चुनाव आयोग में मतभेद की कहानी पुरानी, EC की विश्वसनीयता पर फिर उठे सवाल, टीएन शेषन पर भी लगे थे आरोप
इलेक्शन कमीशन की विश्वसनीयता पर फिर उठे सवाल, धाकड़ सीईसी रहे टीएन शेषन पर भी लगे थे मनमर्जी करने के आरोप
चुनाव आयोग यानी देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव का पहरेदार। तीन सदस्यीय इस संवैधानिक संस्था से आम तौर पर एक सुर में बोलने की उम्मीद की जाती है, लेकिन क्या चुनाव आयोग के भीतर हमेशा फैसले एकमत से होते हैं? जवाब है- नहीं। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जुड़े ताजा खुलासे इस तथ्य को फिर से सामने ला दिया है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है, जब सदस्यों की राय में मतभेद रहे हैं। भारत के सबसे चर्चित चुनाव आयुक्तों में टीएन शेषन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। कहते हैं उनका ऑरा ऐसा था कि उनके नाम से ही नेतागण कांपते थे। टीएन शेषन खुद कहते थे, मैं तो नाश्ते में नेता खाता हूं…
टीएन शेषन बनाम एमएस गिल-जीवीजी कृष्णमूर्ति
टीएन शेषन
इन घटनाओं में सबसे चर्चित नामों में से एक है टीएन शेषन का। 1990 के दशक में शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे और चुनावी व्यवस्था में सख्ती के लिए उनकी अलग पहचान बन चुकी थी। अक्तूबर, 1993 में राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त किए- एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति। इसके साथ ही आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय हो गया। टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई, 1995 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि संविधान बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की परिकल्पना करता है और चुनाव आयुक्तों की भी निर्णय प्रक्रिया में भूमिका है। यानी सीईसी आयोग का हिस्सा जरूर है, लेकिन बाकी चुनाव आयुक्त केवल औपचारिक सदस्य नहीं हैं। यहीं से एक अहम सिद्धांत स्पष्ट हुआ। अगर तीनों सदस्यों की राय अलग हो तो बहुमत का फैसला लागू होगा। यही व्यवस्था आगे चलकर चुनाव आयोग के भीतर होने वाली असहमतियों का आधार बनी। 1995 में गिल ने आरोप लगाया कि शेषन उन्हें और कृष्णमूर्ति को आयोग के काम में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं कर रहे हैं। एक विवाद में शेषन ने आयोग के काम का एक हिस्सा डिप्टी चुनाव आयुक्त को सौंप दिया, जिस पर गिल और कृष्णमूर्ति ने आपत्ति जताई। तब शेषन पर आरोप लगा था कि वे आयुक्तों को मीटिंग में नहीं बुला रहे थे, कागजात नहीं दिखा रहे थे और अकेले फैसले ले रहे थे। गिल और कृष्णमूर्ति ने आरोप लगाया कि शेषन ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे वे मौजूद ही नहीं हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ पत्र लिखते रहे, प्रेस में बयानबाजी हुई और आयोग का कामकाज प्रभावित हुआ। एमएस गिल ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसा व्यवहार किया जैसे हम मौजूद ही नहीं हैं।
एन. गोपालस्वामी बनाम नवीन चावला
नवीन चावला
यह एक असाधारण मामला था। इस मामले में चीफ इलेक्शन कमिश्नर ने अपने सहयोगी और इलेक्शन कमिश्नर को हटाने की सिफारिश कर दी थी। चुनाव आयोग के भीतर ऐसा टकराव सामने आया, जिसने पूरे संस्थान को हिला दिया। जनवरी 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपने ही साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश भेज दी। गोपालस्वामी ने चावला पर एक राजनीतिक दल के पक्ष में पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया था। यह सिफारिश ऐसे समय आई थी, जब लोकसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर थे और खुद गोपालस्वामी का कार्यकाल अप्रैल, 2009 में खत्म होने वाला था। मामला इसलिए और बड़ा हो गया, क्योंकि आयोग के तीसरे सदस्य एसवाई कुरैशी को भी इस फैसले की प्रक्रिया से अलग रखे जाने की खबर सामने आई। कुरैशी ने कथित तौर पर इसे सीईसी का व्यक्तिगत फैसला बताया था, आयोग का सामूहिक फैसला नहीं। आखिरकार राष्ट्रपति ने सरकार की सलाह पर गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद चावला अप्रैल, 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने। मतलब यह है कि चुनाव आयोग में असहमति इस स्तर तक पहुंच चुकी थी कि एक सीईसी ने अपने ही साथी आयुक्त को हटाने की सिफारिश कर दी थी।
प्रधानमंत्री मोदी- अमित शाह को क्लीनचिट और अशोक लवासा की अलग राय
अशोक लवासा
2019 का लोकसभा चुनाव आयोग के भीतर असहमति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण रहा। तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आदर्श आचार संहिता के मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों से अलग राय रखी। कई शिकायतों में आयोग के बहुमत ने आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना, जबकि लवासा की राय अलग थी। उन्होंने अपनी असहमति को आयोग के आदेशों में दर्ज किए जाने की मांग की। यही विवाद आगे बढ़ा तो लवासा ने आचार संहिता से जुड़े मामलों की बैठकों से खुद को अलग कर लिया। उनका तर्क था कि यदि उनकी असहमति को रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जाता, तो बैठकों में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं है। इस प्रकरण ने चुनाव आयोग में ‘माइनॉरिटी व्यू’ यानी अल्पमत की राय को सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी। हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया कि सदस्यों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है। 21 मई, 2019 को पूर्ण आयोग ने 2-1 के बहुमत से तय किया कि सदस्यों की अलग-अलग राय फाइल में दर्ज की जाएगी, लेकिन उसे अंतिम आदेश में सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। यह प्रकरण इसलिए ऐतिहासिक रहा, क्योंकि पहली बार चुनाव आयोग के भीतर किसी आयुक्त की असहमति इतनी स्पष्ट तरीके से सार्वजनिक बहस का विषय बनी। दरअसल तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था में बहुमत से फैसले लेने का प्रावधान है, इसलिए सदस्यों के बीच अलग राय होना अपने आप में असंवैधानिक या असामान्य नहीं है। असली सवाल तब उठता है जब यह असहमति आयोग के फैसलों, उसकी पारदर्शिता या सदस्यों के बीच अधिकारों के संतुलन को लेकर सार्वजनिक विवाद का रूप ले लेती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की भूमिका
भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जो लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करती है। आयोग के पास चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े कामों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और चुनाव आयुक्त यानी ईसी मिलकर आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं। सीईसी आयोग के प्रमुख होते हैं, जबकि अन्य दो चुनाव आयुक्त भी निर्णय प्रक्रिया में बराबर की भूमिका निभाते हैं। आयोग की जिम्मेदारियों में मतदाता सूची तैयार करना और उसका पुनरीक्षण, चुनाव कार्यक्रम तय करना, मतदान और मतगणना से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी और पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन शामिल है। चुनाव के दौरान राज्य और जिला स्तर की चुनावी मशीनरी आयोग के निर्देशन और नियंत्रण में काम करती है।
एसआईआर के बीच इन चेहरों पर मचा घमासान
ज्ञानेश कुमार
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने केरल सरकार में अडूर के सब कलेक्टर, अनुसूचित जाति और जनजाति विकास निगम के प्रबंध निदेशक, कोच्चि नगर निगम के नगर आयुक्त, केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक के प्रबंध निदेशक और एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर जैसे पदों पर काम किया। केंद्र सरकार में उन्होंने रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव और सहकारिता मंत्रालय में सचिव के तौर पर काम किया।
सुखबीर सिंह संधू
चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू 1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने 15 मार्च, 2024 को चुनाव आयुक्त का पद संभाला थ। इससे पहले वह जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे। इससे पहले करीब दो साल तक 2019 से 2021 के बीच एनएचएआई के अध्यक्ष रहे। उन्होंने कुछ समय भारत के लोकपाल के सचिव के तौर पर भी काम किया। केंद्र में वह उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त सचिव रहे, जहां आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से जुड़े काम देखते थे।
विवेक जोशी
डॉ. विवेक जोशी 1989 बैच के हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को चुनाव आयुक्त का पद संभाला था। वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। चुनाव आयोग में आने से पहले वह हरियाणा के मुख्य सचिव थे। इससे पहले केंद्र में उन्होंने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव, वित्तीय सेवा विभाग के सचिव और भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त के तौर पर काम किया। उन्होंने कपड़ा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय समेत कई विभागों में भी काम किया।
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