पाठकों के पत्र

सात अगस्त को देश में राष्ट्रीय हथकरघा अर्थात हैंडलूम दिवस मनाया गया। वर्ष 1905 में जब अंग्रेजी शासक लार्ड कजऱ्न ने बंगाल विभाजन की कोशिश की तो उसी समय कोलकाता के टाउनहॉल में हमारे देश के लोगों ने स्वदेशी आंदोलन का श्रीगणेश किया था। इस कारण यह दिवस 7 अगस्त को मनाया जाता है। हथकरघा हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति की एक पहचान भी है।

यह एक साधारण-सा वाक्य नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज की बदलती मानसिकता का सटीक चित्रण है। हम गांव के शुद्ध दूध की बात करते हैं, देसी घी की प्रशंसा करते हैं, जैविक अनाज खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं, गांव के फलों और सब्जियों को स्वास्थ्य का आधार मानते हैं, गांव की संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक जीवन को अपनी पहचान बताते हैं, लेकिन जब स्वयं गांव में रहने की बात आती है तो अधिकांश लोग उससे दूरी बनाना चाहते हैं। यह विरोधाभास केवल जीवन-शैली का नहीं, बल्कि विकास की हमारी अवधारणा का भी प्रश्न है। भारत को सदियों से गांवों का देश कहा जाता रहा है। आज भी देश की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। हमारी अर्थव्यवस्था की नींव कृषि पर टिकी है और कृषि गांवों के बिना संभव नहीं है।

छह अगस्त को विश्वभर में हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है। पाठक जानते होंगे कि यही वह दिन है जब वर्ष 1945 में अमरीका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया था। इस दिन विश्वभर में परमाणु हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है तथा शांति, परमाणु निरस्त्रीकरण और मानवता का संदेश दिया जाता है।

जुगनू प्रकृति का अद्भुत और आकर्षक कीट है जो अपनी अनोखी जैव दीप्ति के कारण विश्व में विख्यात है। विश्व में लगभग 2000 से अधिक जुगनू की प्रजातियां पाई जाती हैं। जुगनू के पेट के अंतिम छोर पर प्रकाश उत्सर्जन करने वाला अंग होता है। यह प्रकाश ठंडा और ऊष्मा रहित होता है। जुगनू का पूरा जीवन चक्र 1 से 2 वर्ष का होता है।

शिशुओं के लिए स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के क्रम में प्रतिवर्ष 1 से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य सभी माताओं, परिवारों, स्वास्थ्यकर्मियों और नीति-निर्माताओं को स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना तथा प्रत्येक शिशु को जीवन की सर्वोत्तम शुरुआत दिलाना है।

सडक़ पर अचानक सामने आ गई गाय, सांड या भैंस। चालक के पास ब्रेक लगाने का समय नहीं। पलभर में वाहन असंतुलित हुआ और एक परिवार की खुशियां हमेशा के लिए उजड़ गईं। भारत के शहरों, कस्बों और गांवों में यह दृश्य अब असामान्य नहीं रह गया है। हर दिन अखबारों और समाचार चैनलों में ऐसे हादसों की खबरें आती हैं, जिनमें निर्दोष लोग अपनी जान गंवा देते हैं या जीवनभर के लिए अपंग हो जाते हैं। यह केवल सडक़ सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, सामाजिक गैर-जिम्मेदारी और कानून के कमजोर क्रियान्वयन का गंभीर परिणाम है। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि इनके कारण होने वाले हादसों के पीडि़तों के लिए वैधानिक मुआवजा व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, अत्यंत स्वागतयोग्य और समयोचित निर्देश है।

31 जुलाई को देशभक्त शहीद ऊधम सिंह का शहीदी दिवस मनाया गया। हमारे देश में बहुत से ऐसे देशभक्त भी हुए जिन्होंने छोटी उम्र में ही देश को आजाद कराने की खातिर निस्वार्थ भाव से सब कुछ न्योछावर कर दिया, जान की बाजी लगा दी। इन्हीं में से एक थे शहीद ऊधम सिंह। 31 जुलाई 1940 को वह भी देश पर कुर्बान हो गए थे।

पेपर लीक विरोधी संशोधन विधेयक का लोकसभा से पारित होना देश के करोड़ों युवाओं के लिए राहत की खबर है। राज्यसभा से भी इसके पारित होने की पूरी संभावना है। यह कानून पेपर लीक कराने वाले गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त करेगा, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल कड़े कानून किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होते। जब तक शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार नहीं होंगे, तब तक पेपर लीक माफिया नए रास्ते खोजते रहेंगे। आज देश में लगभग हर बड़ी भर्ती या प्रवेश परीक्षा किसी न किसी विवाद का सामना कर चुकी है।

पेपर लीक के मामलों और अन्य गड़बड़ घोटालों के लिए शत-प्रतिशत भ्रष्टाचार जिम्मेदार है और हमारे देश में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। जब तक भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने के लिए काम नहीं किया जाएगा, तब तक देश में कोई भी गलत काम नहीं रुकेगा। सरकारों में चेहरे बदलने से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा, बल्कि सरकारों को धरातल पर काम करना होगा।