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व्यर्थ पैसा जो भवनों, इमारतों, दफ्तरों, अपनी सुविधाओं के लिए दिल खोल कर लगाया जा रहा है, उस सभी को स्वास्थ्य सुविधा के लिए दे देना चाहिए। बजाय इसके कि सरकार पेंशनरों को भी न बख्शे… हमारे मुख्यमंत्री उन्हीं गांव से हैं जिनसे हम सभी हैं। गांव का परिवेश बहुत स्वच्छ, सुंदर, सकारात्मक और विनम्र

क्या खेल विभाग के साथ मिलकर इन खिलाड़ी सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए मंच उपलब्ध नहीं करवाया जा सकता है? विद्यालयों के प्रधानाचार्यों व शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को चाहिए कि वे खेल सुविधा व प्रतिभा के अनुसार अपने विद्यालय में अच्छे प्रशिक्षकों के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं ताकि हिमाचल के खिलाडि़यों

भारत ने ट्रिप्स प्रावधानों में छूट की गुहार लगाई है, किंतु कई देश अड़ंगा डाल रहे हैं। ऐसे में सरकार को ये अनिवार्य लाइसेंस तुरंत देने चाहिएं ताकि महामारी से त्रस्त जनता को कंपनियों के शोषण से बचाया जा सके… आज कोरोना वायरस, जिसे चीनी या वुहान वायरस भी कहा जा रहा है, ने लगभग

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है,

आज घरों में कैद विद्यार्थी सिर पर हाथ लिए बैठने और अपने भविष्य की चिंता करने के अलावा किसी अन्य स्थिति में नजर नहीं आ रहा है। मानो मानसिक दबाव, तनाव, चिंता और कोरोना की भयंकर लहर सब कुछ नष्ट करने को आतुर सी हो, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन इन युवा विद्यार्थियों को चिंता

राज्यों को इनके घरों के पास कामकाज के इंतजाम करने होंगे। यह ग्रामीण व्यवस्था को सुदृढ़ करने से मुमकिन हो सकेगा। रोजगार की परिकल्पना नए सिरे से किए जाने की जरूरत है… प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल की शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि राज्य प्रवासी मजदूरों का भरोसा जगाए रखें और

ऐसी विषम परिस्थिति में मानवता को सुरक्षित रखने में नर्सों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का अद्वितीय योगदान प्रत्येक देशवासी के लिए अमूल्य है। नर्स का कार्य आवश्यक सेवा श्रेणी में आता है, जिस कारण प्रत्येक आपातकालीन स्थिति में इन्हें अपनी सेवा में उपस्थित रहना पड़ता है। देश व प्रदेश की नर्सों को नर्सिज दिवस की

बड़े व्यापारियों ने सीमेंट, लोहे और एयर कंडीशनर आदि की आपूर्ति की, उस उत्पादन में रोजगार कम संख्या में बने, आम आदमी के हाथ में रकम कम आई और बाजार में मांग कम बनी। बड़ी कंपनियों का कार्य अवश्य बढ़ा परंतु जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था में चाल नहीं बनी। इसकी तुलना में यदि सरकार संसद

आज देश की हालत किस कद्र नाजुक बनती जा रही कोई सोचने को तैयार नहीं है। राजनीतिक रैलियों का आयोजन करवाकर सरकारें स्वयं के बनाए हुए नियमों को तोड़कर जनता को लापरवाही बरतने के लिए प्रेरित करती रही है। नियमों की दुहाई देने वाले ही अगर उन्हें तोड़ें, तो जनता से फिर क्या सहयोग किए