मिजोरम में भारतीय सेना ने बरसाए बम, संजॉय ने किया खुलासा
ऐतिहासिक कसौली क्लब में शुरू हुआ तीन दिवसीय साहित्यिक महोत्सव; मिजोरम के संघर्ष और वायुसेना की बमबारी के इतिहास पर रही सत्र की मुख्य चर्चा
दिव्य हिमाचल टीम-कसौली
ऐतिहासिक पर्यटन स्थल कसौली के अपर मॉल रोड स्थित प्रतिष्ठित कसौली क्लब में शुक्रवार को 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट का भव्य आगाज हुआ। 23 से 25 अक्तूबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में भाग लेने के लिए देश-विदेश से नामी लेखक, साहित्यकार और विचारक पहुंचे हैं। महोत्सव के पहले दिन प्रख्यात लेखक स्वर्गीय खुशवंत सिंह के सुपुत्र राहुल सिंह ने अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। सत्र के दौरान प्रख्यात लेखक एवं पत्रकार संजॉय हजारिका ने अपनी पुस्तक ‘लाल थानहॉला- द बॉय फ्रॉम जरकावट एंड द मेकिंग ऑफ मिजोरम’ पर चर्चा करते हुए मिजोरम के संघर्षपूर्ण इतिहास और सशस्त्र विद्रोह से लोकतांत्रिक राजनीति तक के सफर के कई अनछुए पहलू साझा किए। उन्होंने बताया कि मिजोरम के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे लाल थानहॉला का राजनीतिक जीवन समाज के विद्रोह, अलगाव, शांति समझौते, राज्यहुड और लोकतंत्र की स्थापना का विस्तृत लेखा जोखा है। उन्होंने बताया कि 1950 के दशक के मऊतम (बांस फूलने से आई अकाल) से शुरू होती है, जिसने मिजो नेशनल फैमिन फ्रंट को जन्म दिया। यह बाद में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) बन गया।
1966 में एमएनएफ के विद्रोह और आइजोल पर कब्जे के बाद भारतीय वायुसेना द्वारा राजधानी पर बमबारी की गई। यह स्वतंत्र भारत में अपनी ही जमीन पर की गई बमबारी का पहला और अंतिम मामला है। लाल थानहॉला खुद शुरू में एमएनएफ के फॉरेन सेक्रेटरी रहे, गिरफ्तार हुए और फिर जेल भी गए। रिहाई के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने कहा कि किताब इस संक्रमण को दर्शाती है कि कैसे एक व्यक्ति राज्य विरोधी आंदोलन से संवैधानिक राजनीति का चेहरा बन सकता है। चर्चा में छोटे राज्यों की चुनौतियों, केंद्र के साथ तालमेल और पूर्व मुख्यमंत्री लाल थानहॉला के राजनीतिक सफर का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया। लिटफेस्ट चर्चा में छोटे राज्यों मिजोरम, केरल, हिमाचल प्रदेश का जिक्र भी आया है। लेखक संजॉय हजारिका ने कहा कि केरल और हिमाचल लगभग पूर्ण साक्षर हैं, फिर भी आर्थिक आत्मनिर्भरता की कमी बनी हुई है। ऐसे राज्यों को ऐसे मुख्यमंत्रियों की जरूरत है जिनका मजबूत स्थानीय जनाधार हो और जो केंद्र सरकार से प्रभावी तालमेल रख सकें।
हिंदी साहित्यकारों की गैर मौजूदगी ने खड़े किए सवाल
साहित्यिक महोत्सव के पहले दिन हिंदी साहित्यकारों की गैरमौजूदगी ने आयोजन में हिंदी भाषा के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है, तो ऐसे प्रतिष्ठित मंचों पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के रचनाकारों को पर्याप्त स्थान क्यों नहीं मिलना चाहिए? हिमाचल प्रदेश में भी अनेक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार, कवि और लेखक हैं, जिन्होंने साहित्य जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे में आवश्यकता है कि अंतराष्ट्रीय पहचान रखने वाले इस महोत्सव में अंग्रेजी के साथ हिंदी, पहाड़ी और अन्य भारतीय भाषाओं के रचनाकारों को भी समान अवसर प्रदान किए जाएं।
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