कांग्रेस जहां से चली थी, वहीं पहुंच गई

अंग्रेज सरकार ने बहुत ही चतुराई से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाकर खड़ी कर दी थी। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेज सरकार के इस षड्यंत्र में नहीं फंसे। राष्ट्रवादी ताकतें इससे अलग रहीं…

पिछले कुछ अरसे से सत्ता प्राप्ति की जल्दी में राहुल गांधी देश के विभिन्न समुदायों में दरारें डालने के काम में संलग्न हो गए हैं। उनका पूरा प्रयास है कि जो एजेंडा अपने वक्त में अंग्रेज सरकार ने भारत के लिए तय किया था, इस एजेंडा में भारत के विभिन्न समुदायों में दरारें डालना, देश को बांटने के लिए एक समुदाय को दूसरे से लड़ाना, प्राचीन भारतीय ग्रन्थों की अपने हितों के लिए गलत व्याख्या करना, भारत की कुल आबादी को ही बाहरी-भीतरी बताने के लिए ‘आर्य आक्रमण सिद्धान्त’ की कल्पना करना इत्यादि प्रमुख कहे जा सकते हैं। आज सोनिया गांधी परिवार की हरकतों को देख कर लगता है कांग्रेस जहां से चली थी अन्त में वहीं पहुंच गई है। आम भारतीय आश्चर्यचकित है कि राहुल गान्धी ऐसा सब क्यों कर रहे हैं जिससे देश विरोधी देशी-विदेशी ताकतों को बल मिलता है। इसके लिए कांग्रेस के मूल उद्देश्य को समझना होगा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) और उसके परिणाम से घायल और आहत भारतीय चेतना अगली लड़ाई के लिए तैयारियों की योजनाओं के बारे में सोच रही थी। तब अंग्रेजों को ऐसे लोगों की जरूरत थी जो भारतीयों को समझा सकें कि अंग्रेज सरकार भारत के लिए हितकारी है। उसने भारतीयों के कल्याण के लिए बहुत कुछ किया है। इसलिए यह सरकार बनी रहनी चाहिए। अंग्रेज सरकार के पक्ष में यह आन्दोलन तो वही लोग चला सकते थे जो अब तक उनके रंग में ही रंग चुके थे और उनके शिक्षा संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। यदि ऐसे लोगों का एक ग्रुप तैयार हो जाता है तो उनके माध्यम से अंग्रेज भारतीयों से बात भी कर सकेंगे। कम से कम भारतीय अपनी मांगें लेकर अंग्रेज सरकार के पास आने तो लगेंगे।

ऐसा संगठन ब्रिटिश सरकार और भारतीयों के बीच एक सेफ्टी वाल्व का काम कर सकता था। इससे अंग्रेज सरकार को भारत में बने रहने की लेजिटिमेसी मिल जाएगी। 1857 के महासमर के बाद ब्रिटिश सरकार को भारत पर राज करने के लिए इस लेजिटिमेसी की सबसे ज्यादा जरूरत थी। इस पृष्ठभूमि में 1885 में एक ऐसा ही संगठन बना, जिसका नाम ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ रखा गया। इसमें आभिजात्य वर्ग के 70 के आसपास अंग्रेजी पढ़े लिखे शहरी लोग शामिल थे। कांग्रेस को बनाने के उद्देश्य की व्याख्या लाला लाजपत राय ने अपने वक्त में बहुत ही साफगोई से की थी। वे अपनी पुस्तक यंग इंडिया में लिखते हैं- ‘इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन करने का विचार उस समय के वायसराय लार्ड डैफरिन का था। उसने सर ह्यूम रोज को इस काम के लिए नियुक्त किया था।’ लेकिन यह रहस्य छिपा नहीं रह सका। वैसे तो वायसराय लार्ड डैफरिन के समय ही इसकी चर्चा होने लगी थी। वायसराय ने चुप रहना ही श्रेयस्कर समझा। कांग्रेस तो अपना पहला अध्यक्ष भी एक अंग्रेज को ही बनाना चाहती थी जो उस समय बम्बई के राज्यपाल थे। लेकिन लार्ड डैफरिन को लगा कि इससे तो साफ ही हो जाएगा कि कांग्रेस स्थापना की योजना ब्रिटिश सरकार की ही थी। तब विवशता में कांग्रेस को 1885 में अपना प्रथम अध्यक्ष बंगाल के व्योमेश चन्द्र बनर्जी को बनाना पड़ा। जब 1885 में कांग्रेस ने अपना प्रथम सम्मेलन बुलाने का निर्णय किया तो जाहिर है कि कहीं कहीं यह चर्चा भी चल पड़ी होगी की यह कांग्रेस (सम्मेलन) अंग्रेज सरकार के खिलाफ बुलाया जा रहा है। निश्चय ही इससे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन और सम्मेलन बुलाने वालों की चिन्ता बढ़ गई होगी कि शुरुआत ही गलत हो गई तो बहुत नुकसान हो जाएगा। यही कारण था कि इस अधिवेशन का अधिकांश समय भारत में ब्रिटिश सरकार का गुणगान करने और इंग्लैंड की महारानी के भारत में शासन को वरदान बताने में लगाया गया। भारतीयों के मन से यह गलतफहमी दूर करने का हर प्रयास किया गया कि कांग्रेस अंग्रेज विरोधी है।

इसलिए बनर्जी बाबू के प्रथम अध्यक्षीय भाषण के लम्बे हिस्से को अक्षरश: उद्धृत करना जरूरी है। कांग्रेस के उद्देश्य स्पष्ट करने के बाद बनर्जी बाबू ने कहा, ‘हमारे उद्देश्य में कहीं भी ऐसा नहीं है जिसे देखकर कोई कह सके कि हमारी कांग्रेस अंग्रेज सरकार के खिलाफ योजना बनाने वालों का जमावड़ा है। बल्कि इस अधिवेशन में सब के विचार सुन कर अब तक सब को स्पष्ट हो गया होगा कि हम से ज्यादा ब्रिटिश सरकार का शुभचिन्तक और भक्त कोई हो ही नहीं सकता। हम तो इंग्लैंड के संविधान के आभारी हैं कि उसने हमें बोलने की आजादी दी। ब्रिटेन ने हमारे देश के लिए इतना कुछ किया है कि हम उसे कभी भूल नहीं सकते। सबसे बढ़ कर भारत में स्थापित ब्रिटिश सरकार ने हमें अपने ढंग की पश्चिमी शिक्षा दी। जैसे जैसे इस शिक्षा का प्रसार होगा, वैसे वैसे हमारी इच्छा बढ़ती जाएगी कि यूरोप के तौर तरीके से हम भी आगे बढ़ें। बस हमारी तो मात्र इतनी तमन्ना है कि सरकार में हमें भी कुछ भागीदारी दी जाए।’ लाला लाजपत राय ने इस संबंध में कांग्रेस के संस्थापक सर हयूम रोज (जो ब्रिटिश सरकार में भारत मामलों का मंत्री रह चुका था) और आकलैंड कोल्बिन (जो उस समय उत्तर प्रदेश का गवर्नर था) के कांग्रेस को लेकर हुए पत्र व्यवहार को आधार बना कर निष्कर्ष निकाला था कि, ‘हयूम रोज ने भारत में अंग्रेज सरकार के लिए बढ़ते खतरों को देख लिया था। वह समझ गया था कि भीतर ही भीतर अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। इसलिए कांग्रेस स्थापना का उसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज सरकार को इन खतरों से बचाना था। इसके लिए सेफ्टी वाल्व की जरूरत थी और वह सेफ्टी वाल्व कांग्रेस ही हो सकती थी।’ लाला लाजपत राय ने यह सब कुछ देखा और समझा था। उन्होंने बहुत ही संक्षेप में कांग्रेस का सार तत्व प्रस्तुत किया। ‘कुल मिला कर यह कांग्रेस थी। दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। क्या कोई ऐसा उदाहरण है जिसमें वह संगठन जो विदेशी शासन से आजादी के लिए लड़ रहा हो और उस संगठन का निर्माण भी उसी विदेशी सरकार ने किया हो? देश की राष्ट्रवादी ताकतें इसी कारण से कांग्रेस को निंदनीय मानती थीं।’ शायद इसीलिए बाबा साहिब अंबेडकर ने कहा था, लगता है कांग्रेस देश की आजादी के लिए नहीं बल्कि सत्ता के लिए लड़ रही है। जाहिर है कांग्रेस के इस अंग्रेज समर्थक व्यवहार से देशवासियों को बहुत निराशा हुई।

यह चर्चा तो पहले ही होने लगी थी कि यह संस्था अंग्रेज सरकार ने ही अपने हितों की रक्षा के लिए गठित की थी। यह कुछ कुछ उसी प्रकार का प्रयोग था जैसे कोई सरकार (सत्ता पक्ष) अपना तथाकथित विरोधी पक्ष भी स्वयं ही गठित करे। इस प्रकार का विरोध पक्ष सत्ता पक्ष के नियंत्रण में ही चलता है। अंग्रेज सरकार ने बहुत ही चतुराई से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाकर खड़ी कर दी थी। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेज सरकार के इस षड्यंत्र में नहीं फंसे। कांग्रेस की स्थापना के महज सात साल बाद राष्ट्रवादी ताकतों ने भारत में अनुशीलन समिति की स्थापना कर दी। गदर पार्टी अस्तित्व में आई। चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे लोग आगे आए। अशफाक उल्ला जैसे लोगों ने कमान संभाली। पंजाब में छोटू राम और सिकन्दर जैसे टिवाना समाज ने मिल कर यूनियनिस्ट पार्टी बनाई। अंबेडकर ने अंग्रेजों के ‘आर्य आक्रमण सिद्धान्त’ को चुनौती दी। महाराष्ट्र में ही डा. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन किया। इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस के नाम से बिछाए जाल में फंसने से इंकार कर दिया। हैरानी की बात है कि कांग्रेस ने इन सभी को अंग्रेजों के एजेंट कहना शुरू कर दिया जबकि वह खुद अंग्रेजी सरकार के दिखाए रास्ते पर चलती रही। यही कारण था कि कांग्रेस ने अंग्रेजों की चाल में फंस कर मुसलमानों को शेष भारतीयों से अलग मान कर हिंदू-मुसलमान खेलना शुरू कर दिया। आज राहुल गांधी की भाषा कांग्रेस के शुरुआती दौर के अध्यक्षों से मिलती-जुलती है।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com


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