चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का फैसला बड़ी बैंच करेगी, दो जजों की अलग-अलग राय के बाद सुप्रीम कोर्ट का आदेश
जस्टिस दत्ता बोले, चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना काफी नहीं, दिखना भी चाहिए
दिव्य हिमाचल ब्यूरो — नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की अलग-अलग राय के बाद बड़ा फैसला सुनाया है। अब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का फैसला बड़ी बैंच करेगी। हालांकि मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा बड़ी बैंच को मामला भेजने पर एकमत नहीं हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बैंच यह तय करेगी कि इस मामले की सुनवाई पांच जजों की बैंच करे या नहीं। मामला संविधान पीठ के पास भी भेजा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह बंटा हुआ फैसला सीईसी और ईसीएस एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में 2023 के चुनाव आयुक्त अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की गई थी। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को रखा गया है। इसी प्रावधान को चुनौती दी जा रही है। केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत मामले को बड़ी बैंच भेजने की अपील की थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बैंच ने 30 जुलाई को इस मांग पर फैसला सुरक्षित रखा था। बुधवार को जस्टिस दत्ता ने सरकार की इस मांग को खारिज कर दिया और 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले पर अपनी प्रारंभिक राय दी। जस्टिस दत्ता ने कहा कि चुनाव आयोग का सिर्फ स्वतंत्र होना काफी नहीं है, वह स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह प्रधानमंत्री के खिलाफ जाए, क्योंकि सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत उसे रोकता है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि यह उम्मीद बेकार है कि कैबिनेट मंत्री नेता या सरकार से असहमत होगा। मंत्रियों को शामिल करने से वह स्वतंत्र संतुलन नहीं मिलता जो निष्पक्ष चयन के लिए जरूरी है। उधर बैंच में शामिल दूसरे जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता की बातों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून का एक महत्त्वपूर्ण सवाल है, जिसका फैसला बड़ी पीठ को करना चाहिए। मतभेद के कारण बैंच ने आदेश दिया कि मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाए। वह तय करेंगे कि संविधान पीठ बनाकर इसकी वैधता पर फैसला लिया जाए या नहीं।
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