19 करोड़ के खलीणी फ्लाईओवर की कोस्ट अब 40 करोड़, 8वीं बार होगा टेंडर
पांच साल में तीसरी बार बदला डिजाइन, अब ग्रोडिग कम करने का फैसला, 2024 तक होना था पूरा
स्टाफ रिपोर्टर-शिमला
शिमला के खलीनी चौक की जाम समस्या दूर करने के लिए प्रस्तावित फ्लाईओवर पांच साल से फाइलों और मंजूरियों के बीच अटका हुआ है। स्मार्ट सिटी परियोजना में शामिल इस फ्लाईओवर की लागत करीब 19 करोड़ रुपये से बढक़र 40 करोड़ रुपए पहुंच गई है। सात बार टेंडर प्रक्रिया असफल होने के बाद अब आठवीं बार टेंडर करने की तैयारी है। वर्ष 2024 तक पूरा होने वाला यह प्रोजेक्ट अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। परियोजना के डिजाइन में भी तीसरी बार बदलाव किया जा रहा है। नए प्रस्ताव में फ्लाईओवर की ग्रेडिंग यानी ऊंचाई कम करने की तैयारी है। डिजाइन में बदलाव के बाद तकनीकी औपचारिकताएं पूरी कर परियोजना को दोबारा टेंडर प्रक्रिया में लाया जाएगा। पहला टेंडर वर्ष 2021 में करीब 19.5 करोड़ रुपए की लागत से हुआ था। इससे पहले करीब दो करोड़ रुपए खर्च कर खलीनी जंक्शन को चौड़ा किया गया था। बाद में डिजाइन में खामियां सामने आने पर टेंडर रद्द करना पड़ा। वर्ष 2023 में दोबारा टेंडर हुआ, लेकिन एक ही ठेकेदार के बोली में शामिल होने से प्रक्रिया अमान्य हो गई।
तीसरी बार हरिबल सिंह एंड सन्स को काम आवंटित किया गया, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग चंडीगढ़ से जरूरी स्वीकृति नहीं मिलने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका और टेंडर रद्द हो गया। खलीनी चौक शिमला के सबसे व्यस्त यातायात मार्गों में शामिल है। यहां से बीसीएस, टूटू, पंथाघाटी और टॉलैंड की ओर जाने वाले वाहनों का दबाव रहता है। रोजाना हजारों वाहन जाम में फंसते हैं। फ्लाईओवर बनने से खलीनी चौक पर यातायात का दबाव कम होने और इन क्षेत्रों को जाम से राहत मिलने की उम्मीद है। प्रस्तावित फ्लाईओवर का शुरुआती डिजाइन करीब 210 मीटर लंबा और 5.8 मीटर चौड़ा सिंगल लेन स्ट्रक्चर था। इसे आधुनिक स्टील पाइल्स तकनीक से तैयार करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन डिजाइन और मंजूरियों की उलझन के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
स्मार्ट सिटी का सपना, पांच साल से इंतजार
स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत खलीनी फ्लाईओवर को शिमला के यातायात सुधार की अहम कड़ी माना गया था। समय पर निर्माण पूरा होने से शहर के कई हिस्सों में यातायात दबाव कम हो सकता था। लेकिन पांच साल में टेंडर प्रक्रिया के बार-बार अटकने और डिजाइन बदलने से परियोजना की लागत बढ़ती गई और शहरवासियों का इंतजार भी लंबा होता गया। अब आठवीं बार होने वाली टेंडर प्रक्रिया पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि इस बार फ्लाईओवर फाइलों से निकलकर जमीन पर उतरता है या फिर एक बार फिर नई अड़चन सामने आती
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