कुलदीप चंद अग्निहोत्री

अमरीका की दिक्कत यह है कि वह ईरान पर प्रत्यक्ष हमला करने का जोखिम उठा सकता है, लेकिन भारत के संबंध में वह ऐसी हिमाकत नहीं कर सकता। इसलिए भारतीय उभार को मंद करने के लिए उसने पाकिस्तान को वैश्विक पटल पर स्थापित करने और उसे वैधता प्रदान करने की नई मुहिम छेड़ी हुई है। इसके लिए पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यों और संरचनाओं के तथाकथित संरक्षक होने के अपने दावे को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार दिखता है। प्रश्न यह कि भारत इस स्थिति का सामना कैसे करे? भारत सरकार तो ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस स्थिति का बेहतर ढंग से सामना कर रही है। ट्रम्प ने पिछले कुछ महीनों में इतने अधिक विरोधाभासी बयान दिए हंै कि विश्व बिरादरी ने उनके बयानों को बहुत गम्भीरता से लेना बंद कर दिया है। इसलिए, उनकी पाकिस्तान को वैधता प्रदान करने की हालिया कोशिश को दुनिया में बहुत गंभीरता से लिया जाएगा, इसकी संभावना कम ही है...

अमरीका को चिंता करने की जरूरत नहीं है, चिंतन और आस्था की स्वतंत्रता भारत के स्वभाव में है। उसके लिए अब्राहमी स्वभाव के अमरीका से शिक्षा लेने की जरूरत नहीं है...

उसने खुद ही इस संसार से रुखसत हो जाने का निर्णय कर लिया और जहर खाकर आत्महत्या कर ली। जाहिर है सत्ता उन लोगों के हाथ आ गई थी जिनके लिए सत्ता सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी तिजोरियां भरने का माध्यम बन गई है। तिजोरियां भी अहंकार ग्रस्त मानसिकता से सार्वजनिक रूप से डरा धमका कर। इसे एक प्रकार से फिरौती मांगने का नया तरीका कहा जा सकता है। इस बार फिरौती में पिता के नाम पर ठेका मांगा गया था। न मिलने पर हत्या नहीं की गई, बल्कि कहा गया तुम खुद आत्महत्या करो। यह बहुत ही क्रूर और अमानवीय आचरण है। लेकिन इससे जो आगे हुआ, उसने आम आदमी पार्टी को पूरे रूप में नंगा कर दिया। गगनजीत सिंह ने मरने से पहले वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल दिया था जिसमें उसने अपनी आत्महत्या के लिए मंत्री लाल जीत सिंह भुल्लर को जिम्मेवार ठहराया है...

महाराजा रणवीर सिंह (1857-1885) के कार्यकाल में तो घर वापसी की यह योजना काफी आगे बढ़ गई थी। एटीएम अपनी कम संख्या के कारण महाराजा गुलाब सिंह की सरकार से लड़ भी नहीं सकते थे। कैसे इस सत्ता को हटाया जाए और प्रत्यक्ष या परोक्ष सत्ता फिर से उनके हाथ में आ जाए? फिलहाल तो देसी शासकों की हां में हां मिलाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। यही कारण था कि एटीएम समय के फेर समझकर महाराजा गुलाब सिंह व उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों के पक्ष में हो गया। ऐसे समय पर एटीएम को लग रहा था कि उसका शिकंजा कश्मीरी मुसलमानों पर ढीला पड़ता जा रहा था या फिर भविष्य में ढीला पड़ सकता है, इसलिए उनके मन-मस्तिष्क को उसी प्रकार नियंत्रण में रखने की जरूरत है, जिस प्रकार अलीगढ़ में सर सैयद अहमद खान कर रहा था। कश्मीर

मान लो लंबी लड़ाई में ईरान हार भी जाता है और अमरीका इस्लाम पंथ के धारक अरब देशों की रक्षा भी कर लेता है, तब भी ईरान को शहीद का दर्जा प्राप्त होगा। शिया पंथ के इतिहास में एक और अध्याय दर्ज हो जाएगा। और अरब देशों को बकौल ईरान ‘शैताने बुजुर्ग’ अमरीका की गोद में चले जाने का सबब प्राप्त रहेगा। इतिहास में अरब देशों के लिए इससे ज्यादा शर्मिंदगी की वजह और क्या हो सकती है। इसका एक परिणाम तो किसी न किसी रूप में सामने आने ही लगा है। कुछ अरब देश अमरीका के

1979 तक आते-आते मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ विद्रोह बहुत तेज हो गया। ईरानियों की निगाह में अमेरिका ‘शैताने बुजुर्ग’, यानी सबसे बड़ा शैतान हो गया था। अब ईरान के पक्के दो दुश्मन हो गए। अमेरिका तो इसलिए कि वह ईरान को अपनी कालोनी बनाना चाहता है और आर्थिक साधनों का दोहन करना चाहता है। अरबों से दुश्मनी तो पुरानी है। ईरान इसलिए भी ताकतवर बनना चाहता है ताकि सभी अरबी उसकी ताकत को स्वीकार कर लें। सासानी ईरानी वंश को अरबों द्वारा हरा दिए जाने का बदला ले लिया जाएगा जब कमजोर अरब देश रक्षा के लिए ईरान की शरण में आएंगे...

भारतीय राजनीति का दुखांत इतना ही नहीं है। वह इससे भी आगे जाता है। उसकी मां इस बात पर जिद्द किए बैठी हैं कि इसे हर हालत में भारत का प्रधानमंत्री बनाना है। बस एक छलांग ही तो बची है। अब ‘विपक्ष के नेता’ तक की सीढ़ी पर तो बैठे ही हैं। राहुल गांधी की भी अपनी जिद्द है। जब तक प्रधानमंत्री नहीं बना देते तब तक मेरे ये ‘शेर’ हर जगह, मौके-बेमौके ऐसे ही घूमेंगे। लेकिन लगता है पानी सिर से गुजरने लगा है। कपड़े उतारकर प्रदर्शन करने वाले इन दस नेताओं की पिटाई वहां की साधारण जनता ने कर दी। क्या कांग्रेस या राहुल गांधी इस प्रकरण से कुछ सीखेंगे...

विद्यार्थी परिषद ने चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय किया। छात्र संघ के चुनाव में कुल मिला कर डेढ़ हजार के आसपास वोट पड़े। विद्यार्थी परिषद के एक प्रत्याशी को छह सौ के आसपास वोट मिले। वह जीत तो नहीं सका। लेकिन इससे चुनावों का आकलन करने वाले, मणिपुर के समाज को समझने वाले, सभी सकते में थे। एक बात तो निश्चित थी। इतने वोट केवल किसी एक समुदाय के बलबूते नहीं लिए जा सकते। यह तभी सम्भव है जब सभी समुदायों के लोग एक साथ इस ‘मणिपुर एक, मणिपुरी एक’ के यज्ञ में आहुति डालें। और इस बार चुनावों में ऐसा ही हुआ। विद्यार्थी परिषद ने मणिपुर में मणिपुर की युवा पीढ़ी के नाते मणिपुर के विभिन्न समुदायों के कृत्रिम भेदभाव समाप्त कर जोडऩे का नया प्रयोग किया...

एक राष्ट्र के भीतर अनेक स्टेट भी हो सकती हैं। जैसे हिंदू राष्ट्र के भीतर ही भारत, नेपाल, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका, लाओस, वियतनाम, मंगोलिया, तिब्बत जैसी अनेक स्टेट हैं। इसलिए विस्तृत रूप से इसे जंबूद्वीप राष्ट्र भी कहा जा सकता है। लेकिन क्या एक स्टेट में दूसरे राष्ट्र भाव वाला व्यक्ति रह सकता है...

भक्ति आंदोलन के कर्णधारों के आचार्य भारत के दक्षिणी क्षेत्र के थे। सप्त सिंधु क्षेत्र भारत पर अरबों, तुर्कों व मुगलों के आक्रमणों का रास्ता था। भक्ति काल के संत-महात्मा एक स्तर पर विदेशी हमलावरों को चुनौती भी दे रहे थे...