एससी का भारतीय समाज में योगदान
भारतीय इतिहास के मध्यकाल के भक्ति आंदोलन को देखना चाहिए। इस आंदोलन के बहुत से नायक रविदास, कबीर, धन्ना, नामदेव, सैन इत्यादि आज के इसी एससी समाज से थे। उन्होंने समाज को झिंझोड़ा। भेदभाव समाप्त कर एक हो जाने की अपील की। लोगों में नई जागृति आई। नए आंदोलन शुरू हुए। दशगुरु परंपरा का आन्दोलन उनमें से एक था। इसी प्रकार ओडीशा में महिमा आन्दोलन चला। सप्त सिन्धु क्षेत्र के महाराजा रणजीत सिंह ने सप्त सिन्धु क्षेत्र के अधिकांश हिस्से को विदेशियों से मुक्त करवा कर सप्त सिन्धु क्षेत्र के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। ध्यान रखना चाहिए कि रणजीत सिंह सांसी बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। लेकिन मध्यकाल के इस भक्ति आन्दोलन के नतीजे आने शुरू हुए तो भारत में यूरोप के लोग आने शुरू हो गए। उन्होंने जल्दी ही आज के एससी समाज की भूमिका को समझ लिया और तुरंत उनमें से अधिकांश को क्रिमिनल ट्राइब्स घोषित कर दिया…
भारत में जिन जातियों/समुदायों को अनुसूचित किया गया है, उनके इतिहास को समझना जरूरी है। सामाजिक संरचना में वे कब और कैसे नीचे के पायदान पर पहुंच गए, इसको भी जान लेना जरूरी है। पुरातन इतिहास में क्या उनका जिक्र आता है? आज के समाज विज्ञानी इसका उत्तर जानने के लिए बहुत ज्यादा माथा-पच्ची नहीं करते। उनका कहना है कि आज के एससी का जिक्र वेद में ही मिलना शुरू हो जाता है। वेद में शूद्र का उल्लेख तो स्पष्ट मिलता है जिसमें कहा गया है कि शूद्र ब्रह्मा के पैरों में से पैदा हुआ है। उसके बाद के ग्रन्थों में शूद्रों का बार बार जिक्र आता है और उनसे किए जाने वाले भेदभाव का भी। इससे पता चलता है कि अनुसूचित जातियां वेदकाल से ही भेदभाव का शिकार हैं। लेकिन प्रसिद्ध समाज शास्त्री डा. भीमराव रामजी अंबेडकर का स्पष्ट कहना है कि आज के एससी समाज का वेदकालीन शूद्र से कुछ लेना देना नहीं है। वेदकालीन शूद्र तो क्षत्रिय हैं। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के विवाद में क्षत्रियों ने अपने ही एक वर्ग को अपनी बिरादरी से बाहर कर दिया, जिसको शूद्र कहा जाने लगा। मुझे लगता है कि शुरू में तो क्षत्रियों का वह वर्ग जो बिरादरी से बाहर निकाला गया, शूद्र कहलाया, लेकिन बाद में ब्राह्मण और वैश्य समाज भी जिन लोगों को बिरादरी से बाहर निकाल देता था, वे शूद्र वर्ग में शामिल हो जाते थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि शूद्र असहाय हो जाता था। शूद्रों के कारनामों से भी इतिहास भरा पड़ा है। शूद्र समाज से भी अनेक राजा हुए हैं। शूद्र को समझने के लिए एक दूसरा पहलू भी ध्यान में रखना होगा। शूद्रों के भी वही गोत्र हैं जो गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के हैं।
इससे भी संकेत मिलता है कि शूद्र कोई अलग समुदाय नहीं है। उसमें वे सब लोग शामिल हैं जो किन्हीं कारणों से तीन वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) यानी बीकेवी ने अपने अपने समुदायों में से बाहर निकाल दिए थे। उन सभी को पहचान के लिए नया नाम शूद्र दे दिया गया और वे वर्ण व्यवस्था का ही हिस्सा हैं। जहां तक एससी या अनुसूचित जातियों का सवाल है, उनका सन्दर्भ तो सातवीं शताब्दी के बाद मिलना शुरू होता है और उनको सूचीबद्ध करना तथा अनुसूचित करने का काम तो पिछले लगभग आठ नौ सौ वर्ष के बीच का इतिहास है। आठवीं शताब्दी से भारत पर उन अरबों के हमले शुरू हुए जो इस्लाम के उदय होने के कारण अतिरिक्त उत्साह में थे। बाद में तुर्क भी इसमें शामिल हो गए। ध्यान देने की बात तो यह है कि अरबों के पहले हमले के समय अरब हमलावरों से भिडऩे वाला राजा दाहिर सेन तो ब्राह्मण था। बाद के तुर्कों के हमलों के समय अनेक राजा क्षत्रिय थे और कुछ शूद्र भी थे। इसलिए हमलावरों से लडऩे वाले सभी वर्णों के लोग थे, यानी राजाओं की सेना में तीनों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) यानी बीकेवी के लोग शामिल थे। इसका अर्थ यह नहीं कि देश के सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य रणभूमि में जाकर लडऩे लगे। जो सेना में था वह लड़ रहा था। अब सेना हार गई और तुर्क जीत गया। विदेशी राजा जो जीता है वह हारने वाली सेना या समुदायों का क्या हाल करता है, इसका अंदाजा एससी समाज की दशा और दिशा से लगाया जा सकता है। पराजित होने वाली सेना और राजाओं का सब कुछ छीन लिया गया। धन-सम्पत्ति सब कुछ। नई शासन व्यवस्था में अवसर मिलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।
परंपरागत व्यवसाय अपना नहीं सकते थे। शासकीय प्रकोप जो था। उन्होंने जो नए व्यवसाय या पेशा अपनाया या फिर अपनाने के लिए विवश किया गया उस पेशे को सामाजिक व्यवस्था में घटिया माना गया। घटिया होने के कारण ही उसे पराजित समुदाय पर थोपा गया। डा. अंबेडकर का मानना है कि भारतीय समाज में छूतछात शुरू ही सातवीं शताब्दी में हुई। इन विदेशी हमलों का प्रारंभ भी लगभग इसी कालखंड में होता है। पराजित होने वालों में भी तीनों वर्णों के लोग शामिल थे। यही कारण है कि आज के एससी समाज में भी तीनों वर्णों के गोत्र मिलते हैं। इनमें से बहुत से राजवंशों के लोग हैं। बहुत से स्थानों पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और एससी का गोत्र एक ही मिल जाएगा। लेकिन फिर एक ही गोत्र के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उसी गोत्र के एससी में आपसी तालमेल या सम्बन्ध क्यों नहीं हैं? इसका एक ही कारण हो सकता है कि जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हमलावरों से भिड़ गए, उनका सामाजिक/आर्थिक स्थान जीते हुए विदेशी राजाओं ने छीन लिया और सामाजिक व्यवस्था में उन्हें वर्तमान हालत में पहुंचा दिया और आपसी संबंध भी टूट गए। वैसे भी जो राजकोष का शिकार हो, ज्यादातर लोग उसके पास जाने से गुरेज ही करते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि एससी समुदाय ने सामाजिक लड़ाई में भी हथियार डाल दिए।
भारतीय इतिहास के मध्यकाल के भक्ति आंदोलन को देखना चाहिए। इस आंदोलन के बहुत से नायक रविदास, कबीर, धन्ना, नामदेव, सैन इत्यादि आज के इसी एससी समाज से थे। उन्होंने समाज को झिंझोड़ा। भेदभाव समाप्त कर एक हो जाने की अपील की। लोगों में नई जागृति आई। नए आंदोलन शुरू हुए। दशगुरु परंपरा का आन्दोलन उनमें से एक था। इसी प्रकार ओडीशा में महिमा आन्दोलन चला। सप्त सिन्धु क्षेत्र के महाराजा रणजीत सिंह ने सप्त सिन्धु क्षेत्र के अधिकांश हिस्से को विदेशियों से मुक्त करवा कर सप्त सिन्धु क्षेत्र के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। ध्यान रखना चाहिए कि रणजीत सिंह सांसी बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। लेकिन मध्यकाल के इस भक्ति आन्दोलन के नतीजे आने शुरू हुए तो भारत में यूरोप के लोग आने शुरू हो गए। उन्होंने जल्दी ही आज के एससी समाज की भूमिका को समझ लिया और तुरंत उनमें से अधिकांश को क्रिमिनल ट्राइब्स घोषित कर दिया। यह बात मैंने पिछली बार बंजारा समाज के बारे में चर्चा करते हुए भी लिखी थी। लेकिन इस पूरे कांड का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जब विदेशी राजाओं ने पराजित समाज को सजा दी और उस सजा के चलते ही एससी समाज इस हालत में पहुंच गया, तब शेष समाज ने भी इस संघर्षशील समाज का साथ देने की बजाय उससे मुंह मोड़ लिया। भक्ति आंदोलन के दौरान विभिन्न जातियों में एकता का नारा लगा, लेकिन दुर्भाग्य से यह काम नहीं हो पाया।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री
वरिष्ठ स्तंभकार
ईमेल: kuldeepagnihotri@gmail.com
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