पाठकों के पत्र

कितना अच्छा लगता है जब बात की जाती है 5 ट्रीलियन अर्थव्यवस्था बनने की और विश्वगुरु बनने की, लेकिन जब वल्र्ड हंगरी इंडेक्स के आंकड़े आते हंै तो हमें दुख होता है कि आखिर हम कैसे देश की गरीबी को मिटाने में कामयाब हो सकते हैं? खेद होता है यह देख कर कि कथिततौर से

दिन-प्रतिदिन कश्मीरी पंडितों का कत्ल हो रहा है। उनके घर-बार और चल-अचल संपत्तियों पर देशद्रोही तत्वों की बुरी नजर है। उनके बीवी-बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। भारत सरकार के प्रयत्नों से उनका पुन: आवास करवाया गया था, लेकिन लगता है शत्रुओं की कुत्सित विचारधारा उन्हेें चैन से नहीं रहने देना चाहती। एक अत्यंत कुटिल चाल के

वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पास कर अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था। अब 15 सितंबर को हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस लगभग सारी दुनिया में मनाया जाता है। पहली बार यह दिवस वर्ष 2008 में मनाया गया था। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों के बारे में

आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में अपनी सरकार बनाने के बाद अब हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी अपनी सरकार बनाने की कवायद में पूरे जोर शोर से जुटी हुई है। आम आदमी पार्टी का मानना है कि यदि इन राज्यों में इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी सरकार

आज हम भारतीयों में से बहुत से लोग अपनी हिंदी भाषा को बोलने में शर्म महसूस करते हैं, जबकि हमारे देश को आजाद करवाने वाले देशभक्तों और महापुरुषों ने हिंदी बोलने में अपनी शान समझी और इसके विस्तार के लिए काम किया। एक बार स्वामी विवेकानंद जी विदेशी यात्रा पर गए थे। वहां उनसे लोग

इसे दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है कि कुछ वर्षो से देश में कुछ ऐसे तथाकथित असामाजिक तत्व सिर उठाने लगे हैं जो अपने आपको सरकार और कानून से ऊपर समझ कर कभी देशभक्ति का प्रमाण पत्र बांटने लग जाते हैं, कभी धार्मिक उन्माद फैलाने पर आमादा हो जाते हैं, कभी जात-पात को लेकर, कभी आस्था

खेल में हार-जीत तो चलती रहती है। खेल के मैदान में जब दो टीमें खेलने के लिए उतरती हैं तो इनमें एक की जीत होती है तो दूसरी की हार। हाल ही में जो क्रिकेट का एशिया कप हुआ, इसमें हमारे देश की टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। हालांकि देश को यह उम्मीद थी कि

याकूब मेमन की कब्रगाह को इतना सजाया गया जैसे कि न जाने किसी महान शख्सियत की कब्रगाह हो। वह एक ऐसा आतंकवादी था, जो 1993 के मुंबई हमलों का दोषी था और उसे देशद्रोह के मामले में फांसी दी गई थी। उसका महिमामंडन कहां तक उचित है। मुंबई हमलों में लगभग 257 निर्दोष लोगों की

राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का फंडा को देशवासियों को समझने की जरूरत होगी और दलों को कारपोरेट्स से मिलने वाले हजारों करोड़ के चंदे को पारदर्शी बनाने की मांग हर देशवासी को उठाने की जरूरत होगी। कारपोरेट हो या कोई और हो, पर किसी के पास भी फालतू का पैसा नही होता है