पीके खुराना

जब हम अपने काम में अपनी आत्मा लगा देते हैं तो फिर वह काम हमारे लिए कई नए दरवाज़े खोल देता है। वक्त की चादर ज्यादा लंबी नहीं है, समय सीमित ही है और हम किसी भी दिन को 24 के बजाय 25 घंटे का नहीं बना सकते, पर अपने कामों में अपनी आत्मा डाल

टाटा ने विश्व की सबसे सस्ती कार बना दिखा दी, टाइटैन ने सबसे स्लिम वाटरप्रूफ घड़ी बनाकर दिखा दी, लेकिन यह तर्क दिया जा सकता है कि टाटा समूह के पास प्रतिभा, साधन और धन की कमी नहीं है। हां, यह सही है कि टाटा समूह के पास न प्रतिभा की कमी है और न

कुछ वर्ष पूर्व एक राज्य की सरकारी बस सेवा के ड्राइवरों की आंखों के निरीक्षण में पाया गया कि उनमें से आधे से ज्य़ादा ड्राइवरों को साफ नहीं दिखता था और उन्हें चश्मे की ज़रूरत थी, कइयों को रात को कम दिखता था। ऐसे ड्राइवर अंदाज़े से और राम भरोसे वर्षों से बसें चला रहे

रात दस बजे तक सो जाना अत्यंत लाभकारी है क्योंकि रात 10 बजे से सवेरे के 2 बजे के बीच हमारा मस्तिष्क मेलाटोनिन हार्मोन विसर्जित करता है जो गहरी नींद का कारण है। इसी दौरान शरीर में फैट को संतुलित रखने, बीमार कोशिकाओं की मरम्मत और नई कोशिकाएं बनती हैं, हड्डियों की मरम्मत होती है

यदि दिल में होगा कि मैं फलां काम नहीं कर सकता, यह तो मेरी काबलियत से बड़ा है, या मेरी औकात से बड़ा है, तो सच मानिए, मैं सही कह रहा हूं क्योंकि सारी कोशिशों के बावजूद मैं उसे पूरा नहीं कर पाउंगा, और अगर मैंने सोच लिया कि मैं कर सकता हूं, तो मैं

बेरोजग़ारी से जूझ रहे युवाओं पर भी यही बात लागू होती है, इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि हर व्यक्ति उद्यमी ही बने। मैं बस यह कहना चाहता हूं कि रोजग़ार के लिए जैसे नौकरी एक विकल्प है, वैसे ही उद्यम भी एक अच्छा विकल्प है और युवाओं को इस विकल्प को भी ध्यान में

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, और उन्होंने एक बार खुद को प्रधान सेवक कहा था, लेकिन असलियत यही है कि कोई शक्तिशाली प्रधानमंत्री, सलाहकार मंडल का मुखिया मात्र नहीं होता, न ही वह प्रधान सेवक होता है। वह सिर्फ ‘प्रधान’ होता है, मुखिया होता है, सर्वशक्तिमान होता है। यह समझना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री

इतिहास गवाह है कि जब-जब भी मंदी आती है या नौकरियों का अकाल पड़ता है तो उद्यम ज्यादा अच्छा विकल्प है और ज्यादा से ज्यादा लोग उद्यमी बनने के रास्ते तलाशते हैं। मीडिया उद्योग में पिछले कई सालों से यह हो रहा है कि रिटायर होने के बाद, नौकरी से इस्तीफा देने के बाद या

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब कोई हमें पसंद करने लगता है तो यह स्वाभाविक है कि हम भी उसे पसंद करने लग जाते हैं। कोई जुगत नहीं भिड़ानी पड़ती, कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, बस हो जाता है। हां, जुगत तब भिड़ानी पड़ती है जब रिश्ता बनाना हो, जब यह सुनिश्चित करना हो

उसने सिर्फ यह देखा कि उसको थप्पड़ लगा है और उसका अपमान हुआ है। काम देखा, काम के पीछे की नीयत नहीं देखी। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब कोई व्यक्ति कोई बात करे या कोई काम करे, चाहे वह हमसे संबंधित हो या न हो, तो हमें उसका व्यवहार तो नज़र आता है,