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धरती को हमारी सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। उसने हमसे कहीं अधिक बड़े संकटों का सामना किया है और भविष्य में भी किसी न किसी रूप में अपना संतुलन बना लेगी। लेकिन यदि हमने समय रहते अपनी नीतियों, अपनी अर्थव्यवस्था और अपनी जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन नहीं किए, तो सबसे अधिक खतरा उसी प्रजाति पर आएगा जो स्वयं को इस ग्रह का सबसे बुद्धिमान जीव मानती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संदेश शायद यही है कि धरती नहीं, हम संकट में हैं...

हालांकि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) अचानक देश से बाहर नहीं जा सकता, लेकिन एफडीआई के मुनाफे, डिविडेंड, ब्याज, सैलरी, रॉयल्टी और टेक्निकल फीस के रूप में पैसे बहिर्गमन की एक बड़ी देनदारी भी बनाता है...

देश की अर्थव्यवस्था तो आगे बढ़ रही है, किन्तु उस अनुपात में रोजगार नहीं बढ़ रहे। हिमाचल में भी बेरोजगारी है...

हमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रक्षा इकाइयों को तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों के साथ जोडक़र सैन्य साजो-सामान को अत्याधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से बढऩा होगा...

पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है...

आज राज्य में विभिन्न खेलों सहित तेज गति के उभरते हुए खिलाड़ी व एथलीट हैं जिनको वजीफे की बहुत अधिक जरूरत है। इनके पास नौकरी नहीं है। सामान्य परिवारों से इनका संबंध है, जो हिमाचल से पलायन कर गए हैं। हिमाचल सरकार सम्मानजनक नौकरी दे तथा इन सभी एथलीटों को 2028 ओलंपिक खेलों तक वजीफा भी दे। इस स्तर पर अपना अभ्यास जारी रखने के लिए महीने में पचास हजार रुपए चाहिए होते हैं। जो नौकरी में हैं, वो तो बहुत कठिनाई से अपने वेतन से कुछ न कुछ जुगाड़ कर लेते हैं, मगर जो विद्यार्थी व बेरोजगार हैं, वे कैसे अपना अभ्यास जारी रखें, यह हिमाचल सरकार को सोचना होगा। क्या प्रदेश सरकार कुछ उपकार इन प्रतिभाशाली एथलीटों पर करेगी ताकि वे फ्री माइंड होकर अपना प्रशिक्षण जारी रख सकंे...

श्रीमद्भगवद्गीता संयम की बात करती है, त्याग की नहीं। इन्द्रियों को दबाने की नहीं, उन्हें विवेक के अधीन रखने की बात करती है। यही सिद्धांत मोबाइल पर भी लागू होता है। यदि हमारा व्यवहार केवल आदतों और नोटिफिकेशनों से संचालित होने लगे, तो धीरे-धीरे हमारी स्वतंत्रता कम होने लगती है। इसलिए मोबाइल हमारी जेब में रहना चाहिए, हमारी चेतना में नहीं। हम मोबाइल चार्ज करना कभी नहीं भूलते, लेकिन अपने मन को रिचार्ज करना अक्सर भूल जाते हैं। अब समय आ गया है कि हम दोनों के बीच संतुलन स्थापित करें। तकनीक ने हमारा जीवन आसान बनाया है, अब यह जिम्मेदारी हमारी है कि हम उसे अपने जीवन का साधन बनाएं, स्वामी नहीं...

बच्चों को अपने प्रति संवेदनहीन बनाने में मां-बाप का भी कुछ कसूर है। सोचें कि यदि आप अपने बच्चों को बोझ की तरह पालेंगे तो बच्चों से क्या उम्मीद करते हैं कि वे आपकी सेवा करेंगे? कदापि नहीं। संस्कार और प्यार तो दूर की बात है, स्त्री और पुरुष जब दोनों घर से बाहर धन कमाने को जाते हैं, तो उनके बच्चे पीछे कैसी कैसी यातनाएं सहते हैं, ऐसी परिस्थितियों का उनके मस्तिष्क में अपने माता-पिता के प्रति कड़वाहट उत्पन्न करना स्वाभाविक है। क्या यह सच नहीं है? क्या हमारे बच्चे समझते हैं कि कल हम भी बुजुर्ग होंगे और इसी दौर से गुजरेंगे। क्या हम सहमत हैं कि जो बच्चे अपने बुजुर्ग मां-बाप के नहीं हो सकते हैं, तो किसी के भी नहीं हो सकते...

गोचर भूमियों के बारे में तो कोई स्पष्ट जिक्र तक इस कोड में नहीं है। लोगों की नजर में वन विभाग की भूमिका हमेशा अधिकार हड़पने की रही है तो इस प्रक्रिया में उनका विश्वास करना थोड़ा कठिन हो रहा है। जैसे अन्य विभागों में होता है कि जमीन तो लोगों की है, कृषि विभाग उसमें जरूरी सहयोग करता है, उद्योग तो उद्योपति का है, उद्योग विभाग उसमें जरूरी आर्थिक सुविधाएं और सहयोग देता है, इसी तरह सामुदायिक वन जो वन अधिकार कानून के तहत समुदाय को दिया गया उसका मालिक तो समुदाय है, वन विभाग को उसमें केवल जरूरत पडऩे पर मांगा गया सहयोग देने तक सीमित रखना चाहिए...