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आस्था


संवेदनशील बनाती है नागपंचमी

AasthaAasthaशैव इसलिए नागों को पूजते हैं क्योंकि भगवान शिव के गले में सर्प है। वैष्णव इसलिए पूजते हैं क्योंकि क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं। नागों का पूजन वंशवृद्धि के लिए किया जाता है तो उनके प्रकोप से बचने के लिए भी। नागों की उपस्थिति हमारे जीवन अनेकों प्रकार महसूस होती है। नाग-संस्कृति हमें कितनी आकर्षित करती रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नागों की रहस्यमय दुनिया, अनेक कथाएं और कहानियां हमारे जीवन को रोमांचित करती हैं…

विषधारी होने के बावजूद भारतीय संस्कृति में नाग पूजे जाते रहे हैं। विषधर को भी पूजने का साहस भारतीय संस्कृति में ही हो सकता है क्योंकि यह संस्कृति सभी प्राणियों को ईश्वर का रूप तो मानती ही है, साथ ही मानव जीवन को आवश्यक भी मानती है। नाग पूजन की परंपरा हमारे दृष्टिकोण को विशाल बनाती है, सभी जीव-जंतुओं के प्रति दयाभाव पैदा करती है और इस तरह प्रकृति और उसमें निवास करने वाले प्राणियों के प्रति हमें अधिक संवेदनशील बनाती है।  भारतीय समाज नागों को अलग-अलग कारणों से पूजता रहा है। शैव इसलिए नागों को पूजते हैं क्योंकि भगवान शिव के गले में सर्प है। वैष्णव इसलिए पूजते हैं क्योंकि क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं। नागों का पूजन वंशवृद्धि के लिए किया जाता है तो उनके प्रकोप से बचने के लिए भी। नागों की उपस्थिति हमारे जीवन में अनेकों प्रकार महसूस होती है। नाग-संस्कृति हमें कितनी आकर्षित करती रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नागों की रहस्यमय दुनिया, अनेक कथाएं और कहानियां हमारे जीवन को रोमांचित करती हैं। श्रावण मास में बारिश के कारण, सर्पों के दर्शन सबसे अधिक होते हैं। संभवतः इसी कारण, उनके पूजन का सबसे पवित्र पर्व, नागपंचमी भी श्रावण मास में ही पड़ता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व गुरुवार 27 जुलाई को है। इस दिन नागों की पूजा करने का विधान है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर प्रमुख नाग मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और भक्त नागदेवता के दर्शन व पूजा करते हैं। सिर्फ मंदिरों में ही नहीं बल्कि घर-घर में इस दिन नागदेवता की पूजा करने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि जो भी इस दिन श्रद्धा व भक्ति से नागदेवता का पूजन करता है उसे व उसके परिवार को कभी भी सर्प भय नहीं होता। नागपंचमी के दिन नागपूजन शास्त्रीय विधि और कुलाचार दोनों के आधार पर होती है। इस दिन नाग देवता की पूजा किस प्रकार करें, इसकी विधि इस प्रकार है ः

नागपंचमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें। इसके बाद नाग-नागिन की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह मंत्र बोलें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कंबलं।

शंखपाल धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।

एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनां।

सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातंकाले विशेषतः।।

तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

इसके बाद पूजा व उपवास का संकल्प लें। नाग-नागिन की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, फूल, धूप, दीप से पूजा करें व सफेद मिठाई का भोग लगाएं। यह प्रार्थना करें-

सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।।

ये च हेलिमरीचिस्था येंतरे दिवि संस्थिता।

ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः।

ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः।।

प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जाप करें-

ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयाः।

इसके बाद सर्प सूक्त का पाठ करें

ह्मलोकुषु ये सर्पाः शेषनाग पुरोगमाः।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

इंद्रलोकेषु ये सर्पाः वासुकि प्रमुखादयः।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

कद्रवेयाश्च ये सर्पाः मातृभक्ति परायणा।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

इंद्रलोकेषु ये सर्पाः तक्षका प्रमुखादयः।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

सत्यलोकेषु ये सर्पा, वासुकिना च रक्षिता।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

मलये चैव ये सर्पा, कर्कोटक प्रमुखादयः।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

पृथिव्यांचैव ये सर्पाः ये साकेत वासिता।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

सर्वग्रामेषु ये सर्पाः वसंतिषु संच्छिता।

नमोस्तुतेभ्य सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।

नमोस्तुतेभ्य सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिनः।

नमोस्तुतेभ्य सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

रसातलेषु या सर्पा अनन्तादि महाबलाः।

नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें।

इन मंत्रों के साथ नाग देवता का पूजन करने से हमारी समस्त कामनाएं पूरी होती हैं।

नागों के हैं रूप अनेक

प्राचीन शास्त्रों में अनेक प्रकार के नागों का उल्लेख मिलता है, इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक इत्यादि का विशेष उल्लेख मिलता है। इन शक्तिशाली नागों का परिचय विस्मयकारी है-

अनंत नाग

अनंत नाग को शेष नाग भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन्होंने संपूर्ण पृथ्वी का भार अपने फणों पर धारण किया हुआ है। क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेष नाग पर ही विश्राम करते हैं।

तक्षक नाग

धर्म ग्रंथों के अनुसार, तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया। जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया।

कर्कोटक नाग

कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सर्र्पो की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया, तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए। ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके बाद कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रवेश कर गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

कालिया नाग

श्रीमद्भागवत के अनुसार, कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोड़ने के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं और निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं और चला गया। इनके अलावा कंबल, शंखपाल, पद्म व महापद्म आदि नाग भी धर्म ग्रंथों में पूजनीय बताए गए हैं।

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