पीके खुराना

उन्होंने कहा कि ज्यादातर भारतीय ‘कर्स ऑफ  नालेज’ यानी ज्ञान के अभिशाप नामक रोग से ग्रसित हैं। ‘कर्स ऑफ  नालेज’ का खुलासा करते हुए उन्होंने मुझे बताया कि आम भारतीय या तो यह मानता है कि वह सब कुछ जानता है और उसे कुछ भी नया सीखने की जरूरत नहीं है। इसका दूसरा पहलू यह

इस सीख के तीन चरण हैं। पहला चरण है जानना, किसी तथ्य को जानना, उसकी जानकारी होना, उसका पता होना। दूसरा चरण है मानना, यह मानना कि हां, यह सच है, संभव है, डू-एबल है, करने योग्य है। तीसरा चरण है ठानना, यह ठान लेना कि इसी को जीवनयापन का, आय का, या कम से

वित्त विधेयक में शामिल मात्र 34 शब्दों ने भाजपा और कांग्रेस के गैरकानूनी काम को वैधानिक मान्यता दे दी। राजनीतिक धूर्तता से परिपूर्ण उन 34 शब्दों का हिंदी भावार्थ यह है : ‘सन 2016 के वित्त अधिनियम के सेक्शन 236 के प्रथम पैराग्राफ में शामिल शब्दों, अंकों और अक्षरों 26 सितंबर 2010 की जगह सभी

सिस्टम में संतुलन आवश्यक है और वह संतुलन यह है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के पास समुचित शक्तियां हों, अधिकार हों, लेकिन उन पर अंकुश भी हों, उनकी जवाबदेही भी तय हो और जवाबदेही की प्रक्रिया स्थापित हो। उसके लिए स्थानीय स्वशासन मजबूत हो, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो और नेताओं की उन्नति का कारण

एक ऐसे विद्यार्थी ने वह कर दिखाया जो खुद अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सका था। मनीराम शर्मा, चूनाराम या अश्वनी गर्ग में से कोई भी अभिनेता नहीं है, लेकिन ये हमारे जीवन के असली हीरो हैं, सचमुच के प्रेरणा स्रोत हैं। हम सब इनके जीवन से, संघर्ष से, साहस और दृढ़ निश्चय से बहुत

पारदर्शिता और जवाबदेही की प्रक्रिया तय की जानी चाहिए, सिस्टम बनना चाहिए ताकि संबंधित अधिकारियों के लिए उस सिस्टम के अनुसार काम करना आवश्यक हो जाए और भ्रष्टाचार पर रोकथाम की शुरुआत हो सके। प्रक्रिया और सिस्टम के अभाव में ही हम भ्रष्ट जीवन जीने को विवश हैं, अब इससे मुक्ति की आवश्यकता है। इस

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है,

बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दैत्याकार कंपनी का नेतृत्व किया है। लोगों को समझना और उन्हें अपनी बात समझाना उन्हें खूब आता है। इसके बावजूद वे अपने जीवन साथी को ही अपनी बात नहीं समझा पाए। इसका एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने किसी कर्मचारी से बात करते हैं

तकनीकी और कार्पोरेट जगत में जिसे बंडल और अनबंडल कहा जाता है, उसी के प्रयोग से रोज़गार के नए अवसर ढूंढ़ना बिलकुल संभव है। उदाहरण के लिए हिंदी का जानकार एक पंजाबी भाषी व्यक्ति हिंदी से पंजाबी में और पंजाबी से हिंदी में अनुवाद के अवसर ढूंढ़ सकता है। कल्पनाशक्ति के प्रयोग से हम ऐसे

यह कोई मज़ाक़ नहीं है। यह एक गंभीर मुद्दा है। लेकिन हम हैं कि इसे समझने की कोशिश से भी इंकार करते हैं। विषय की गहराई में जाए बिना हम सिर्फ  कुछ उदाहरणों से प्रभावित होकर मन बना लेते हैं और फैसले ले लेते हैं। अपने संविधान और अमरीकी संविधान की तुलना में, अपने देश