प्राचीन शिव मंदिर बच्छरेटू, शाहतलाई से 4 KM की दूरी पर है यह प्राचीन शिव मंदिर, जानिए पूरी कहानी
देवभूमि हिमाचल प्रदेश में स्थान-स्थान पर कई प्रकार के धार्मिक स्थल विद्यमान हंै, लोगों की ऐसे स्थलों में गहरी आस्था है। एक ऐसा ही आस्था का केंद्र बिलासपुर जिले के बाबा बालक नाथ की तपोस्थली शाहतलाई से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर बच्छरेटू है। हिमाचल प्रदेश के शांत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर शिव मंदिर बच्छरेटू के सामने ही भाखड़ा बांध के गोविंदसागर झील का मनमोहक दृश्य प्रत्येक श्रद्धालु का मन मोह लेता है। भाखड़ा बांध से नाव द्वारा भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। चैत्र मास मेले के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। यद्यपि यहां अभी भी मूलभूत सुविधाओं की कमी है, फिर भी यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर के मुख्य द्वार के पास ही इस मंदिर के इतिहास के बारे में उल्लेख किया गया है। मान्यता है कि प्राचीन काल में एक मुनि थे, ऋषि विश्वनाथ जो चारधाम की यात्रा पर निकले थे। कई दिनों की यात्रा के बाद वे बिलासपुर के घने जंगलों से युक्त इस बच्छरेटू नामक स्थान में आ पहुंचे। वह बहुत थके हारे थे, इस कारण वे एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। तभी उनको प्यास लगी। वहां पास ही में एक कुटिया थी। उन्होंने वहां जाकर आवाज लगाई कि मुझे प्यास लगी है, पानी पिला दीजिए। अंदर से एक वृद्ध स्त्री की आवाज आई कि मैं बहुत थक चुकी हूं। बाहर पानी पड़ा है आप अपने आप पी लीजिए। ऋषि को बहुत प्यास लगी थी उन्होंने घड़े का सारा जल पी लिया। उसके बाद वे फिर से उसी वटवृक्ष के नीचे तप करने लग गए। वो वृद्ध स्त्री खाना बनाने के लिए पानी लेने जब बाहर आई, तो उसने घड़े को खाली पाया। जिसे देखकर वे जोर-जोर से विलाप करने लगी तथा वटवृक्ष के पास आकर ऋषि को खरी खोटी सुनाने लगी। ऋषि ने उसकी बातों को सुनकर यह प्रण लिया कि वे पहले इस वृद्ध स्त्री के जल का ऋण उतारेंगे उसके बाद ही वे चार धाम की यात्रा के लिए आगे जाएंगे।
उस ऋषि ने कई वर्षों तक उसी वटवृक्ष के नीचे तपस्या की। महादेव ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि जहां पर उनका चिमटा लगेगा, वहीं से जलधारा निकलेगी। ऋषि ने सोचा कि हमें तो वहां के समस्त निवासियों के लिए जल चाहिए। उन्होंने फिर से तपस्या की और महादेव ने उनके करमंडल में ही गंगा को स्थापित कर दिया। वही कुंड आज बच्छरेटू शिव मंदिर , जिसे शिव बाड़ी भी कहा जाता है। इस कुंड का जल इतना निर्मल है कि कुंड की सीढिय़ां तथा अंतिम छोर भी ऊपर से स्पष्ट देखा जा सकता है। इस बाड़ी का जल गंगाजल के समान ही पवित्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से गंगाजल में स्नान करने के समान पुण्य प्राप्त हो जाता है। बहुत से श्रद्धालु यहां से जल भी ले जाते हैं। इसके लिए कुंड के साथ ही स्नान के लिए अलग से व्यवस्था की गई है। यह भी माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से व्यक्ति की समस्त व्याधियां दूर हो जाती है और उसे स्वास्थ्य लाभ मिलता है। श्रद्धालुओं में यह आस्था भी है कि इसमें सिक्का डालकर जो भी मनोकामना की जाती है, वह भगवान शिव के आशीर्वाद से अवश्य पूरी होती है। एक ओर मान्यता के अनुसार बाबा बालक नाथ ने भी इस स्थान पर कुछ समय तपस्या की थी। मंदिर के प्रवेशद्वार में इस शिव मंदिर के निर्माण की बात भी बताई गई कि इसे कलुहर रियासत के राजा बीर चंद ने 9वीं शताब्दी में बनवाया था। जहां तक इस स्थान के बच्छरेटू नामकरण की बात है, तो ऐसा कहा जाता है कि यहां पर एक बछड़ा रहा करता था जो बहुत ही नीडर था। घने वनों में बाघ आदि से भी नहीं डरता था। इसलिए लोगों ने इस स्थान का नाम बच्छरेटु रख दिया। इस मंदिर से आधा किलोमीटर की दूरी पर ही बच्छरेटू किला एक प्राचीन और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण दुर्ग है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस किले का निर्माण बिलासपुर के 23वें राजा रत्नचंद ने करवाया था। जो सरकार की उपेक्षा के बाद भी अपनी भव्यता की उपस्थिति दर्ज कर रहा है। सरकार यदि थोड़ा से ध्यान दे और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवा दे, तो इस स्थल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है।
– संजय शर्मा, पालमपुर
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