मोदी, मुद्दे और मसूद अजहर

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

संयुक्त राष्ट्र संघ का अस्तित्व अमरीकी सहायता पर निर्भर करता है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ की नीतियां अमरीकी हितों से प्रभावित होती हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका ने एकजुट होकर चीन पर दबाव बनाया, तो चीन सीधे रास्ते पर आया और उसे मोहम्मद मसूद अजहर को लेकर झुकना पड़ा। पिछले कई सालों से सारी कोशिशों के बावजूद चीन अजहर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को वीटो कर देता था। इस बार अगर चीन झुका है, तो यह ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका की कोशिश का फल है…

पांच चरणों का मतदान हो चुका है और अब मतदान के सिर्फ आखिरी दो चरण बचे हैं। मोदी और अमित शाह दिन-रात आक्रामक चुनाव प्रचार में जुटे हैं, लेकिन इस बीच उनका नैरेटिव लगातार बदलता रहा है। यही नहीं, उनके भाषणों में चुनाव के असली मुद्दे सिरे से ही गायब हैं। आंकड़ों में हेरफेर के बावजूद विकास के नाम पर बताने को कुछ नहीं है और रोजगार के मामले में तो वह पहले ही पूरे देश को पकौड़े तलवा चुके हैं। सेना के नाम का प्रयोग इतनी बेशर्मी से हुआ कि चुनाव आयोग को इसके लिए मना करना पड़ा। इसके बावजूद न मोदी बाज आए, न उनके सिपहसालार। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो भारतीय सेना को मोदी की सेना का खिताब भी दे डाला। पिछले पांच सालों में अर्थव्यवस्था का बेड़ा ऐसा गर्क हुआ है कि अब देश महामंदी की कगार पर है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की सुनामी से हमारे कान पक गए हैं, लेकिन सरकार में खेद का कोई भाव नहीं है। मोदी सरकार आर्थिक विजन की कमी से तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्था छोड़ कर जा रही है। एफडीआई वृद्धि पांच वर्ष में न्यूनतम है। कोर सेक्टर का विकास पिछले दो साल से निम्न है और रुपया एशिया की सर्वाधिक खराब प्रदर्शन वाली करेंसी है। अगली सरकार जो भी आए, चाहे मोदी की हो या किसी और की, उसके लिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती होगी।

एक बार फिर अर्थव्यवस्था अत्यधिक नियंत्रणों में जकड़ी हुई है और सरकार के नियंत्रण व हस्तक्षेप इतने ज्यादा हो गए हैं कि रेगुलेटर अब कंट्रोलर बन गए हैं। चुनाव होना, किसी दल का जीतना या हारना सामान्य बातें हैं, लेकिन असंवेदनशीलता और बेशर्मी की ऐसी हद पहले कभी देखने को नहीं मिली। समाज दो स्पष्ट वर्गों में बंट गया है। पहले वर्ग में वे लोग हैं, जो मानते हैं कि मोदी हैं तो देश है। मोदी है, तो पाकिस्तान डरा हुआ है। मोदी है, तो चीन रास्ते पर आ गया और मोदी है, तो मसूद अजहर अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित हो गया। समाज का दूसरा समुदाय वह है, जो जानता है कि विरोध का मतलब है, वर्तमान शासकों की नजरों में आना, जिसका परिणाम व्यवसाय पर छापा और किसी भी बहाने गिरफ्तारी हो सकता है। इसलिए यह वर्ग या तो डर के कारण चुप है या फिर इसलिए चुप है कि मुफ्त में बुरे क्यों बनें? इस चुनाव में पहली बार संघ के निर्देशों के बावजूद भाजपा और संघ के आम कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी दिखाई दे रही है। कुछ बड़े नेताओं को छोड़ दें, तो मोदी और शाह की जोड़ी ने हर किसी को अप्रासंगिक बना डाला था, कइयों की टिकटें कट गई हैं। ये सब लोग चुपचाप घर बैठे हैं और मोदी और शाह अकेले लड़ाई लड़ रहे हैं। यही कारण है कि इस चुनाव में मोदी और शाह अकेले ही अपनी जागीर बचाने में जुटे हैं। मोदी की जनसभाओं में हर जगह वही श्रोता नजर आते हैं, चेहरों में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसका एक ही मतलब है कि बसों और ट्रकों में लाया जाने वाला रेवड़ या तो धकिया कर लाया जा रहा है या खरीदा हुआ है। मोदी की आक्रामकता वस्तुतः अपनी खुद की घबराहट पर पर्दा डालने की कोशिश मात्र है। चुनाव के प्रचार में असली मुद्दे न उठें, इसलिए ध्रुवीकरण आवश्यक है। ध्रुवीकरण तभी संभव है, यदि सामने कोई खलनायक हो। घृणा का प्रतीक सामने होना ध्रुवीकरण का सार है। चूंकि बाबरी मस्जिद ढह चुकी है, इसलिए बाबरी मस्जिद को लेकर बात नहीं की जा सकती, खासकर इसलिए कि वादे के बावजूद भाजपा राम मंदिर नहीं बना पाई है। कश्मीर में धारा 35-ए और धारा-370 को खत्म करने का जयघोष असल में उपहास का पात्र बना, तो पाकिस्तान को ढूंढ लिया गया। अब मोदी के भाषणों में पाकिस्तान का डर दिखाया जा रहा है कि मोदी होंगे, तो पाकिस्तान सीधा रहेगा, वरना देश में आतंकवादी घटनाओं की भरमार हो जाएगी। पाकिस्तान के नाम पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, खासकर इसलिए भी कि जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय सपा-बसपा के साथ है, उसी तरह अन्य प्रदेशों में भी वह दूसरे दलों के साथ है। मोदी को मालूम है कि मुस्लिम समुदाय उनका साथ नहीं देने वाला, तो मुस्लिम समुदाय की आलोचना, राष्ट्रवाद का नया तरीका है।

संयुक्त राष्ट्र संघ का अस्तित्व अमरीकी सहायता पर निर्भर करता है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ की नीतियां अमरीकी हितों से प्रभावित होती हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका ने एकजुट होकर चीन पर दबाव बनाया, तो चीन सीधे रास्ते पर आया और उसे मोहम्मद मसूद अजहर को लेकर झुकना पड़ा। पिछले कई सालों से सारी कोशिशों के बावजूद चीन अजहर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को वीटो कर देता था। इस बार अगर चीन झुका है, तो यह ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका की कोशिश का फल है। यदि चीन अब भी न मानता, तो यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जा सकता था, जहां चीन की ज्यादा किरकिरी होती। इसमें ट्रंप के साथ मोदी की दोस्ती की कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा होता, तो हम ईरान से तेल लेना जारी रख सकते थे, क्योंकि ईरान को तेल की कीमत डालर में नहीं, बल्कि रुपए में चुकाते हैं। अमरीका द्वारा ईरान की आर्थिक नाकेबंदी के कारण हम विदेशी मुद्रा में महंगा तेल खरीदने को विवश हैं।

मोदी की ट्रंप से दोस्ती होती, तो यहां नजर आती। यह कयास करना भी गलत है कि भारत के प्रति चीन का रुख नरम हुआ है। चीन तो भारत में इस वर्ष के अंत में ‘वुहान’ का-सा सम्मेलन करना चाह रहा था और चीनी अधिकारी इसकी तैयारी में व्यस्त थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि मोदी को इस चुनाव में पूर्ण बहुमत मिलना निश्चित नहीं है, तो उन्होंने इस प्रस्ताव को टाल दिया है तथा उनका रुख इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव के बाद भारत में नया प्रधानमंत्री कौन बनेगा, उस पर आंतरिक दबाव क्या होंगे और उसकी नीतियां क्या होंगी। मजेदार बात यह है कि इस सब के बावजूद मोदी खुद ही अपने चारण बने हुए हैं और अपनी प्रशंसा के झूठे गीत गा रहे हैं। उनके चुनावी भाषणों से असली मुद्दे गायब हैं और वह राष्ट्रीयता और धर्म के नाम पर झूठ को भुनाने में व्यस्त हैं।

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