भारत-अमरीका तेल गठबंधन

By: Oct 24th, 2026 12:05 am

अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप अचानक इतने विनम्र और दोस्ताना क्यों हो गए हैं? भारत के लिए अच्छी-अच्छी बातें करने लगे हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि भारत के साथ व्यापार-समझौता जरूर होगा। टं्रप लगातार बयान देते रहे हैं कि यह समझौता अंतिम चरण में है। अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर विदेश मंत्री एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो को भारत भेजा। तीन दिन के प्रवास के दौरान रूबियो ने भारत को ‘रिफाइनिंग सुपरपॉवर’ करार दिया। उन्होंने रिलायंस चेयरमैन मुकेश अंबानी के अलावा अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी और टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन सरीखे शीर्ष उद्योगपतियों से मुलाकातें कीं। यह कमर्शियल कूटनीति का स्पष्ट संकेत है। अमरीकी विदेश मंत्री को रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी तक जाना पड़ा, क्योंकि वह जानते हैं कि वेनेजुएला के सल्फर-बहुल, भारी, निम्न दर्जे के कच्चे तेल का शोधन जामनगर रिफाइनरी ही कर सकती है। रिफाइनिंग के क्षेत्र में भारत अमरीका, चीन, रूस के बाद चौथा सक्षम देश है और जामनगर समेत भारत की 23 रिफाइनरियां दुनिया में 21 फीसदी से अधिक भागीदारी निभा रही हैं। अमरीका और यूरोप भारत के पेट्रो उत्पादों-डीजल, पेट्रोल, विमान ईंधन आदि-के बड़े खरीददार हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था और प्रभुत्व का यह नया चेहरा तब सामने आया है, जब अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने राष्ट्रपति टं्रप की इच्छा जाहिर की है कि तेल के क्षेत्र में भारत-अमरीका गठबंधन बनाया जाए। भारत अमरीका का रणनीतिक साझेदार तो है, लेकिन भारत अपनी तेल-जरूरतों की पूर्ति अमरीका के जरिए कर सकता है। इस तरह अमरीका भारत के साथ संबंधों को नया आधार, आयाम और नई मजबूती देने का पक्षधर है। राष्ट्रपति टं्रप ने भारत पर 100 फीसदी टैरिफ थोपने वाला कानून फिलहाल ठंडे बस्ते में रख दिया है, क्योंकि खुद अमरीका रूस से डीजल का आयात कर रहा है। नए परिदृश्य में हमने अमरीका से जनवरी-सितंबर में करीब 1.28 लाख बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन खरीदा था, लेकिन अक्तूबर में यह आयात घटा कर करीब 91,000 बैरल करना पड़ा। अमरीकी तेल कई दिनों बाद सप्लाई होता है और परिवहन की लागत के कारण महंगा भी पड़ रहा था।

भारत अमरीका से 8 अरब डॉलर से अधिक का तेल आयात करता है। बहरहाल भारत ने रूस से तेल का आयात जारी रखा है, लेकिन खाड़ी देशों पर निर्भरता काफी कम कर दी है। ईरान युद्ध और समुद्री मार्ग की नाकेबंदी बुनियादी वजह हो सकती है। चूंकि वेनेजुएला दुनिया में सबसे बड़ा तेल-उत्पादक और निर्यातक देश है, उस पर अब अमरीका का कब्जा है, लिहाजा विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने विकल्प रखे हैं कि भारत अब रूस के बजाय अधिकतम तेल अमरीका से ही आयात करे। अमरीका ने अब प्रतिबंधों की भाषा बोलनी बंद कर दी है। अमरीका वेनेजुएला का भारी तेल रिलायंस रिफाइनरी से ही शोधित कराना चाहता है, डाटा क्षेत्र में भी अंबानी, अदाणी समूहों की काफी सक्रिय भूमिका है, लिहाजा आज अमरीका अप्रत्याशित रूप से विनम्र दिख रहा है और भारत के साथ तेल गठबंधन की बात कर रहा है। कभी अमरीका भारत को ‘बाजार और उद्योग की चींटी’ मानता था, लिहाजा बात करना भी अपना अपमान समझता था, लेकिन अब विश्व और व्यापार के समीकरण बदल चुके हैं। भारत अब विश्व-व्यवस्था में महाशक्ति के तौर पर मौजूद है। यह नए दौर, नई व्यवस्था, नई ‘सुपरपॉवर’ के साथ नए किस्म के राजनयिक संबंधों की शुरुआत है। वैसे भी राष्ट्रपति टं्रप अभी अपनी राजनीति और लोकप्रियता के निम्नतम पायदान पर हैं, उन्हें करीब 31 फीसदी लोग ही समर्थन दे रहे हैं, करीब 68 फीसदी अमरीकी उनकी आर्थिक नीतियों के खिलाफ हैं, उनमें 37 फीसदी रिपब्लिकन समर्थक भी हैं, लिहाजा उन्हें कुछ कर दिखाने की जरूरत है। अमरीका को पेट्रो उत्पादों की सख्त जरूरत है, डीजल-पेट्रोल के दाम अप्रत्याशित स्तर पर बताए जा रहे हैं, ईरान युद्ध में अमरीका के करीब 265 अरब डॉलर फूंक दिए जा चुके हैं, लिहाजा टं्रप रक्षात्मक स्थिति में हैं कि लोकप्रियता को कैसे बहाल किया जाए? भारत इस संदर्भ में मदद कर सकता है, क्योंकि तेल-शोधन की उसकी क्षमताएं अमरीका भी जान चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत टं्रप पर निर्णायक विश्वास करने का जोखिम उठा सकता है? ट्रंप की जिस तरह की गतिविधियां रही हैं, उनको देखते हुए उन पर विश्वास करना कठिन है। वह पहले दिन कहते हैं कि इरान से जंग खत्म होने वाली है, और दूसरे दिन कहते हैं कि अमरीका उस पर निर्णायक प्रहार करेगा। पहले दिन कहते हैं कि भारत पर ज्यादा टैक्स नहीं लगेगा, दूसरे दिन सौ प्रतिशत कर लगाने की बात दोहराते हैं। इस तरह की उनकी मनोस्थिति में उन पर विश्वास नहीं होता है।


Keep watching our YouTube Channel ‘Divya Himachal TV’. Also,  Download our Android App or iOS App