
गुरु गोविंद सिंह जी के बहुमूल्य साहित्य को संभालना बहुत जरूरी था। भाई मणि सिंह जी ने यह काम अपने जिम्मे लिया। जरूरत इस बात की है कि बंजारों का इतिहास नए सिरे से लिखा जाए...
4 जून 2024 को विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे और नवीन पटनायक की पार्टी चुनाव हार गई थी। इसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय से आई सभी फाइलें वापस कर दी। नई सरकार ने कार्यभार संभाला। स्वामी जी की हत्या की जांच कमीशन की रपट की खोज शुरू हुई। गृह मंत्रालय की अलमारियां छानी जाने लगीं। लेकिन रपट कहीं नहीं मिली। पूरी जांच करने के बाद गृह मंत्रालय ने पाया कि चार जून को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाकी सब फाइलें तो वापस आ गई थीं लेकिन स्वा
इस व्यवस्था में एक पूरा नैकसिस बन जाता है। वह नैकसिस सत्ता के बल पर आम जनता में अपना आतंकवाद जमाता है, उसी के बल पर संगठन या गिरोह को जिताता है और उसके बाद अपनी हिस्सेदारी मांगता है। बंगाल में ममता बैनर्जी के राज में लगभग यही व्यवस्था स्थापित हो गई थी। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से फिसली, वैसे ही चन्द दिनों में ही ममता बैनर्जी की राजनीतिक मशीन के कल पुर्जे गलियों में और सडक़ों पर बिखरने लगे। यह स्वाभाविक ही था। संघर्ष करने की ऊर्जा विचार से आती है, सत्ता से नहीं। जिस दल की कोई विचारधारा नहीं होती, जिसका लक्ष्य केवल सत्ता हथियाना होता है, उस दल में टूट फूट स्वाभाविक मानी जाती है। ममता बैनर्जी ने तानाशाही तरीके से शासन किया। भ्रष्टाचार के कई आरोप भी इस दल के नेताओं पर लगे। यह भी उल्लेखनीय है कि ममता बैनर्जी ने पश्चिम बंगाल में केंद्र की योजनाओं को लागू ही नहीं किया। इससे बड़ी संख्या में जनता कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित हो गई...
अब इस सूत्र में संस्कृत कहां फिट हो सकती थी। धीरे धीरे वह घर से बाहर होते होते सडक़ पार हो गई। पंजाब का उदाहरण लिया जा सकता है। स्कूलों में संस्कृत अध्यापकों के लगभग सारे पद समाप्त हो गए। संस्कृत के सरकारी कालेज दम तोड़ गए। कपूरथला व नाभा का सरकारी संस्कृत कालेज जो वहां के महाराजाओं ने खोला था, बंद हो गया। गुरुवाणी के गहन अर्थों को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य है। आज से लगभग अढ़ाई सौ साल पहले दशम गुरु श्री गोविंद सिंह जी इसे समझ गए थे और उन्होंने अपने पांच शिष्यों को संस्कृत पढऩे के लिए काशी भी भेजा था...
डीएमके इतना नाराज हुई कि उसने लोकसभा के अध्यक्ष को लिखा कि आगे से उसके सांसद कांग्रेस के सदस्यों के नजदीक भी नहीं बैठेंगे। उनके बैठने की अलग व्यवस्था हो...
पिछले पांच दशकों में असम के अनेक जिलों में इन बांग्लादेशी अवैध मुसलमानों के चलते हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। बंगाल के बांग्लादेश की सीमा से लगते जिलों में तो मुसलमानों की आबादी 79 फीसदी तक हो गई है। असम और पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम वोटों के लालच में उन्हें भारतीय दस्तावेज मुहैया करवाती हैं। ममता बनर्जी के शासन में यह गति और तेज हो गई। अमरीका की मदद से बांग्लादेश की सत्ता कुछ साल मोहम्मद यूनुस के हवाले कर दी...
असम, पश्चिमी बंगाल, केरल, पुडुच्चेरी और तमिलनाडु की विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव के नतीजे भारत की राजनीति को भीतर तक और दूर तक प्रभावित करने वाले हैं। सबसे पहले तमिलनाडु। तमिलनाडु में 1969 से लेकर 2026 तक द्रविड़ राजनीति का कब्जा रहा। उससे पहले 1947 से 1969 तक कांग्रेस का वर्चस्व था। द्रविड़ राजनीति की शुरुआत जस्टिस पार्टी के रामास्वामी पेरियार ने ब्रिटिश काल में की थी। इस राजनीति का आधार आर्य बनाम द्रविड़, जिसे उत्तर बनाम दक्षिणी कहा जाता है, था। इस सिद्धान्त के अनुसार आर्य यूरोप के थे जिन्होंने मध्य एशिया के रास्ते भारत पर सप्त सिन्धु क्षेत्र से हमला किया था और य
दिल्ली विधानसभा के 2025 में चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी पराजित हो गई। यह आम आदमी पार्टी के नाम पर केजरीवाल की योजना के लिए गहरा आघात था...
असल प्रश्न तो मतान्तरण का सामना करने का था। उसके खिलाफ सामान्य जन को कैसे जागृत किया जाए? विदेशी शासक तुर्कों ने भी रणनीति बदली थी। समाज के बड़े महापुरुषों को ही पहले मतान्तरित किया जाए, ताकि आम आदमी विरोध का साहस ही छोड़ दे। शायद यही कारण था कि सिकन्दर लोधी ने रविदास जी को भी इस्लाम में मतान्तरित करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी। रविदास जी की साधना, उनका ज्ञान और समाज के भीतर जाति भेद की दीवारों को समतल करने के प्रयोग ही थे जिसके कारण राज परिवारों ने उनको अपना गुरु स्वीकार किया। उनके ये प्रयोग आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी प्रासंगिक हैं...
ईरान का अमरीका-इजराइल से युद्ध पिछले कुछ महीनों से निरंतर जारी है। अब यह युद्ध मध्य एशिया के अरब देशों तक भी फैल चुका है। पाकिस्तान क्योंकि अमरीका के साथ है, इसलिए परोक्ष रूप से वह भी अब इस युद्ध में एक पक्ष बन चुका है। ऐसा नहीं कि ईरान इस मामले में अकेला है। परोक्ष रूप से चीन और रूस भी इसमें ईरान के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। ऐसा नहीं कि उनको ईरान के लोगों की चिंता है या फिर वे अपनी दोस्ती का फर्ज निभा रहे हैं। बल्कि अमरीका को घेरने के लिए उन्हें ईरान का बहाना मिल गया है, जिस प्रकार रूस को घेरने के लिए अमरीका को यूक्रेन का बहाना मिल गया था। ईरान ने इस लड़ाई