पीके खुराना

चाहे सीमित स्तर पर ही सही, पर लिव-इन रिलेशनशिप तो पहले ही स्वीकृति पा चुका है। धीरे-धीरे वह स्थिति आ ही जाएगी जब कोई संबंध ‘अवैध’ नहीं रह जाएगा। वैध-अवैध का अंतर ही समाप्त हो जाएगा और इन पर ऐतराज करने वालों को दकियानूसी करार दे दिया जाएगा। मनोविज्ञान के नजरिये से कहूं तो ऐसे संबंधों में कई तरह की समस्याएं आती हैं। अक्सर यह ब्लैकमेलिंग पर समाप्त होता है, पैसे का नुकसान होता है, इज्जत जाती है, जेल हो सकती है और दुनिया तमाशा देखती है। कई बार लड़कियां ऐसे रिश्तों में भावनात्मक रूप से भी जुड़ जाती हैं, लेकिन रिश्ता टिकाऊ न होने के कारण ब्रेकअप हो जाता है और लडक़ी डिप्रेशन में चली जाती है...

वर्तमान को जीवंत रूप में जीना ही साधना का द्वार है, परमात्मा तक पहुंचने की शुरुआती सीढ़ी है। न अतीत में सत्य है, न भविष्य में, वह इस क्षण की पूर्णता में है। आध्यात्मिक यात्रा में परतें हटती हैं। संस्कार, भय, अपेक्षाएं, अहंकार, सब एक-एक कर सामने आते हैं। यदि हम धैर्यपूर्वक उन्हें देखते रहें, तो वे स्वयं विलीन होने लगते हैं। वही आत्मानुभव है। वहां किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, क्योंकि अनुभव स्वयं प्रमाण है, तब जीवन स्वयं साधना बन जाता है और प्रत्येक क्षण उसी प्रकाश का विस्तार। सत्य कोई दूर की वस्तु नहीं है। वह इस श्वास में है, इस क्षण में है, इस जागरूकता में है। हम यदि साहस करें, तो बाहरी सहारे छोडक़र भीतर की ज्योति को पहचान सकते हैं, और जब भीतर दीपक जलता है तब जीवन केवल जीना नहीं, एक उत्सव बन जाता है...

बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, बूंद-बूंद से सागर भरता है। निरंतर प्रयत्न सफलता का मंत्र है। यहां एक और गहरी बात समझने योग्य है। जब हम परिणाम-केन्द्रित होते हैं, तब हम हमेशा भविष्य में जीते हैं। सोचते रहते हैं कि जब यह हो जाएगा तब सुख मिलेगा। ऐसे में हम यह भूल जाते हैं कि बहुत से काम ही ऐसे हैं जिनका भविष्य कभी आता ही नहीं। तब जीवन लगातार टलता रहता है। इसके विपरीत, जब हम अभ्यास-केन्द्रित होते हैं, तब वर्तमान में जीना शुरू करते हैं। आज का काम, आज की साधना, आज की

अभी हम सोचते हैं कि हम ही जीवित हैं और बाकी सब संसाधन हैं। यही अहंकार हमें प्रकृति से अलग करता है, पर जब हम देखेंगे कि पत्थर भी जीवित है, जल भी जीवित है, तब हम अलग कैसे रह सकते हैं? तब हम ब्रह्मांड के साथ साझेदारी में जीएंगे। तब जीवन एक संघर्ष नहीं रहेगा, एक उत्सव बन जाएगा। सच तो यह है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक नृत्य है। इलेक्ट्रॉन नृत्य कर रहे हैं, ग्रह नृत्य कर रहे हैं, हमारी धडक़नें नृत्य कर रही हैं। और इस नृत्य में कोई मृत नहीं। मृत्यु केवल एक विराम है, एक ताल का बदलना है। संगीत चलता रहता है। हम उस संगीत को सुनना सीख जाएं तो हमें हर वस्तु में जीवन का स्पर्श मिलेगा। अंतत: हम ऐसा जानेंगे कि ‘जीवत सब संसार’ कोई सिद्धांत नहीं, एक दृष्टि है। यह दृष्टि हमें विभाजन से एकत्व की ओर ले जाती है। जब हम इस एकत्व को जीते हैं, तब हम केवल जीवित नहीं रहते, हम जीवन बन जाते हैं...

खुशी कोई मंजिल नहीं, बल्कि यात्रा का ढंग है। यदि यात्रा बेचैनी में कटे, तो मंजिल भी बेचैनी ही देगी। और यदि यात्रा सजगता, स्वीकार और संतुलन में कटे, तो रास्ता ही आनंदमय हो जाता है। तब मंजिल चाहे मिले या न मिले, भीतर कोई कमी नहीं रहती। यही वह अवस्था है जहां मनुष्य पहली बार सच में जीना शुरू करता है। अंतत:, यह बोध गहरा होगा कि भविष्य की उपलब्धियां हमें वही देंगी, जो अतीत की उपलब्धियों ने दिया, क्षणिक तृप्ति। यदि हमें स्थायी खुशी चाहिए, तो दिशा बदलनी होगी। बाहर से भीतर की ओर। पाने से समझने की ओर। दौड़ से ठहराव की ओर। जब यह परिवर्तन घटता है, तब जीवन अपने आप सरल, सहज और अर्थपूर्ण हो जाता है। और तब हमें किसी उपलब्धि की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती...

मृत्यु को समझ लें तो भय धीरे-धीरे पिघलने लगता है क्योंकि भय का मूल ही भविष्य है। मृत्यु भविष्य की घटना है, पर उसका डर वर्तमान को खा जाता है। जब हम वर्तमान में टिक जाते हैं, मृत्यु केवल एक तथ्य रह जाती है, डर नहीं। मरना सीखना एक क्रांतिकारी शिक्षा है। यह समाज की सिखाई हुई झूठी सुरक्षा को तोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि असली सुरक्षा वस्तुओं में नहीं, जागरूकता में है। जो जाग गया, उसके लिए जीवन भी शिक्षक है और मृत्यु भी मित्र। जब यह समझ गहरी हो जाती है, तभी जीवन हमें यह सत्य सिखाता है कि मरना कोई अंत नहीं है। मरना एक शिक्षा है और जिसने यह शिक्षा सीख ली, उसने सच में जीना जान लिया...

सत्संग से उपजा विवेक मनुष्य के जीवन में स्पष्ट परिवर्तन लाता है क्योंकि तब मनुष्य प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर देता है, दोषारोपण नहीं करता बल्कि आत्मपरीक्षण करता है, संग्रह करने के बजाय संतोष करना सीख लेता है और दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को समझता है, अपनी गलतियां सुधारता है और एक बेहतर इनसान बनने की राह का पथिक बन जाता है। ऐसा व्यक्ति समाज में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र होता है। सत्संग से उपजे विवेकपूर्ण जीवन की पहचान यही है। यही कारण है कि संत जनों का कहना है कि सत्संग एक आवश्यकता है, विकल्प नहीं है...

गीता यह भी सिखाती है कि अहम सबसे बड़ा अवरोध है। जो व्यक्ति हर समय बोलना चाहता है, वह खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानता है, वह चाहता है कि लोग उसकी बातें सुनें, उसके ज्ञान का आदर करें, वह सुन नहीं सकता, वह किसी का दुख भी सुन नहीं सकता। आयोन भी बोलना चाह रहा है, पर वह ज्ञान नहीं बांट रहा। आयोन अहंकार में नहीं है, दुख में है। आयोन के ग्राहक बोलते हैं, इसलिए वे सुन नहीं पाते। घोड़ा नहीं बोलता, इसलिए वह सुन लेता है। यह प्रतीक अत्यंत गहरा है। यह बताता है कि करुणा बुद्धि की नहीं, भावना की उपज है। आयोन जब अपने घोड़े को अपना दुख बताता है तो इस दृश्य में एक बूढ़ा व्यक्ति है और उस

जीत कई बार हमें अहंकारी बना देती है, पर हार हमें जमीन से जोड़े रखती है। जब हम जमीन से जुड़े रहते हैं तो हमारी जड़ें गहरी होती हैं। जिनकी जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें आंधी भी उखाड़ नहीं पाती, इसलिए हार को जीवन की जड़ समझना चाहिए। जड़ दिखाई नहीं देती, पर वही वृक्ष को खड़ा रखती है। अंतत: यदि हम ‘हार में भी जीत’ के इस सूत्र को जीवन में उतारेंगे तो हमें यह अनुभव होगा कि सच्ची जीत बाहरी पद, प्रतिष्ठा या ताली में नहीं है। सच्ची जीत उस स्थिरता में है जो बार-बार गिरकर भी हमें खड़ा कर देती है। हम ऐसा करेंगे तो परिणाम चाहे देर से आए, पर आएगा अवश्य। और तब हमें समझ आएगा कि जीत अचानक नहीं मिली, वह तो ह