कुलभूषण उपमन्यु

हमारे देश में कुल विद्युत उत्पादन 524 गीगावाट है, जिसमें से 71 फीसदी अभी भी कोयले और जीवाश्म ईंधन से होता है। भारतवर्ष ने 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है। आशा की जानी चाहिए कि हम इसे हासिल कर सकेंगे। जो स्वयं पृथ्वी की रक्षा के लक्ष्यों को पूरा कर लेगा, वही दुनिया के अन्य देशों को भी इस दिशा में प्रगति करने के लिए जोर डाल कर कह सकेगा...

स्थानीय स्वशासन के सभी निकायों, नगर निकायों और पंचायतों के सदस्यों, प्रधानों, मेयर और कोंसिलर विशेष रूप से नियमों को लागू करने और जागरूकता फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। नियमों को लागू करने में असफलता या ढील के चलते इन चुने हुए स्थानीय स्वशासन के जिम्मेदार लोगों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को दंडित करने का प्रावधान किया गया है। कचरा पैदा करने वाले और प्रबंधन की जिम्मेदारी में ढील बरतने वाले, दोनों को ही दंड के दायरे में रखा गया है। यह नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू हो गए हैं, किन्तु मुख्य चुनौती तो इन प्रावधानों को सही से लागू करने-करवाने की है। कचरा प्रबन्धन नियम तो 2016 से ही लागू हो गए हैं। वर्तमान में उनको अधिक सख्त बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है, फिर भी जब तक गंभीरतापूर्वक लागू करने की

बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के नाम पर बहुत सी जानकारियों को छुपाया जाता है। इसके कारण अपशिष्ट प्रबन्धन पर निगरानी रखना कठिन हो जाता है। इन सबका एकत्रित विषाक्त प्रभाव कितना पड़ रहा है इसका अभी तक पूर्ण आकलन ही नहीं किया गया है...

कुछ जगह मनरेगा में भी खरपतवार उखाडऩे का काम हुआ था, किन्तु चरागाह स्थापित होने तक लगातार निगरानी और घास रोपण नहीं होने के कारण दोबारा वहां खरपतवार आ गया। और केवल जागरूकता भी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि लेंटाना आदि खरपतवार उन्मूलन का काम सघनश्रम का कार्य है। इसे स्वैच्छिक रूप से नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रदेश को चरागाह पुनस्र्थापन के कार्य को बजट का जरूरी हिस्सा बनाना होगा जो प्रदेश की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को संबल प्रदान करेगा...

अंग्रेजी शासन काल से इन बहुमूल्य जड़ी बूटियों को वर्किंग प्लान का हिस्सा नहीं बनाया गया जिस कारण इनको उगाने की व्यवस्थाएं भी पनप नहीं सकीं। छोटा मोटा उखाडऩे का परमिट जारी करने और एक्सपोर्ट परमिट जारी करने के बाद अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री मान ली गई...

पर्वतीय क्षेत्रों में ढांचागत विकास में भी विशेष सावधानी और उन्नत तकनीक प्रयोग की जरूरत है। सडक़ निर्माण मंत्री नितिन गडकरी जी ने स्वयं यह माना था कि डीपीआर बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों ने लापरवाही की है जिससे आपदा में वृद्धि हुई। इस बजट में पर्वतीय क्षेत्रों में बृहद ढांचागत निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और बेहतरीन तकनीक इस्तेमाल करने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं, यह सुनिश्चित नहीं किया गया है...

बेकार पदार्थों और कचरे के पुन: चक्रीकरण की व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करना संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। वायु प्रदूषण को रोकना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाना और पुनर्जीवित करने पर जोर देना पड़ेगा...

इसके साथ ही प्रधानमंत्री जी के आश्वासन के अनुसार आपदा में हुए नुकसान का पूरा आकलन करने के बाद अतिरिक्त सहायता राशि की जो बात कही गई थी, उस पर भी शीघ्र अमल होना चाहिए, क्योंकि यह पहाड़ी ठंडे क्षेत्रों का मामला है। जो लोग बिना घर टैंटों में पड़े हैं या रिश्तेदारों के यहां शरण ले रखी है भीषण ठंड के मौसम में उनके कष्टों का अंदाजा लगाया जा सकता है। राज्य सरकार ने 5-6 नवंबर से मंडी जिला से राहत राशि की पहली किस्त देकर शुरुआत करने का अच्छा निर्णय लिया है, किन्तु प्रदेश के अन्य जिलों में भी राहत राशि बांटने के काम में तेजी लाने की जरूरत है...

लद्दाख पिछले कुछ वर्षों से कुछ मुद्दों को लेकर आंदोलित है। लद्दाख ने धारा 370 हटने की खुशी मनाई थी, क्योंकि वह कश्मीर के निजाम में उपेक्षित महसूस करता था। वहां के लोग केंद्र शासित प्रदेश की मांग कर रहे थे। नई व्यवस्था बनने से केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिल गया। खुशी मनाई गई, किंतु धीरे-धीरे समझ आने लगी कि बिना विधानसभा के केद्रशासित प्रदेश का दर्जा हमारी आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाएगा, क्योंकि स्थानीय समझ के बिना और चुने हुए प्रतिनिधियों वाली विधानसभा के बिना यहां की जनापेक्षाओं को समझना और पूरा कर पाना संभव नहीं है। खासकर यहां की जमीनों को जो धारा 370 की वजह से खरीद-बिक्री से बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षा प्राप्त थी, उसके हट जाने से स्थानीय संसाधनों पर बाहरी कब्जे का खतरा पैदा हो गया। स्मरण रहे कि पहाड़ के लोग कठिन परिस्थितियों में जीवनयापन करते हैं और उनके लिए मुख्य धारा के धन्नासेठों से प्रतिस्पर्धा कर पाना संभव नहीं। इसलिए यदि खुले खेल की नौबत आती

हिमाचल को लेकर माननीय न्यायाधीश पार्दिवाला की टिप्पणी सामयिक और सटीक दिखाई पड़ रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर समय रहते हिमाचल में प्राकृतिक विध्वंस के कारणों को गंभीरता से लिए बिना यहां जारी विकास गतिविधियों को यूं ही जारी रखा गया तो प्रदेश के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगेगा। हिमाचल प्रदेश भूगर्भीय दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है। यह भूकंपीय दृष्टि से जोन 4 और 5 में पड़ता है। भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने के फलस्वरूप हिमालय का निर्माण हुआ है। अभी तक भी भारतीय प्लेट उत्तर की ओर लगभग एक सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से यूरेशियन प्लेट को धकेल रही है, जिससे अभी तक भी हिमालय निर्मा