प्रतिबिम्ब

प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘पंच परमेश्वर’ का मूल शीर्षक ‘पंच भगवान’ था और सरस्वती में प्रकाशन से पूर्व संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उसके सैंकड़ों शब्दों को बदलने, सुधारने के बाद छापा था।

डा. दीनदयाल वर्मा का काव्य संग्रह ‘धुंध के उस पार’ जीवन की अनुभूति करवाता है। अनुभूतियों, स्मृतियों और भावनाओं को शब्दों में ढालने का सशक्त प्रयास इस काव्य संग्रह में हुआ है। यह पुस्तक मन और प्रकृति के बीच गहरे संवाद का संवेदनशील दस्तावेज है...

यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम। कभी किसी दूब पर दूर से आती छटा...

साहित्य का बीजारोपण करते संदर्भ कहानी, उपन्यास, व्यंग्य या कविताओं की मिट्टी ढोते हैं, तो परिस्थितियों की दिनचर्या में साहित्यकार का रचना कर्म किन उजालों से गुजरता है, कुछ इसी तरह की पड़ताल करती डा. हेमराज कौशिक की पुस्तक ‘साहित्य के विविध आयाम’ नए तेवर-नए कलेवर के साथ प्रस्तुत है। यह किताब एक अध्ययन कक्ष की तरह खुलती है

गणेश गनी का काव्य संग्रह ‘ढालपुर में चिनार’ आज के यथार्थ को बयां करता है। ‘सुनो, नदी लौट आई है’ नामक कविता में कवि को किस बात की चिंता है, यह देखिए, ‘औट की अंधेरी सुरंग पार की है अभी-अभी/पास बैठे एक आदमी ने...

पहाड़ी कविता संग्रह ‘जणेत’ सुरेंद्र मिन्हास कहलूरी की 15वीं पुस्तक है। जणेत का माहौल बनाते हुए कवि के भाव देखिए, ‘हारी-फारी पुज्जी जणेत कुड़मा रे गांवा/होई गौरी थी सन्ज धारा पर पड्छांवा/स्कूले रे मैदाने च मेच कुरसियां थी रखूरी/तड़ोई कुसियां जणेत थी बड़ी थकुरी/ल्याये कुडिय़ा वाले गर्म चाह कने मठयाई/पुक्ख थी लगुरी सारेयां जिक्की-जिक्की खाई/चले सारे पंडिता सौगी करने जो मिलणी/बापू, मामा, भाई, ताऊ री हुई छैल मिलणी।’ वोटर का कत्र्तव्य बताते हुए कवि ‘बोट जरूर पाओ लोको’ नामक कविता में कहता है, ‘वोट पाणे जरूर जायों मेरे पैण-पाई/घरे नी रवे कोई बी दादी-ताई/मना री वाजा ते सारे वोट पायो/जेड़ा खरा लगदा तिस्सा ई जतायो।’ इस संग्रह में 108 कविताएं संकलित हैं। काव्य संग्रह लेखन में कवि की गहराई एवं चिंतन के साथ-साथ मातृभाषा एवं स्थानीय बोली के प्रति प्रेम व सम्मान को भी दर्शाता है। कवि ने समसामयिक विषयों और रोजमर्रा के जीवन में जो अनुभव किया, उसी विषय पर कविताएं लिखी गई हैं, जैसे कि जणेत, फोरलेना रा फेरा, करसाणा री जिन्द, मुआ स्याला, बोट मींजो पायों आदि।

अनूप सेठी की चयनित कविताओं का गुलदस्ता ‘समकाल की आवाज’ बन कर पेश हुआ है। कुल 56 कविताओं के आंचल में दुनिया भर के जज्बात, लेकिन पहाड़ की महक, यादों के झरोखे और एहसास लिए कवि बादलों की तरह समुद्र से पर्वत तक की दुनिया समेट लेता है। अपनी धाराओं-धारणाओं के कवि प्रकृति के लंबे कैनवास पर काम करते हैं। इनकी कविताएं कूची बन जाती है, जब पहाड़ की सफेदी से मुंबई के तट पर सागर सा लिखते हैं, ‘आएगी सीढिय़ों से धूप, बंद द्वार देखकर लौट जाएगी, खिडक़ी में हवा हिलेगी, सिहरेगा नहीं रोम कोई, पर्दों को छेडक़र उड़ जाएगी, पहाड़ी मोड़ों को चढक़र रुकेंगी बसें, टकटकी लगा के देखेगी नहीं कोई आंख!’ जिंदगी की उड़ान में त्रासदियों के घरौंदे भी कभी जमीन की शून्यता को नहीं भूलते। कविता अपनी मिलकीयत के लिए जब

यह कहानी कश्मीर में आतंकवाद पर केंद्रित है। घाटी से जबरन निकाले गए समुदाय विशेष के लोग सहायता शिविरों में रह रहे हैं। वहां पर रिलीफ के लिए अक्सर लंबी-लंबी कतारें लगी रहती हैं। समुदाय विशेष की बेटियों से रेप होते हैं, उन्हें मार दिया जाता है। कहानी का नायक एक युवक है जो अपनी मां के साथ शिविर में रहता है। वह अपनी मां के पूछने पर मां को आश्वासन देता है कि हम जल्द ही अपने घरों में लौट जाएंगे। क्या यह सपना पूरा हुआ या नहीं, यह जानने के लिए पढ़ें इससे आगे की कहानी...

यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम। कभी किसी दूब पर दूर से आती छटा...