गोपीनाथ मंदिर
देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय की हसीन वादियों में कई ऐसे रहस्यमयी मंदिर हैं, जिनकी कहानियां हर किसी को हैरान कर देती हैं। इन्हीं में से एक बेहद खास धाम चमोली जिले के गोपेश्वर में मौजूद है। इसे हम श्री गोपीनाथ मंदिर के नाम से जानते हैं। ये मंदिर पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा स्थान है, जहां भगवान शिव की पूजा पुरुष रूप में नहीं बल्कि एक गोपी के रूप में की जाती है। पहाड़ों और खूबसूरत हरियाली के बीच बसा ये धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि कत्यूरी राजवंश की बेमिसाल वास्तुकला और नागर शैली का एक अनोखा नमूना भी है।
भक्तों का अटूट विश्वास-प्रकृति की हसीन गोद में बसा गोपीनाथ मंदिर भक्तों के लिए एक परम शांति का केंद्र है। यहां की ठंडी हवाएं और शांत माहौल मन को एक अलग ही आध्यात्मिक सुकून से भर देता है। सावन के पावन महीने में तो यहां की छटा देखते ही बनती है। देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु भोलेनाथ का आशीर्वाद लेने गोपेश्वर पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस धाम में सच्चे दिल से मांगी गई हर मुराद महादेव तुरंत पूरी कर देते हैं।
शिव जी के गोपी रूप धारण करने का रहस्य-भगवान शिव के इस अनोखे गोपी रूप के पीछे द्वापर युग की एक बहुत ही सुंदर पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। जब भगवान श्री कृष्ण वृंदावन में अपनी मधुर बांसुरी बजाकर महारास रचा रहे थे, तो उसकी धुन पूरे ब्रह्मांड में गूंज उठी। उस मोहक संगीत को सुनकर कैलाश पर्वत पर बैठे महादेव खुद को रोक नहीं पाए। वे भी रासलीला में शामिल होना चाहते थे। लेकिन वहां केवल गोपियों का जाना ही संभव था। तब महादेव ने वृंदावन में प्रवेश करने के लिए एक रूपवती गोपी का रूप धारण किया था। इसी पावन घटना की याद में इस स्थान को ‘गोपेश्वर’ और मंदिर को गोपीनाथ कहा जाने लगा।
अष्टधातु के रहस्यमयी विशाल त्रिशूल की कहानी- गोपीनाथ मंदिर के विशाल प्रांगण में गड़ा अष्टधातु का विशालकाय त्रिशूल हर किसी को आश्चर्य में डाल देता है। ये भारी-भरकम त्रिशूल सदियों पुराना माना जाता है। स्थानीय कथाओं के अनुसार एक बार जब महादेव यहां अपनी समाधि में लीन थे, तब कामदेव ने उनकी तपस्या को भंग करने की कोशिश की थी। गुस्से में आकर शिव जी ने अपना त्रिशूल कामदेव पर चलाया था। कहा जाता है कि वही त्रिशूल आज भी इस मंदिर के आंगन में उसी तरह गड़ा हुआ है। इस अष्टधातु के त्रिशूल को लेकर कई चमत्कारिक दावे भी किए जाते हैं।
वास्तुकला और 24 द्वारों वाला अनूठा गर्भगृह- इतिहासकारों के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी राजवंश के राजाओं ने करवाया था। मंदिर की बनावट इतनी गजब है कि इसे देखकर हर कोई दंग रह जाता है। इसका मुख्य गर्भगृह लगभग 30 वर्ग फुट का है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस गर्भगृह तक पहुंचने के लिए भक्तों को 24 द्वारों से होकर गुजरना पड़ता है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी प्राचीन भारतीय वास्तुकला का जीता जागता प्रमाण पेश करती है।
रुद्रनाथ भगवान का शीतकालीन पावन धाम- गोपीनाथ मंदिर का संबंध पंच केदारों में शामिल चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ से भी बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। सर्दियों के दिनों में जब ऊंचे पहाड़ों पर भारी बर्फबारी होती है, तब रुद्रनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। उस समय भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली और उनकी मूॢत को बड़ी ही धूमधाम से गोपेश्वर लाया जाता है। जाड़े के पूरे छह महीने तक भगवान रुद्रनाथ इसी गोपीनाथ मंदिर में विराजमान रहते हैं और यहीं रोजाना उनकी पूजा-अर्चना बहुत श्रद्धा से की जाती है।
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