
पेपर लीक में शामिल संगठित माफियाओं की संपत्तियां कुर्क की जानी चाहिए। संस्थागत सुधार भी बहुत जरूरी हैं। पारदर्शी, सुरक्षित व अचूक परीक्षा प्रणाली बने...
कल ऑफिस से घर की ओर गर्मी से बेदम होता आ रहा था कि रास्ते में सूखे पेड़ की छांव में बैठा रुपया मिल गया। उसकी सांसें चढ़ी हुईं। पूरा बदन पसीने से नहाया हुआ। रुपए की वह हालत देख मन किया कि इस सूरज को कल ऑफिस जाते ही सबसे पहले नोटिस भेजूंगा कि मौसम का फायदा उठाने की भी हद होती है यार! तुमसे गर्म नेचर का तो हमारा बॉस है। बारहों महीने कोयले की भ_ी की तरह सुलगता रहता है। पर इतना गर्म तो हम पर वह भी नहीं होता यार! माना, गर्मी का मौसम है, फिर भी कम से कम गर्मी के मौसम का नाजायज फायदा उठा कर बेचारी जनता के रुपए को हलकान तो न करो।
आज जो भी सोने में निवेश करना चाहे, वो ईटीएफ में पैसा लगा सकता है, और सोने में मूल्य वृद्धि का लाभ ले सकता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) ने 4 मई 2026 को एक नए ट्रेडिंग सेगमेंट के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीद (ईजीआर) की शुरुआत की है...
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहां लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति गांवों में निहित है। पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय स्वशासन का प्रमुख माध्यम है, जो नागरिकों को शासन और विकास प्रक्रिया में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर प्रदान करती है। इसकी जड़ें प्राचीन भारत की ग्राम सभाओं और स्थानीय प्रशासनिक परंपराओं में मिलती हैं। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को मजबूत करने के उद्देश्य से विभिन्न समितियों की सिफारिशों के आधार पर पंचायती राज व्यवस्था को विकसित किया गया। वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधन द्वारा इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया तथा ग्राम पंचायत, पंचा
कहते हैं कि पृथ्वी पर मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है। यह बात स्वयं मनुष्य कहता है, इसलिए इस पर संदेह करना असभ्यता माना जाता है। हालांकि पृथ्वी पर एक दूसरा जीव भी है जिसने कभी अपने बारे में कोई दावा नहीं किया, कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, कोई सभ्यता नहीं बनाई, कोई वर्ण या ज़ात नहीं बनाई, कोई धर्म, मज़हब, रिलीजन या दीन नहीं बनाया, कोई संविधान नहीं लिखा, कोई चुनाव नहीं लड़ा, कोई राष्ट्रगान नहीं रचा, फिर भी वह मनुष्य से करोड़ों वर्ष अधिक अनुभवी निकला। देश के विभिन्न राज्यों में उसका देसी नाम है- तिलचट्टा, झौड़ु, छींगुर, झुरड़, वंचो, करप्पन पूची, बोड्डिंके, जिरले, पाट्टा या आरशोला वगैरह-वगैरह। हमारे देश में आधुनिक और शिक्षित दिखने वाले लोग उसे कॉकरोच कहते हैं ताकि सुनने में थोड़ा अंतरराष्ट्रीय लगे। इन दिनों कॉकरोचों की बड़ी चर्चा है। पहले लोग उन्हें देखकर घिन से भर जाते थे, चीखें मारते थे, डर कर भाग जाते थे, मारने के लिए चप्पल उठाते थे, हिट या बेगॉन का स्प्रे करते थे, पर
उम्मीद करें कि सरकार महंगे ईंधन से बढ़ती महंगाई को तात्कालिक उपायों से नियंत्रित करके आम आदमी को राहत देगी। उम्मीद करें कि महंगे तेल का यह दौर देश में नवीनकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के ऐसे नए दौर को आकार देगा, जिससे पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा में बड़ी बचत होगी...
भारत ई-कचरे का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो सालाना लगभग 1.4 मिलियन टन ई-कचरा पैदा करता है। हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 3.2 मिलियन टन तक भी हो सकता है। भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढऩे वाले ई-कचरा उत्पादक देशों में से एक है और वर्तमान में विश्व स्तर पर ई-कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेज विकास, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बढ़ता उपयोग और गैजेट्स का बार-बार बदला जाना इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। भारत अन्य देशों से अवैध रूप से फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक कचरे का गंतव्य भी बन रहा है, जिससे यह समस्या और बढ़ जाती है। भारत में क्षेत्रवार ई-कचरे में सबसे बड़ा योगदान कंप्यूटर और आईटी उपकरणों का है, जो लगभग 70 फीसदी है। इसके बाद दूरसंचार उपकरण करीब 12 फीसदी, अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगभग 8 फीसदी, चिकित्सा उपकरण करीब 7 फीसदी और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक कचरा लगभग 3-4 फीसदी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत में 7226 ई-कचरा उत्पादक हैं, जो अपने ब्रांड नाम के तहत बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उप
देश की तरक्की का एक आलम सरकारी और प्रशासनिक अधिकारियों की गाडिय़ों की शक्ति और गति में देखा जा सकता है। अगर हूटर बज रहा है, तो देश नतमस्तक है। हम सडक़ों पर केवल हूटर की वजह से ही अच्छे नागरिक बन पाते हैं। बहरहाल, उस दिन अपने एसडीएम किसान मेले में शिरकत करने जा रहे थे। वह कृषि एवं पुशपालन मंत्री के खास सिपाही थे, तो इस तरह सक्रिय भी रहते थे। चालक के पास गाड़ी में सबसे अव्वल औजार हूटर था और वह इसे बजा कर जन
कारण साफ है कि सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, जितने भी कानून आज तक बनाए गए हैं, उनमें ऐसा कोई कानून नहीं बना है कि जिम्मेदारी नहीं निभाने पर अफसरों को जेल जाना पड़ेगा।