
‘बर्र के छत्ते में कलम’ अगर व्यंग्य की भाषा है, तो सरकारी चरागाह के बीचोंबीच ‘गई भैंस पानी में’ व्यंग्य की पराकाष्ठा है। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हुए व्यंग्य में अपनी धार को कायम करने का नाम है अजय पाराशर।
यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम।
हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में निर्गुण भक्ति काव्य धारा वह शाखा है, जिसमें निराकार, अगम और अजन्मे ईश्वर की उपासना की जाती है। इस धारा की प्रमुख विशेषताओं में ईश्वर का...
कोई गजल संग्रह ‘त्रिशूल’ कैसे हो सकता है, लेकिन डा. विनोद प्रकाश गुप्ता ‘शलभ’ अपने रचनाकर्म की अभिलाषा, उद्गम स्रोत, चपलता और संदर्भों की बानगी में इसे वाकई त्रिआयामी कलश बना देते हैं।
भेड़ बुजुर्गों का कहना है जब भेड़ मूंडनी हो तो उससे पूछा नहीं जाता दो-चार हरी पत्तियां रोटी का एक ग्रास या चंद दाने दिखा कर एक सछल शरारती पुचकार के साथ करीब बुला लिया जाता है उसे और वह निरीह सहज चली आती है बस, सुविधाजनक ढंग से कैंची चला कर ऊन उतार लो
यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम। कभी किसी दूब पर दूर से आती छटा, शब्दों को भावों में पिरोती हवा। एक स्पर्श कहीं दीप में बुझती बाती को सहला रहा, तो कहीं क्रंदन किसी महफिल के रोमांच में अनसुना रह गया। हिमाचल का कहानीकार, समाज के रंगमंच पर वर्षों से श्रम साधना करता हुआ, अभिव्यक्ति के नजराने पेश कर रहा। ‘हिमाचली हिंदी कहानी - विकास यात्रा’ की 106 किस्तों के बाद कहानी अपने शृंगार में सीधे पाठकों तक। हर कहानी की पृष्ठभूमि, उसकी संरचना, कथानक, विषय, पात्र, उद्देश्य, भाषा और शैली के साथ एक पूरा रचना संसार शिरकत कर रहा है। एक अपनापन या अपनों से रूठा मन, पहाड़ की गवाहियों में खड़े उदास मंजर या किसी झरने के पास प्यासी नदी का स्पंदन। जीवन की तलाश में कहानी का सफर कहां पहुंचा, इसी बिंदु पर विवेचन की परंपरा के हिमाचली हस्ताक्षर खोज कर ला रहे हैं, प्रसिद्ध साहित्यकार राजेंद्र राजन। पेश है आज ५८वीं किस्त :
इंटरनेट पर/बच्चे ने जब देखा/अपना गांव/उसने ढूंढ निकाला/दादा का घर/पर ढूंढ नहीं पाया/अपने दादा को/वो बार-बार खोजता रहा/घर के रास्ते/आंगन में गाय/बगीचे में सेब/चौराहे पर खेलते बच्चे/दादी का चूल्हा/उसमें पकती मक्की की रोटी/देसी राजमाह की दाल/बहुत कोशिश करने पर/उसे दिखती रहीं/सिर्फ घरों की छतें/नजर आया/साफ-सुथरा पूरा गांव/निहारता रहा उसको/महीनों लगातार/वह सोचने लगा/नहीं जाना पड़ेगा/अब उस गांव/जहां खानी पड़ती है/कच्चे रास्तों की धूल/गोबर की गंध/जहां खुलती है रात/सूर्योदय से पहले/खाने में मिलती है/लस्सी, दाल और/मक्की की रोटी/जरूरी हुआ तो/दादा से बतिया लेंगे/कभी फोन पर/जब कभी होगा/गांव में तीज त्योहार/उसे मना लेंगे यहीं/किसी बड़े होटल में/पीज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक के साथ/और देखेंगे/इंटरनेट पर/अपना साफ-सुथरा गांव।
पुस्तक के रचयिता सुभाष राय के कथनानुसार 8वीं-9वीं शताब्दी की बात है, तमिलनाडु के प्राचीन नगर पुदुवै में महान संत कवि विष्णुचित्त रहा करते थे। एक दिन उन्हें अपने बगीचे में एक शिशु कन्या मिली। वे उसे घर ले आए। उसका नाम ‘गोदा’ रखा। घर में वे उसे ‘कोदै’ पुकारते थे। कोदै यानी सुगन्धित केशों वाली लडक़ी। बचपन में पिता से कहानियां सुनते-सुनते वह कृष्ण के सौन्दर्य पर मोहित हो गयी। प्रेम प्रगाढ़ होता गया। विष्णुचित्त रोज भगवान के लिए मालाएं बनाते थे। उनके घर में न रहने पर कोदै विष्णु के लिए बनायी गयी माला पहन लेती और दर्पण के सामने खड़ी होकर अपने प्रिय से संवाद करती। उनसे पूछती, ‘क्या मैं तुम्हारी पत्नी बन सकती हूं?’ एक दिन विष्णुचित्त ने उसे ऐसा करते देख लिया। वे बहुत क्षुब्ध हुए। उन्होंने बेटी को समझाया और विष्णु को नयी मालाएं चढ़ायीं। एक दिन विष्णुचित्त के स्वप्न में भगवान आए। उन्होंने कहा, ‘तुम जो मालाएं ले आते हो, उनमें कोदै की देह की गंध नहीं मिलती। क्या तुम पहले जैसे कोदै की पहनी हुई मालाएं देना जारी रख सकते हो?’ विष्णुचित्त को बहुत ग्लानि हुई। उनकी समझ में आ गया कि विष्णु भी कोदै को प्रेम करते हैं। उसी दिन उन्होंने कोदै को ‘आण्डाल’ नाम दिया। आण्डाल यानी विष्णु पर राज करने वाली। आण्डाल प्रेम में पागल हो गयीं। यह विष्णु ही उनका कृष्ण भी था। ऐसा अपूर्व प्रेम देखकर कृष्ण भी भला कैसे चुप रह सकता था। वह भी पिघल गया। उसके ही रूप श्रीरंगनाथ ने विष्णुचित्त को सपने में निर्देश दिया कि आण्डाल उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार है।
‘पंच परमेश्वर’ कहानी का तो नाम ही द्विवेदी जी ने रखा था। हस्तलेख में कहानी का नाम ‘पंच भगवान’ था। द्विवेदीजी ने ‘भगवान’ करे काटकर ‘परमेश्वर’ कर दिया है। सर्वविदित है कि किसी भी कहानी, उपन्यास अथवा अन्य सृजनात्मक कृति के शीर्षक का चयन ऐसा होना चाहिए कि वह कहानी की रुह को रेखांकित कर सके। ‘पंच परमेश्वर’ पाठकों, स्कूली छात्र-छात्राओं के दिलों में उतर गई। समाज में ईमानदारी, पंचायतों में न्याय परंपरा की परिपाटी और मानवीय मूल्यों को स्थापित किया। प्रेमचंद शोषणमुक्त समाज के स्वप्नदृष्टा थे और मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने में प्रयासरत थे। ‘पंच परमेश्वर’ और ‘ईश्वरीय न्याय’ जैसी कहानियों की रचना के माध्यम से वे समाज में मूक क्रान्ति के सूत्रधार थे। उनकी कहानियों के पात्र लाखों-करोड़ों पाठकों के दिलों में उतर कर उन्हें आंदोलित करते रहे, तो यह साहित्य सृजन के सरोकारों और उसकी उपादेयता का ही सूचक है।