता और उसके बच्चों के बीच के संवाद में है। बच्चे युद्ध को अपनी परिचित दुनिया के उपकरणों से समझना चाहते हैं- खरबूजे, तितलियां, गुलाब जामुन, पिट्ठू, पौचेज। यही बाल-सुलभ जिज्ञासा युद्ध की अमानवीयता के सामने एक नैतिक प्रतिपक्ष का निर्माण करती है। कविता की वास्तविक शक्ति बाल-भाषा और युद्ध-भाषा के टकराव में है। पहाड़-1, पहाड़-2 और पहाड़-3 को अलग-अलग कविताओं के बजाय एक विकसित होती हुई त्रयी की तरह पढऩा अधिक उचित होगा। पहाड़ एक व्यक्ति की तरह अपने आसपास हो रहे विनाश से आक्रांत है, कविता में पहाड़ एक सक्रिय पर्यवेक्षक की तरह उपस्थित है। ‘मोलाइजे’ का आधार ऐतिहासिक रूप से अत्यंत मार्मिक है। कवि यहां बेंजामिन मोलाइजे की मृत्यु को पराजय नहीं, बल्कि कविता और प्रतिरोध की विजय के रूप में देखता है। ओ आकाश सैनिक के पारंपरिक रूप से हटकर लिखी गयी दीनू कश्यप की एक और महत्वपूर्ण कविता है। सैनिक बनने के पीछे राष्ट्रवादी गौरव की पारंपरिक कथा के बजाय कवि वर्गीय और आर्थिक विवशता को रखता है। यहां रोटी और संगीन का संयोग पूरी कविता के अर्थ को खोल देता है। जिस रोटी की तलाश में आदमी निकला था, वही अंतत: उसे युद्ध-व्यवस्था का हिस्सा बना देती है। कहा जा सकता है कि दीनू कश्यप की अधिकांश कविताओं के केंद्र में मनुष्य और मनुष्य के सरोकार हैं।
हिंदी कविता को ऊंचाई देने वाले कवि
रेखा वशिष्ठ
मो.-8219084406
कवि दीनू कश्यप हिमाचल की समकालीन कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। कवि ने कभी अपनी कविताओं के प्रकाशन को लेकर व्यग्रता नहीं दिखाई। यही कारण है कि इनका कोई भी प्रकाशित संकलन उपलब्ध नहीं है। जिन कवियों को हिमाचल की हिंदी कविता को वर्तमान ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय जाता है, उनमें दीनू कश्यप भी एक हैं। उनकी कविता आधुनिक भावबोध, सुचारु शिल्प और संवेदना की ठोस धरती से उपजती है। जीवन के आरम्भिक बीस साल सेना में बिताने के पश्चात कवि दीनू कश्यप प्रगतिशील लेखक संघ और फिर जनवादी आंदोलन से जुड़े। विचार की स्पष्ट प्रतिबद्धता के कारण ही इनकी कविता प्रतिरोध की कविता है। ‘युद्ध से लौटा पिता’ इनकी सर्वाधिक उल्लेखनीय कविता है। इस एक कविता ने इन्हें चर्चित और ख्यातिप्राप्त कवि बना दिया। अंग्रेजी साहित्य में प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत ट्रैंच कविता नाम से कविता की एक नई विधा ने जन्म लिया। यह युद्ध विरोधी कविता युद्ध भूमि में ट्रैंचों में लिखी गई, सैनिकों के प्रत्यक्ष अनुभवों की कविताएं थी। एक समय था जब दीनू कश्यप की कविताओं को ट्रैंच कविता के बरक्स रखकर भी देखा गया। सभी युद्ध विरोधी कविताओं की तरह यह कविता भी युद्ध का महिमामंडन नहीं करती, अपितु युद्ध की रोमांटिक छवि का विखंडन करती है। यहां सैनिक और उसकी वीरता केन्द्र में न होकर एक पिता और पुत्र का स्नेहिल संवाद केन्द्र में है। युद्ध के पीछे छिपी व्यक्ति की निजी पीड़ा का राष्ट्र की अमूर्त यश लिप्सा से अधिक महत्व है। युद्ध और पारिवारिक जीवन का द्वन्द्व केन्द्र बिन्दु है। यह कविता युद्ध के विराट राजनीतिक आख्यान को बच्चों की दृष्टि और बाल संवेदना के मानवीय धरातल पर ले आती है। गुलाब जामुन और पिता की मूंछें ऐसे घरेलू बिम्ब हैं जो युद्ध की हिंसक भाषा के विरुद्ध जीवन, स्मृति और स्नेह की भाषा का विकल्प प्रस्तुत करते हैं। पहाड़ में रहने वाले अन्य कवियों की तरह यह कवि भी पर्यावरण पर अंधाधुंध विकास और बाजारवाद के मंडराते हुए खतरे से बेचैन है। पहाड़ शीर्षक से लिखी उनकी कविताएं इसकी द्योतक हैं।
संवेदना जगाने वाली कविताएं
विजयलक्ष्मी नेगी
मो.-9418110586
वरिष्ठ कवि दीनू कश्यप की कविता ‘युद्ध से लौटा पिता’ का केंद्र बिंदु युद्धभूमि नहीं बल्कि युद्ध से लौटकर आया एक सैनिक पिता और उसके बच्चे हैं। इस कविता में कवि ने युद्ध को रणभूमि से उठाकर घर की चौखट और बच्चों की मासूम आंखों में उजागर किया है। जहां युद्ध किसी राजनीतिक घोषणा या सैन्य रणनीति का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के सहज प्रश्नों के रूप में उपस्थित होता है। कविता बच्चों की उस खुशी को सामने लाती है जो लंबे समय के उपरांत अपने पिता को घर लौटा देखकर उत्पन्न होती है। उनके लिए पिता केवल परिवार का सदस्य नहीं, वह उनकी सुरक्षा, विश्वास और प्रेम का केन्द्र है। कविता का एक सुन्दर और प्रभावशाली दृश्य तब उपस्थित होता है जब बच्चे बारी-बारी से पिता की गोद में बैठते हैं। पिता की गोद बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। पिता के खुरदरे चेहरे को अपनी नन्ही उंगलियों से छूते हैं। खुरदरा चेहरा और बच्चों के नन्हीं उंगलियों के पोर, यह दो बिम्ब कविता की संवेदना को बहुत गहराई तक ले जाते हैं। एक तरफ युद्ध से आया हुआ कठोर चेहरा, दूसरी ओर उसे छूती हुई बालसुलभ कोमलता। खुरदरापन केवल चेहरे की बनावट नहीं, वह युद्ध से छोड़े गए प्रभाव का प्रतीक है। इसके विपरीत बच्चों की उंगलियां की कोमलता जीवन, प्रेम और शान्ति की प्रतीक बनकर उभरती हैं। यहां कविता का सौन्दर्य दृश्यात्मक बिंबों से आगे बढक़र प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण करता है। बच्चों के प्रश्न कविता के महत्वपूर्ण रचनात्मक उपकरण हैं। वे युद्ध को अपनी समझ से समझना चाहते हैं। कवि दीनू कश्यप की पहाड़-1, पहाड़-2, पहाड़-3, श्रृंखला की कविताएं, पहाड़ का मानवीकरण कर विनाश के नाम पर पहाड़ के साथ हुई ज्यादतियों का लेखा-जोखा है। कविता कवि की पहाड़ के प्रति चिंता को प्रभावी रूप से दर्शाती है। बरसों पहले दक्षिण अफ्रीका के क्रांतिकारी कवि मोलाइजे को रंगभेद के प्रति प्रतिरोध पर फांसी की सजा ने कवि की वैश्विक चिंता को उजागर किया है। कविता ‘ओ आकाश’ मानवीय सरोकारों की गाथा है जिसकी पृष्ठभूमि में पुन: सैनिक है।
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