पीके खुराना

मन चिंतित हो तो हमारी सोच कुंद हो जाती है और हम सचमुच बेबस हो जाते हैं। तब एकमात्र उपाय यही है कि कुछ समय के लिए, और हो सके तो कुछ दिनों के लिए उस समस्या से अपना मन पूरी तरह से हटा लें। जब भावनाओं का उद्वेग शांत हो जाए तो उस पर फिर से विचार करें, खुद से सवाल करें, सवाल करते चलें और अंतत: हल तक पहुंच जाएं। कुछ समय के लिए समस्या से मन हटा लेने का लाभ यह भी होता है कि अक्सर कोई समाधान अचानक सूझ जाता है, कभी विचार के द्वारा, कभी किसी स्वप्न के द्वारा और कभी अचानक किसी बातचीत में। ध्यान यही रखना है कि समस्या आए तो चिंतित न हों, बस उसे टुकड़ों में बांटें और हर टुकड़े के हल का प्रयास करें। खुद से सवाल करने की प्रक्रिया को अपनाएंगे तो समस्याओं की चिंता से बचे रहेंगे...

मन में अगर अहंकार और ईष्र्या का भाव लाकर प्रेम करेंगे, तो वह प्रेम कभी सफल नहीं होगा क्योंकि हम उस प्रेम को कभी गहराई से महसूस ही नहीं कर पाएंगे। किसी का दुख बांटना भी प्रेम का ही रूप है। अक्सर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कोई हमें अपना दुख बताना चाहता है, अपनी चिंता जाहिर करना चाहता है, अपनी समस्या के बारे में बात करना चाहता है, लेकिन हम हैं कि सुनते ही नहीं, पूरी बात सुने बिना सलाह देने लग जाते हैं, या तो उसकी गलती निकालने लग जाते हैं या फिर तरह-तरह के हल सुझाने शुरू कर देते हैं। हमने पूरी स्थिति को समझा नहीं, जाना नहीं, समस्या से जुड़े बाकी तथ्यों और लोगों के बारे में कुछ भी जाने बिना सलाह देने पर उतर आते हैं। हम में सुनने का

जीवन में लगातार की भागदौड़ और झूठे अंहकार की वजह से परिवार टूट रहे हैं और शांति सचमुच मृत्यु के बाद ही नसीब हो पाती है। काश, हम आर. आई. पी., यानी, रेस्ट इन पीस को एल. आई. पी., यानी, लिव इन पीस में बदल पाते। काश, जीवन इतना आसान होता कि हम शांति से जी पाते। सच तो यह है कि थोड़ी सी समझ से और थोड़े से संयम से ही हम शांति और खुशी पा सकते हैं। समझ और संयम के संगम से ही हम आर. आई. पी. को एल. आई. पी. में बदल सकते हैं। तब सिर्फ रेस्ट इन पीस ही नहीं होगा, बल्कि लिविंग इन पीस, शांति से जीवन जी सकना भी संभव हो जाएगा...

हमारे दिमाग की यह खासियत एक खूबी भी है और खामी भी क्योंकि इसका असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ रहा है। कोई व्यक्ति अगर हमें नापसंद है तो हम उसके हर अच्छे काम में भी कमियां निकाल लेते हैं और यदि कोई व्यक्ति हमें बहुत पसंद हो तो हमें उसकी गलतियां भी नजर नहीं आतीं। एक व्यक्ति हंस रहा है, वह हमें पसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या फूल झर रहे हैं और अगर नापसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या दांत फाड़ रहा है। किसी भी कारण से यदि हमें किसी पर शक हो जाए तो हमारा दिमाग खुद ही कहानियां गढऩे लग जाता है। जिस व्यक्ति पर हमें शक हो उसके हर काम में हमें गड़बड़ी का अंदेशा रहता है। आज परिवारों के टूटने का यह बहुत बड़ा कारण बन गया है। पति-पत्नी में किसी को भी अगर अपने साथी पर शक हो जाए तो सिर्फ शक के ही कारण कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि तलाक तक की नौबत आ जाती है...

जब एक बार हम किसी बात के लिए बहाना गढ़ लेते हें तो बहाने गढऩा हमारी रुटीन में शामिल हो जाता है और हम जीवन के हर क्षेत्र में बहाने गढऩे की आदत पाल लेते हैं। जीवन में उतारे बिना हर ज्ञान बेकार है। बहुत-सी और भी ऐसी बातें होती हैं, घटनाएं होती हैं, जिन्हें हम परखने की कोशिश नहीं करते, उन पर विचार करने की कोशिश नहीं करते, सवाल नहीं उठाते। कभी वह अज्ञान के कारण होता है, कभी आलस्य के कारण और कभी आस्था के कारण। ऐसा ज्ञान हमेशा अहंकार ही होता है और इसका निराकरण ही ज्ञान का असली उद्देश्य है। ज्ञान पाने की कोशिश होनी चाहिए, होनी ही चाहिए, उसका विश्लेषण होना चाहिए, होना ही चाहिए, यदि वह किसी क्रिया से, किसी एक्शन से जुड़ा हो तो उसे जीवन में उतारना चाहिए, लेकिन कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह ज्ञान कब छोटा साबित हो जाए, अधूरा साबित हो जाए, गलत साबित हो जाए। इसलिए ज्ञान के अहंकार से बचना चाहिए। जीवन का असली ज्ञान बस इतना सा ही है...

जो बचपन नन्हे कदमों से चलता है वही परिपक्व होकर दौडऩे लग जाता है। जीवन के ये छोटे-छोटे सूत्र सिर्फ महत्वपूर्ण ही नहीं हैं, बल्कि बहुत उपयोगी भी हैं। यह ज्ञान का ऐसा सागर है जिसमें गोता लगाने वाले का जीवन ही बदल जाता है। क्योंकि जब हम ज्ञानगंगा में गोता लगाते हैं तो सत्य का साक्षात्कार कर पाते हैं जिससे मन में स्पष्टता आती है और हम अपने अगले कदम की पहचान कर लेते हैं, आगे क्या करना है यह सुनिश्चित कर लेते हैं। अंतर्मन की यात्रा, आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा यहीं से आरंभ होती है। शुरू के छोटे कदम अंतत: एक सफल यात्रा में परिवर्तित हो जाते हैं। तब हम दूसरों की कमियां ढूंढऩे के बजाय अपनी सारी शक्ति अपने समग्र विकास पर लगा देते हैं। तब हम आकाश छूने की लालसा छोडक़र आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा का महत्व समझ लेते हैं। हम तब भी पढ़ते हैं, आलिम-फाजिल होते हैं पर तब हमारा नजरिया बदल जाता है। तब हमारा ज्ञान हमारे अहंकार का नहीं, बल्कि अहंकार के मर्दन का स्रोत बन जाता है, अहंकार के मर्दन का औजार बन जाता है...

हम अपनी जिम्मेदारियों से मुंह न चुराएं, नि_ले न बैठें, अपना कर्म करते चलें, पूरी तन्मयता से, पूरी श्रद्धा से, तो वह कर्म ही पूजा बन जाता है और उस कर्म का जो भी परिणाम हो उसे स्वीकार करें तो वह पूजा का प्रसाद बन जाता है। भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसे ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ कहकर हमें यह समझाया है कि ईश्वर की इच्छा या विधान के प्रति संतोष ही सारे सुखों का मूल है। उनकी यह सीख इतनी लोकप्रिय हुई कि इसे कई भजनों में समाहित कर लिया गया और ‘सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ सरीखे भजन हमारी संस्कृति का स्थाई अंग बन गए। इसके बावजूद हमारी इच्छाएं, आकांक्षाएं और हमारी प्रार्थनाएं इस सीख के विरुद्ध जाती हैं। अपने अज्ञान और लालच में हम भूल ही जाते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है, और परमात्मा से शिकायत करने लग जाते हैं, मांग रखने लग जाते हैं...

यदि बंद कमरों में बैठे रहकर काम करने पर, सैर न करने पर, स्वास्थ्यकर भोजन न लेने पर, पूरी नींद न लेने पर या ऐसे ही किसी और कारण से ब्लडप्रेशर हो जाए, शूगर हो जाए, किडनी खराब हो जाए, हार्ट की बीमारी हो जाए तो दवाइयां लेकर भी हम जीवन भर के लिए दवाइयों के गुलाम ही रहते हैं और मजबूरन कई सारे परहेज करने पड़ते हैं। डॉक्टरों के चक्कर काटकर, पैसे खर्च करके, जीवन भर के लिए बीमारी मोल लेकर और दवाइयों के गुलाम बनकर अगर हम खुश होते हैं तो यह सुविधा नहीं, हमारी नासमझी है और इस नासमझी पर खुश होने का कोई कारण नहीं है। चुनाव हमारा है कि खुद अपने ही लिए हम रावण बनकर अपना नुकसान खुद करते हैं या आवश्यक सावधानियां बरतते हुए अपनी सेहत का ध्यान रखकर परमात्मा के दिए इस शरीर का पूरा लाभ उठाकर अपना जीवन आनंदमय बनाते हैं...

अपने समय के प्रसिद्धतम और महानतम मुक्केबाज मुहम्मद अली ने एक बार कहा था कि मैं अपने काम में जान लड़ा देता हूं। मैं अगर मुक्केबाज की जगह जमादार भी होता तो मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ जमादार होता। कितनी बड़ी बात है यह, और कितनी प्रेरक कि आदमी अगर जमादार भी हो तो अपने काम में जान लड़ा दे, सर्वश्रेष्ठ बन जाए। संदीप जोशी यही कर रहे हैं। वे इतिहास तो पढ़ाते ही हैं, पर उसे यूं पढ़ा रहे हैं कि साथ ही इतिहास बना भी रहे हैं। जब हम जीवन में काम के साथ लक्ष्य जोड़ लेते हैं और लक्ष्य के साथ समाज की भलाई भी जोड़ लेते हैं तो वह काम सिर्फ काम नहीं रह जाता, पूजा बन जाता है, अर्चना बन जाता है, आरती हो जाता है, फिर वहीं मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च है और वहीं ईश्वर हैं। जब ऐसा हो जाता है तो हम ईश्वर को जानें या न जानें, पर ईश्वर हमें जान लेते हैं।