Divya Himachal Logo Sep 22nd, 2017

वैचारिक लेख


भविष्य का उपभोग करते हम

पीके खुरानापीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

नुकसान सिर्फ तापमान की बढ़ोतरी तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका व्यापक प्रभाव है। हम जैसे- जैसे प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं वैसे-वैसे अस्थाई सुविधा, थोड़े से स्वाद, समय की बचत आदि के नाम पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। हमारी इन गलतियों के कारण हम जल्दी बीमार होंगे, ज्यादा बीमार होंगे, हमारे शरीर की सुरक्षा प्रणाली बेकार हो जाएगी, मोटापा बढ़ेगा, कमजोरी बढ़ेगी, दिल के दौरे बढ़ेंगे, सुविधा होगी पर सेहत नहीं होगी, स्वाद नहीं होगा। जीवन होगा लेकिन जीवंतता नहीं होगी…

अप्रैल के अंतिम सप्ताह में खबर आई कि मौसम विभाग ने केरल में पहली बार लू की चेतावनी दी है। यह चेतावनी केरल तथा दक्षिणी कर्नाटक के अंदरूनी भागों के निवासियों को दी गई। गत माह लोगों को कहा गया कि सवेरे 10 बजे से शाम 5 बजे तक धूप में न निकलें। प्रदेश में सामान्य से ज्यादा तापमान रिकार्ड किए जाने के बाद यह चेतावनी जारी की गई। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट चल रही है जिसमें देश के विभिन्न शहरों के तापमान की जानकारी दी गई है। सभी जगह तापमान सामान्य से अधिक है। कई शहरों में तो तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से एक-दो डिग्री ही कम है।  इस पोस्ट में जो कहा गया है उसका लब्बोलुआब यह है कि बढ़ती आबादी और आधुनिकीकरण के चक्कर में हम प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं और अपने लिए मुसीबत मोल ले रहे हैं। हम सड़कें चौड़ी कर रहे हैं और इस प्रक्रिया में सैकड़ों पेड़ों की बलि दे रहे हैं। हम ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं बना रहे हैं जो हवा के बहाव को रोक रही हैं। हम पहाड़ों को काट रहे हैं, पेड़ काट रहे हैं और पहाड़ों को खोखला कर रहे हैं। आधुनिकीकरण की हमारी सारी आदतें और आवश्यकताएं मिल कर आग में घी का काम कर रही हैं। परिवहन बढ़ रहा है, गाडि़यां बढ़ रही हैं, नये राजमार्ग बन रहे हैं, पुरानी सड़कें चौड़ी हो रही हैं। अनुमान यह है कि पिछले दस सालों में हमने 10 करोड़ पेड़ों की हत्या की है जबकि नए पेड़ इतने कम लगे हैं कि इस बड़े नुकसान की भरपाई के बारे में कुछ भी सोचा ही नहीं गया। ठेकेदार जंगल के जंगल काट देते हैं, फिर अपना अपराध छिपाने के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। इस प्रकार प्रकृति का दोहरा नुक सान होता है।

बढ़ती गाडि़यों को ज्यादा पार्किंग स्पेस चाहिए, जिससे घरों के आंगन में लगे पेड़-पौधे कट रहे हैं और वे पक्के फर्श में तबदील हो रहे हैं। एयर कंडीशनर लगातार चल रहे हैं, फैक्ट्रियों से निकली दूषित गैस वातावरण को गंदला कर रही है जिससे प्रदूषण बढ़ रहा है। हमारी सारी नई आदतें प्रकृति के विरुद्ध जा रही हैं। प्लास्टिक की बोतलों में पानी, डिस्पोज़ेबल कप में चाय-काफी, डिस्पोज़ेबल प्लेट में खाना, और उसमें भी जंक फूड, हमें बर्बाद कर रहा है। यही कारण है कि आज हम कई तरह के प्रदूषण से जूझ रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण आदि के अतिरिक्त रासायनिक कचरा, कार्बन का उत्सर्जन आदि बड़़ी समस्याएं हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं। शेविंग क्रीम की जगह बिना ब्रश वाली शेविंग जेल का प्रयोग, एयर कंडीशनर का लगातार प्रयोग, कोलतार की सड़कों से निकलती गर्मी, पेड़ों के कटान से उबलता वातावरण, खेती में नई तकनीक के कारण वातावरण का नुकसान आदि ऐसे कारण हैं जो मिल-जुल कर वातावरण को गर्म कर रहे हैं। यह ग्लोबल वार्मिंग नहीं है, ग्लोबल वार्निंग है, मानव समाज के लिए वैश्विक चेतावनी है कि या तो संभल जाओ या फिर जल्दी ही और ज्यादा गर्मी में झुलस जाने के लिए तैयार रहो। क्या होगा जब तापमान 50 डिग्री से भी बढ़ जाएगा? क्या होगा जब हमारा पंखा घूमेगा पर वह और ज़्यादा गर्मी फैलाएगा ? क्या होगा जब हमारा एयर कंडीशनर तापमान आवश्यकता से अधिक बढ़ जाने के कारण सजावट की वस्तु बन कर रह जाएगा? हम कब तक प्रकृति का बलात्कार करते रहेंगे? हम कब तक पहाड़ काट-काट कर नये चमकदार भवन बनाते रहेंगे।

इन सबसे होने वाला नुकसान सिर्फ तापमान की बढ़ोतरी तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका व्यापक प्रभाव है। हम जैसे- जैसे प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं वैसे-वैसे अस्थाई सुविधा, थोड़े से स्वाद, समय की बचत आदि के नाम पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। हमारी इन गलतियों के कारण हम जल्दी बीमार होंगे, ज्यादा बीमार होंगे, हमारे शरीर की सुरक्षा प्रणाली बेकार हो जाएगी, मोटापा बढ़ेगा, कमजोरी बढ़ेगी, दिल के दौरे बढ़ेंगे, सुविधा होगी पर सेहत नहीं होगी, स्वाद नहीं होगा। जीवन होगा लेकिन जीवंतता नहीं होगी। हम अपनी आने वाली पीढि़यों को ऐसे गर्त में धकेल रहे हैं कि उनके लिए इस दुष्चक्र से निकलना ही मुश्किल हो जाएगा।  यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसके हल के लिए हम कल तक का इंतजार कर सकते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके समाधान के लिए हमें तुरंत प्रयत्न आरंभ करने होंगे। यह एक वैश्विक समस्या है, संपूर्ण मानवता की समस्या है, और इसे इसी गंभीरता से स्वीकार किया जाना चाहिए। केरल में पहली बार गर्मी की ऐसी मार पड़ी जिसने कई जानें ले लीं। कल यह अन्य प्रदेशों में भी होगा और रोग बढ़ता चला जाएगा। हमारे बच्चे मोटापे का शिकार होते जा रहे हैं। जंक फूड का शौक, व्यायाम की कमी, अनिश्चित दिनचर्या, नींद का कोई निश्चित समय न होना, यानी असमय खाना और असमय सोना ऐसी समस्याएं हैं जिनसे कई बीमारियां पैदा होती हैं। छोटी से छोटी दूरी तय करने के लिए भी कार का प्रयोग हमारा सबसे बड़ा मजाक है। परंतु यह मजाक हम खुद के साथ कर रहे हैं। अब हमें एक ऐसे आंदोलन की आवश्यकता है, जिसमें देश का हर नागरिक जागरूक हो और हम प्रकृति के नियमों को समझें, प्रकृति की आवश्यकताओं को समझें, प्रकृति की सीमाओं को समझें। ऐसा किए बिना हम प्रकृति का सम्मान नहीं कर सकते। अब हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा, प्रकृति के अनुसार चलना होगा। हर नागरिक को पेड़ लगाने होंगे, उनकी रक्षा करनी होगी, उन्हें बढ़ने देना होगा डिस्पोज़ेबल पैकेजिंग से बचना होगा, जंक फूड के स्वाद को नकारना होगा, पैदल और साइकिल पर चलने की आदत फिर से सीखनी होगी, तभी हम स्वस्थ जीवन जी पाएंगे और अपनी आने वाली पीढि़यों के लिए स्वास्थ्य की विरासत छोड़ सकेंगे।

इसी महीने हम विश्व योग दिवस मनाएंगे। यह एक अच्छा आंदोलन है। एक दिन का दिखावा भी धीरे-धीरे नई आदत में ढल सकता है। चुनाव हमें करना है। हम स्वस्थ जीवन चाहते हैं या रंग-बिरंगी  सुविधाओं वाला ऐसा जीवन जो अंततः बेरंग हो जाता है। प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। उत्तराखंड की बाढ़, केरल की गर्मी, कभी सूखा, कभी बारिश, आंधी, तूफान। बादलों का फटना, भूकंप, सुनामी, कटरीना आदि प्रकृति की चेतावनियां हैं। प्रकृति हमें बार-बार संभलने को कह रही है। हम नहीं संभलेंगे तो यह साल तो कट जाएगा, शायद अगले कुछ साल भी कट जाएं, शायद विज्ञान की तरक्की के कारण हमारे एयरकंडीशनर कुछ और देर तक उपयोगी बने रहेंगे लेकिन अंततः विज्ञान छोटा पड़ जाएगा और प्रकृति अपना बदला ले लेगी। फिर हम असहाय होंगे, बौने पड़ जाएंगे, इसलिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद होना चाहिए। हर उत्सव को प्रकृति के अनुसार ढालना होगा। प्रकृति के विनाश के बजाय प्रकृति के संरक्षण की ओर ध्यान देना होगा ताकि जीवन रहे, जीवतंता रहे, हरियाली हो, खुशहाली हो। आशा करनी चाहिए कि शासन, प्रशासन, समाज और सब नागरिक इसे समझेंगे और समस्या के निदान के लिए अपना योगादन देंगे। इसी में हमारी भलाई है, समाज की भलाई है। आमीन !

 ई-मेल : features@indiatotal.com

विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं? निःशुल्क रजिस्टर करें !

June 8th, 2017

 
 

सरकारी पाठशालाओं के पिछड़ने का प्रश्न

सरकारी पाठशालाओं के पिछड़ने का प्रश्नकिशन बुशहरी लेखक, मंडी से हैं प्रदेश में शिक्षा के वर्तमान ढांचे में परस्पर दो समानांतर व्यवस्थाएं क्रियाशील हैं, जिसमें एक सरकार द्वारा संचालित व दूसरी निजी, जो अपनी तथाकथित श्रेष्ठता को लेकर प्रदेश के आम जनमानस को भ्रमित कर अपना व्यावसायिक हित साध रही […] विस्तृत....

June 8th, 2017

 

अमरीकी दंभ की बलि चढ़ता पृथ्वी का भविष्य

अमरीकी दंभ की बलि चढ़ता पृथ्वी का भविष्य( एन के सोमानी लेखक, गंगानगर से हैं ) कार्बन उत्सर्जन में कटौती का असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे अधिक पड़ेगा। साल 2030 तक भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन की गति को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का […] विस्तृत....

June 7th, 2017

 

लावारिस पशुओं को लेकर बने स्थायी योजना

लावारिस पशुओं को लेकर बने स्थायी योजना( राजेश वर्मा लेखक, बल्द्वाड़ा, मंडी से हैं ) पशुओं से काम लो फिर खुला छोड़ दो। इसी सोच ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया। यह समस्या कम होने की बजाय दिन- ब- दिन और बढ़ रही है। लोगों द्वारा पशुओं को खुला […] विस्तृत....

June 7th, 2017

 

अर्थतंत्र में विश्वास जगाए सरकार

अर्थतंत्र में विश्वास जगाए सरकारडा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं कर्मठ एवं ईमानदार होने के बावजूद नोटबंदी से उद्यमी और उपभोक्ता दोनों ही सहम गए हैं। वे कछुए की तरह दुबक गए है। उन्हें पुनः विश्वास में लेना चाहिए। मूल चोर व्यापारी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र […] विस्तृत....

June 6th, 2017

 

अग्नि के कहर से वनों को बचाना जरूरी

अग्नि के कहर से वनों को बचाना जरूरीबचन सिंह घटवाल लेखक, नगरोटा से हैं एक पेड़ को लगाकर पालना वैसा ही है, जैसे कोई अपनी संतान को पालता है। क्या हम अपनी संतान को ऐसे ही बर्बाद होते देख सकते हैं? नहीं न, तो फिर इन पेड़ों के प्रति भी हमारी यही […] विस्तृत....

June 6th, 2017

 

विविधता के विस्थापन का दौर

विविधता के विस्थापन का दौरकुलदीप नैयर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) कट्टर भाजपाइयों, जो यह मानते हैं कि देश के बडे़ मूल्यगत बदलाव के कारण वे सत्ता में आए हैं, को अपने निष्कर्ष पर एक बार फिर से विचार करना चाहिए। वास्तविक सच्चाई यह है कि लोगों का कांग्रेस से […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

पर्यावरण का मोल समझना समय की मांग

पर्यावरण का मोल समझना समय की मांगकर्म सिंह ठाकुर (लेखक,सुंदरनगर, मंडी से हैं) राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अमर वाकय को चरितार्थ करने हेतु कि धरती पर मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो सब कुछ है, लेकिन लालच को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधन शायद कम पड़ जाएंगे। नीति […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

सत्याग्रह से गोवध तक की यात्रा

सत्याग्रह से गोवध तक की यात्राडा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं कभी तमिलनाडु के पशु उत्सव जलीकट्टू पर इसलिए प्रतिबंध लगा दिया गया था कि इस उत्सव में बैलों को दौड़ाया जाता है । इसको पशुओं के प्रति क्रूरता कहा गया था, लेकिन गाय के एक बछड़े को […] विस्तृत....

June 3rd, 2017

 

हिमाचली कुर्बानियों का कारवां और कन्नी काटता केंद्र

हिमाचली कुर्बानियों का कारवां और कन्नी काटता केंद्रसुरेश कुमार लेखक,‘दिव्य हिमाचल’ से संबद्ध हैं देश को हिमाचल ने बहुत कुछ दिया। सैन्य ही नहीं हिमाचल के असैन्य बलिदान भी कम नहीं हैं। बिलासपुर ने खुद को डुबोकर भाखड़ा बना दिया और  सारा देश रोशन कर दिया। बदले में हिमाचल को क्या मिला? […] विस्तृत....

June 3rd, 2017

 
Page 20 of 439« First...10...1819202122...304050...Last »

पोल

क्या जीएस बाली हिमाचल में वीरभद्र सिंह का विकल्प हो सकते हैं?

View Results

Loading ... Loading ...
 
Lingual Support by India Fascinates