भारतीय इतिहास में बंजारा समाज

गुरु गोविंद सिंह जी के बहुमूल्य साहित्य को संभालना बहुत जरूरी था। भाई मणि सिंह जी ने यह काम अपने जिम्मे लिया। जरूरत इस बात की है कि बंजारों का इतिहास नए सिरे से लिखा जाए…

बंजारा समाज का जिक्र लोक साहित्य और लोक कथाओं में तो होता है, लेकिन इस समाज का इतिहास और इसकी उपलब्धियों के बारे में इतिहास चुप है। बंजारा समाज क्षत्रिय कुल से ताल्लुक रखता है और इसमें अनेक समुदाय शामिल हैं। लुबाना, सिकलीगर, बाजीगर, गाडिय़ा लोहार इत्यादि सोलह बिरादरियों का लंबा समूह बनता है। अंग्रेजों ने तो इनमें से अधिकांश समूहों को ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ कर रखा था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे अंग्रेज सरकार के कितना खिलाफ थे। अंग्रेज सरकार अपने खिलाफ लडऩे वालों को क्रिमिनल ही कहती थी। जो लोग उस विदेशी अंग्रेज सरकार के साथ मेज पर बैठ कर आजादी की लड़ाई की इबारत लिखते थे, वे सिविलियन थे। लेकिन जो लोग दूसरे तरीके से लड़ते थे, वे क्रिमिनल थे। जो पूरे का पूरा समुदाय ही अंग्रेज सरकार के खिलाफ था, वे क्रिमिनल ट्राइब्स घोषित कर दिए जाते थे। पूर्वोत्तर के नागा तो ‘हेडहंटर’ ही घोषित कर दिए गए क्योंकि उन्होंने उन पादरियों के सिर काट दिए थे जो उनके देवी-देवताओं की निंदा करते थे। बंजारा समाज ने मुगल काल में तथाकथित ‘अकबर महान’ को नाकों चने चबवा दिए थे। अकबर ने बंजारा समाज की एक लडक़ी मल्लूकी के सौंदर्य से आकर्षित होकर उसे बलपूर्वक अपने हरम में डालने का प्रयास किया था। मुगल बादशाहों का भारतीयों के प्रति व्यवहार सम्मानजनक तो था ही नहीं, क्रूर भी था। बादशाहों का चरित्र भी निम्न दर्जे का था। उनको जो भी सुंदर लडक़ी पसंद आती थी, उसके कारिंदे उसे उठाकर बादशाह के हरम में डाल देते थे।

समाज के लिए उसे निकाह का नाम दे दिया जाता था। बंजारा समाज मुगल बादशाहों की इस भोग -लोलुपता को अच्छी तरह जानता था। उस समय के बादशाह अकबर की नजर बंजारा समाज की मल्लूकी पर भी पड़ी। उसने मल्लूकी से निकाह करने का प्रयास किया, लेकिन उसे शायद अंदाजा नहीं था कि मल्लूकी बंजारा समाज की कन्या थी। बंजारा समाज ने अकबर की इस इच्छा को अपने आत्मसम्मान के लिए चुनौती माना। मल्लुकी को बलपूर्वक प्राप्त करने के लिए मुगल सेना ने प्रयास किया। लेकिन मल्लूकी के पिता बल्लू राव बिंजरावत के नेतृत्व में बंजारा समाज ने अकबर की मुगल सेना को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उसे दो बार पराजित भी किया। बल्लू राव बिंजरावत का मुगल राज से संघर्ष सोलहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में हुआ था। पहला संघर्ष मारवाड़ की संबल झील के पास और दूसरा संघर्ष सतलुज नदी के किनारों पर हुआ था। इन दो युद्धों में मीरजमीर तथा मेहरखान नाम के दो मुगल सेनापतियों को हराकर बंजारों ने सोलह बिरादरियों में ही नहीं, बल्कि मुगल रियासत में भी विजय का परचम लहराया था। इसका परिणाम यह निकला कि अकबर जिस मल्लूकी बंजारा को अपने हरम में डालना चाहता था, उसे उसको सार्वजनिक रूप से अपनी बहन कहना पड़ा। अकबर एक साथ अनेक मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहा था। राजपूताना में वह राजपूतों के प्रतिरोध को खत्म करने का प्रयास कर रहा था। हल्दीघाटी का युद्ध (1576) उसी का परिणाम था। राजपूताना के कुछ शासकों ने तो समर्पण कर दिया, लेकिन महाराणा प्रताप जूझते रहे। हल्दीघाटी की लड़ाई के लगभग एक दशक बाद ही उसका सामना बंजारा समाज से हुआ था। मुगल काल में ही गुरु नानक देव जी ने एक नई परंपरा की शुरुआत की थी जो इतिहास में दशगुरु परंपरा के नाम से प्रसिद्ध हुई। गुरु नानक देव जी पूरे देश में घूमे थे, इसलिए उनका देश भर के बंजारों से घनिष्ठ संपर्क हो गया था। बंजारों का अकबर से आमना-सामना दश गुरु परंपरा के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी के कालखंड में हुआ था। इसी संपर्क के कारण बंजारा समाज ने गुरु परंपरा की हर मोड़ और हर संकट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। अकबर ने किसी तरह मल्लूकी राव को अपनी बहन घोषित कर इस विरोध को शांत करने की कोशिश की थी, लेकिन अकबर के उत्तराधिकारी उतने दूरदर्शी और बुद्धिमान नहीं थे। अकबर के बाद मुगल-बंजारा संघर्ष समाप्त नहीं हुआ बल्कि किसी न किसी रूप में चलता ही रहा।

नानक नाम लेवा समाज की टक्कर मुगल बादशाह जहांगीर के समय हुई। पंचम गुरू श्री अर्जुन देव जी के साथ जो अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवहार जहांगीर ने किया था, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। कहा जाता है कि लाहौर के सूबेदार मुर्तजा खान को, जिसने गुरु अर्जुन देव जी को भयानक यंत्रणाएं दी थीं, 1616 में बंजारों ने ही मारा था। मल्लूकी का पिता और बंजारों का नायक बल्लू राव बिंजरावत छठे गुरु श्री हरगोविंद जी के पास आ पहुंचा। बंजारों की मन की इच्छा पूरी हुई। उधर मुगल सत्ता भी इस नई चुनौती से चौकन्नी हो गई थी। उनका भी अनेक बार मुगल सेना से सामना हुआ। लेकिन इस नई नीति के कारण हर बार सफलता गुरू जी की सेना को ही मिली। इतिहास के एक और रोमांचक पृष्ठ का जिक्र करना जरूरी है। छठे गुरू श्री हरगोविंद जी की पुत्री बीबी वीरों जी के विवाह का अवसर था। विवाह के ऐन वक्त पर मुगल सेना ने आक्रमण कर दिया था। ताज्जुब कि हमला करने वालों में शाही काजी भी चल रहा था। बल्लू राव बिंजरावत (जो मणि सिंह जी के दादा थे) ने उस शाही काजी का तलवार के सधे हुए वार से काम तमाम कर दिया। बंजारों का मुगलों से संघर्ष, जो अकबर के राजकाल में बल्लू राव बिंजरावत से शुरू हुआ था, उसको अब और बल मिल गया था। इधर मुगल बादशाहों द्वारा स्थापित दशगुरु परंपरा को खत्म करने का अभियान भी तेज होता गया। मुगल शासकों को लगता था कि दशगुरु परंपरा ने भारत में जो नई जागृति शुरू की है, उससे भविष्य में मुगल सत्ता ही समाप्त हो सकती है। भाई मणि सिंह, जिनका पंजाब के इतिहास में बार-बार जिक्र आता है और अरदास में जिनका नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है, इसी बंजारा समाज के थे। वे बल्लूराव के पौत्र थे।

कहा जाता है कि क्षत्रिय कुल के होने और बाद में व्यवसाय के धंधे में पड़ जाने के कारण, बंजारा समाज साहित्यिक-बौद्धिक पक्ष से कमजोर होता है। लेकिन यह धारणा शायद इसलिए रूढ़ होती गई क्योंकि बंजारा समाज घुमंतु प्रवृत्ति का है। जो समाज एक स्थान पर टिकता ही नहीं, वह अध्ययन व रचनात्मकता के क्षेत्र में कैसे जम सकता है। ये विषय उसकी प्राथमिकता में नहीं हैं। लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं है। इसके विपरीत बंजारा समाज तो भारत के प्राचीनतम इतिहास से लेकर आधुनिक युग तक के इतिहास को श्रुति पद्धति से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाता है। उनका साहित्य भी काल प्रवाह के साथ साथ नई पीढिय़ों में संचारित होता रहता है। खोज करने पर बहुत सी पांडुलिपियां भी बंजारा टांडों में अभी भी मिल सकती हैं। मणि सिंह जी भी बंजारा समाज के श्रेष्ठ विद्वान ही नहीं थे, बल्कि वे यह भी जानते थे कि साहित्य की सार संभाल कितनी आवश्यक है। दशम गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने जब तलवंडी साबो में पंचम गुरु श्री अर्जुन देव जी द्वारा संपादित श्री गुरु ग्रंथ साहिब को पुन: संपादित करने का निर्णय किया, तो उसे लिखने का कार्य भाई मणि सिंह जी ने ही किया था। निरंतर प्रवास और मुगलों से संघर्षों, विशेषकर आनंदपुर साहिब को छोड़ते वक्त सरसा नदी पार करते समय गुरु गोविंद सिंह जी का बहुत सा साहित्य नदी में बह गया। लेकिन इसके बावजूद बहुत सा साहित्य अनेक स्थानों पर बिखरा हुआ था। कुछ देश भर में निरंतर घूमते रहते बंजारों के पास भी सुरक्षित रहा होगा। हिमाचल प्रदेश के पौंटा साहिब में गुरु जी ने ज्ञान केन्द्र की स्थापना की थी, जहां अनेक विषयों पर लिखा भी जा रहा था। गुरु जी ने उन्हीं दिनों स्वयं भी इतिहास के अनेक विषयों पर लिखा। लेकिन अब सब बिखरा हुआ था। गुरु जी वीर गति को प्राप्त हो गए थे। गुरु गोविंद सिंह जी के बहुमूल्य साहित्य को संभालना बहुत जरूरी था। भाई मणि सिंह जी ने यह काम अपने जिम्मे लिया। जरूरत इस बात की है कि बंजारों का इतिहास नए सिरे से लिखा जाए।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ईमेल: kuldeepagnihotri@gmail.com


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